उत्साह Hindi Story


दुख के वर्ग में जो स्थान भय का है, वही स्थान आनंद वर्ग में उत्साह Hindi Story का है.

उत्साह Hindi Story – भय में हम प्रस्तुत कठिन स्थिति के नियम से विशेष रूप में दुखी और कभी कभी उस स्थिति से अपने को दूर रखने के लिए प्रयत्नवान भी होते है. उत्साह में हम आने वाली कठिन स्थिति के भीतर साहस के अवसर के निश्चय द्वारा प्रस्तुत कर्म सुख की उमंग से अवश्य प्रयत्नवान होते है. कष्ट या हानि सहने के साथ-साथ कर्म में प्रवृत होने के आनंद का योग रहता है. साहस पूर्ण आनंद की उमंग का नाम उत्साह है. कर्म सोंदर्य  के   उ पा स क    ही   स च् चे   उ त् सा ही   क ह ला ते   है .




उत्साह Hindi Story

उत्साह Hindi Story

जि न   क र् मो   में   कि सी   प्रकार  का   कष्ट  या   हा नि   स ह ने   का   सा ह स   अ पे क् षि त   हो ता   है .   उ न   स ब के   प्रति    उ त् क् र स् थ् ता पू र् ण   आ नं द   उ त् सा ह   के   अं त र् ग त   लि या   जा ता   है .   क ष् ट   या   हा नि   के   भे द   के   अ नु सा र        उ त् सा ह   के   भी   भे द   हो   जा ते   है .   सा हि त् य   मी मांसको ने इसी दृष्टी से युद्ध वीर, दान वीर, दया वीर, इत्यादि भेद किये है. इनमे सबसे प्राचीन और प्रधान युद्ध वीरता है. जिसमें आघात, पीड़ा क्या मृत्यु की परवाह नहीं रहती. इस प्रकार की वीरता का प्रयोजन अत्यंत प्राचीन काल से चला आ रहा है, जिसमे साहस और प्रयत्न दौनों चरम उत्कर्ष पर पहुँचते है. पर केवल कष्ट या पीड़ा सहन करने के साहस में ही उत्साह का स्वरूप स्फुरित नहीं होता. उसके साथ आनंद पूर्ण प्रयत्न या उसकी उत्कंठा का योग चाहिए. बिना बेहोश हुए भारी फोड़ा चिराने को तैयार होना साहस कहा जायेगा. पर उत्साह नहीं. इसी प्रकार चुपचाप बिना हाथ पैर हिलाए घोर प्रहार सहने के लिए तैयार रहना साहस और कठिन से कठिन प्रहार सहकर भी जगह से न हटना ध्रिरता कहीं जायेगीं. ऐसे साहस और धीरता को उत्साह के अंतर्गत तभी ले सकते है. जब कि साहसी या धीर उस काम को आनंद के साथ करता चला जायेगा जिसके कारण उसे इतने प्रहार सहने पड़ते है.

सारांश यह कि आनंद पूर्ण प्रयत्न या उसकी उत्कंठा में ही उत्साह का दर्शन होता है. केवल कष्ट सहने के निश्चेट साहस में नहीं. धूति और साहस दौनो का उत्साह के बीच संचरण होता है.

 

उत्साह Hindi Story – उत्साह को गिनती अच्छे गुणों में होती है.

किसी भाव के अच्छे या बुरे होने का निश्चय अधिकतर उसकी प्रवृति के शुभ या अशुभ परिणाम के विचार से होता है. वही उत्साह जो कर्तव्य कर्मों के प्रति इतना सुन्दर दिखाई पड़ता है. अकर्तव्य कर्मों की और होने पर वैसा श्लाध्य नहीं प्रतीत होता. आत्मरक्षा पर रक्षा आदि के निमित साहस की जो उमंग देखि जाती है. उसके सोंदर्य को पर पीडन डकेती आदि कर्मों का साहस कभी नहीं पहुँच सकता.

यह बात होते भी विशुद्ध उत्साह (उत्साह Hindi Story) या साहस की प्रशंसा संसार में थोड़ी बहुत होती ही है. अत्याचारियों या डाकुओं के शोर्य और साहस की कथाएं भी लोग तारीफ़ करते हुए सुनते है. अब तक उत्साह का प्रधान रूप ही हमारे सामने रहा, जिसमे साहस का पूरा योग रहता है. पर कर्ममात्र के सम्पादन में जो तत्परतापूर्ण आनंद देखा जाता है. वह उत्साह ही कहा जाता है.

सब कामों में साहस अपेक्षित नहीं होता, पर थोडा बहुत आराम विश्राम सुभीते आदि का त्याग सबमे करना पड़ता है. और कुछ नहीं तो उठकर बेठना, खड़ा होना या दस पाँच कदम चलना ही पड़ता है. जब तक आनंद का लगाव किसी क्रिया, व्यापार या उसकी भावना के साथ नहीं दिखाई पड़ता तब तक उसे उत्साह की संज्ञा प्राप्त नहीं होती.

यदि किसी प्रिय मित्र के आने का समाचार प्राप्त कर हम चुपचाप आनंदित होकर बैठे रह जाएँ या थोडा हँस भी दे तो यह हमारा उत्साह नहीं कहाँ जायेगा. हमारा उत्साह तभी कहा जायेगा जब हम अपने मित्र का आगमन सुनते ही उठ खड़े होंगे. उससे मिलने के लिए दौड़ पड़ेंगे. और उसके ठहरने आदि के प्रबंध में प्रसन्न मुख इधर उधर आते जाते दिखाई देंगे.

पयत्न और कर्म संकल्प उत्साह (उत्साह Hindi Story) नामक आनंद के नित्य लक्षण है. प्रत्येक कर्म में थोडा या बहुत बुद्धि का योग भी रहता है. कुछ कर्मों में तो बुद्धि की तत्परता और दोनों बराबर साथ साथ चलती है. उत्साह की उमंग जिस प्रकार हाथ पैर चलवाती है उसी प्रकार बुद्धि से भी काम कराती है.

थोडा यह भी देखना चाहिए कि उत्साह में ध्यान किस पर रहता है कर्म पर उसके फल पर अथवा व्यक्ति या वस्तु पर हमारे विचार में उत्साही वीर का ध्यान आदि से अंत तक पूरी कर्म श्रंखला पर से होता हुआ उसकी सफलता रूपी समाप्ति तक फैला रहता है. इसी ध्यान से जो आनन्द की तरंगे उठती है वे सारे प्रयन्न को आनंदमय कर देती है.

 

उत्साह Hindi Story – युद्ध वीर में विजेयतव्य को आलंबन कहा गया है.

उसका अभिप्राय यही है कि विजेयतव्य कर्म प्रेरक के रूप में वीर के ध्यान में स्थित रहता है. वह कर्म स्वरूप का भी निर्धारण करता है. पर आनंद और साहस के मिश्रित भाव का सीधा लगाव उसके साथ नहीं रहता. सच पूछिए तो वीर के उत्साह (उत्साह Hindi Story) का विषय विजय विधायक कर्म या युद्ध ही रहता है. दान वीर और धर्मवीर पर विचार करने से यह बात स्पष्ट हो जाती है.

दान दयावश, श्रद्धावश या कीर्ति लोभवश दिया जाता है. यदि श्रद्धा वश दान दिया जा रहा है तो दान पात्र वास्तव में श्रद्धा का और यदि दया वश दिया जा रहा है तो पीड़ित यथार्थ में दया का विषय या आलम्बन ठहरता है. अत: उस श्रद्धा या दया की प्रेरणा से जिस कठिन या दुस्साध्य कर्म की प्रवृति होती है. उसी की और उत्साही का साहसपूर्ण आनंद उन्मुख कहा जा सकता है.

अत: और रसों में आलंबन का स्वरूप जैसा निर्दिर्ष्ट रहता है वैसा वीररस में नहीं. बात यह है कि उत्साह एक योगिक भाव है जिस्समे साहस और आनंद का मेल रहता है.

जिस व्यक्ति या वस्तु पर प्रभाव डालने के लिए वीरता दिखाई जाती है उसकी और उन्मुख कर्म होता है और कर्म की और उन्मुख उत्साह (उत्साह Hindi Story) नमक भाव होता है. सारांश यह है कि किसी व्यक्ति या वस्तु के साथ उत्साह का सीधा लगाव नहीं होता. समुद्र लाघने के लिए उत्साह के साथ हनुमान उठे है उसका कारण समुद्र नहीं समुद्र लाघने का विकट कर्म है.

कर्म भावना ही उत्साह उत्पन्न करती है. वस्तु या व्यक्ति की भावना नहीं. किसी कर्म के सम्बंध में जहाँ आनंदपूर्ण तत्परता दिखाई पड़ीं कि हम उसे उत्साह (उत्साह Hindi Story) कह देते है कर्म के अनुष्ठान में जो आनंद होता है उसका विधान तीन रूपों में दिखाई पड़ता है.

  • कर्म भावना से उत्पन्न
  • फल भावना से उत्पन्न और
  • आंगतुक अर्थात विषयांतर से प्राप्त

 

उत्साह Hindi Story – फल की विशेष आसक्ति से कर्म के लाघव की वासना उत्पन्न होती है.

चित्त में यही आता है कि कर्म बहुत सरल करना पड़े और फल बहुत सा मिल जाए. श्री कृष्ण ने कर्म मार्ग से फलासक्ति की प्रबलता हटाने का बहुत ही स्पष्ट उपदेश दिया, पर उनके समझाने पर भी भारतवासी इस वासना से ग्रस्त होकर कर्म से तो उदार हो बैठे और फल के इतने पीछे पड़े की गरमी में ब्राह्मण को एक पैठा देकर पुत्र की आशा करने लगे.

चार आने रोज का अनुष्ठान करा के व्यापार पीछे पड़ें कि गरमी में ब्राह्मण को एक पेठा देकर पुत्र की आशा करने लगे, चार आने रोज का अनुष्ठान करा के व्यापार में लाभ शत्रु पर विजय, रोग से मुक्ति, धन धान्य की वृद्धि तथा और भी न जाने क्या क्या चाहने लगे. आसक्ति प्रस्तुत या उपस्थित वस्तु में ही ठीक कही जा सकती है. कर्म सामने उपस्थित रहता है. इससे आसक्ति उसी में चाहिए, फल दूर रहता है, इससे उसकी और कर्म का लक्ष्य काफी है. जिस आनंद कर्म करते समय तक बराबर चला चलता है उसी का नाम उत्साह है.

कर्म के मार्ग पर आनंद पूर्वक चलता हुआ उत्साही मनुष्य यदि अंतिम फल तक न भी पहुँचे तो भी उसकी दशा कर्म न करने वाले की अपेक्षा अधिकतर अवस्थाओं में अच्छी रहेगी, क्योकि एक कर्म काल में उसका जीवन बीता संतोष या आनंद में बिता, उसके उपरांत फल की अप्राप्ति पर भी उसे यह पचतावा न रहा कि मैंने प्रयत्न नहीं किया.

फल पहले से कोई बना बनाया पदार्थ नहीं होता. अनुकूल प्रयत्न कर्म के अनुसार उसके एक एक  अंग की योजना होती है. बुद्धि द्वारा पूर्ण रूप से निश्चित की हुई व्यापार परम्परा का नाम ही प्रयत्न है. किसी मनुष्य के घर का कोई प्राणी बीमार है. वह वेघों के यहाँ से जब तक ओषधि ला-लाकर रोगी को देता जाता है और इधर उधर दौड़ धुप करता जाता है तब तक उसके चित्त में जो संतोष रहता है प्रत्येक नए उपचार के साथ जो आनंद का उन्मेष होता रहता है.

यह उसे कदापि न प्रप्ति होता यदि वहाँ रोता हुआ बैठा रहता. प्रयत्न की अवस्था में उसके जीवन का जितना अंश संतोष आशा और उत्साह में बिता, अप्रयत्न की दशा में उतना ही अंश केवल शोक और दुख में कटता. इसके अतिरिक्त रोगी के न अच्छे होने की दशा में भी  वह आत्म ग्लानी के उस कठोर दुःख से बचा रहेगा जो उसे जीवनभर यह सोच सोचकर होता कि मैंने पूरा प्रयत्न नहीं किया.

 

कर्म में आनंद अनुभव करने वालों ही का नाम कर्तव्य है.

धर्म और उदारता के उच्च कर्मों के विधान में ही एक ऐसा दिव्य आनंद भरा रहता है कि कर्ता को वे कर्म ही फल स्वरुप लगते है. अत्याचार का दमन और क्लेश का शमन करे हुए चित्त में जो उल्लास और तुष्टि होती है. वही लोकोपकारी कर्म वीर का सच्चा सुख है. उसके लिए सुख तब तक के लिए रुका नहीं रहता जब तक की फल प्राप्त न हो जाए बल्कि उस समय से थोडा थोडा करके मिलने लगा है जब से वह कर्म की और हाथ बढाता है.

कभी कभी आनंद का मूल विषय तो कुछ और रहता है पर उस आनंद के कारण एक ऐसा स्फूर्ति उत्पन्न होती है जो बहुत से कामों की और हर्ष के साथ अग्रसर करती है. इसी प्रसन्नता और तत्परता को देख लोग कहते है कि वे काम बड़ें उत्साह से किये जा रहे है. यदि किसी मनुष्य को बहुत सा लाभ हो जाता है या उसकी कोई बडी भारी कामना पूर्ण हो जाती है तो जो काम उसके सामने आते है.

उन सबको वह बड़े हर्ष और तत्परता के साथ करता है. उसके इस हर्ष और तत्परता को भी लोग उत्साह ही कहते है. इसी प्रकार किसी उत्तम फल या सुख प्राप्ति की आशा या निश्चय से उत्पन्न आनंद फलोंमुखी प्रयत्नों के अतिरिक्त और दुसरे व्यापारों के साथ संलग्न होकर, उत्साह के रूप में दिखाई पड़ता है यदि हम किसी ऐसे उद्योग में लगे है जिससे आगे चक्कर आगे चलकर हमें बहुत लाभ या सुख की आशा है तो हम उस उद्योग को तो उत्साह के साथ करते ही है, अन्य कार्यों में प्राय: अपना उत्साह दिखा देते है.

यह बात उत्साह में नहीं एनी मनोविकारों में भी बराबर पाई जाती है. यदि हम किसी बात पर क्रुद्ध बैठे है और इसी बीच में कोई दूसरा आकर हमसे कोई बात सीधी तरह भी पूछता है टी ओहाम उस पर झुँझला उठते है. इस झुंझलाहट का न तो कोई निर्दिष्ट कारण होता है न उद्देश्य. यह केवल क्रोध की स्थिति व्याघात को रोकने की क्रिया है क्रोध की रक्षा का प्रयत्न है.

इस झुंझलाहट द्वारा हम यह प्रकट करते है कि हम क्रोध में है और क्रोध ही में रहना चाहते है. क्रोध को बनाये रखने के लिए हम उन बातों से भी क्रोध ही संचित करते है जिनमे दूसरी अवस्था में हम विपरीत भाव प्राप्त करते. इसी प्रकार यदि हमारा चित्त विषय में उत्साहित रहता है. तो हम एनी विषयों में भी अपना उत्साह दिखा देते है.

यदि हमारा माँ बढ़ा हुआ रहता है तो बहुत से काम प्रसन्नतापूर्वक करने के लिए तैयार हो जाते है. इसी बात का विचार करके सलाम साधक लोग हाकियों से मुलाकात करने के पहले अर्दलियों से उनका मिजाज पूछ लिया करते है.

 

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