कोणार्क एक हिंदी पट कथा हिंदी कहानी


कोणार्क

एक कक्ष का भीतरी भाग. मंदिर की विशाल चार दिवारी के भीतर मुख्य मन्दिर से लगभग पचास गज दक्षिण पूर्व की और एक भोग मंदिर है. यह कमरा उसी में स्थित है और मंदिर के निर्माण के दिनों में महाशिल्पी विशु का निवास स्थान है. सामने तीन द्वार है. जिनमे से बीच वाले को छोड़कर बाकी दोनों खिड़की जान पड़ती है. खिड़की के बराबर बाकी दोनों खिड़की जान पड़ती है. खिड़की के बराबर स्तम्भ है. खिडकियों और सामने वाले द्वार में से मुख्य मंदिर और जगमोहन की झलक दिखाई पड़ती है. पूरी झलक नहीं, सिर्फ मेधी से ऊपर और छत्र से निचे का वेश जिस पर अंकित कुछ सुन्दर मूर्तियाँ दृष्टीगोचर होती है. मंदिर की यह झलक जितनी सजावटपूर्ण है, उसकी अपेक्षाकृत महाशिल्पी का निवास स्थान, यह कमरा अत्यंत सादा और अलंकार विहीन है. इधर उधर कुछ आधी उत्कीर्ण मूर्तियाँ पड़ी है. कुछ पाषाण खंड रखे है. जिन पर की गई खुदाई नजर पड़ रही है.




कुछ छेनियाँ और अन्य ओजार भी पड़े है. बायीं खिड़की के पास एक लम्बी चौकी रखी है, जीके सिरहाने की तरफ लकड़ी की ऊँची पीठ है, जैसी कि अक्सर प्राचीन सिंहासनो में हुआ करती थी. चौकी पर एक सादा कालीन बिछा है. चौकी पर भारी चिंतित अवस्था में बैठे है. महाशिल्पी विशु. उनके हाथ चौकी की पीठ पर है और हाथो पर ठुड्डी है. हमें उनका पुरा मुख नहीं दिखाई पड़ता क्योकि उनकी दृष्टी बिच वाले द्वार में होती हुई मुख्य मंदिर पर पड़ी हुई है. कमरे में आने का एक द्वार दाहिनी तरह भी है. और इस दृश्य में अधिकतर अभिनेता इसी द्वार से आते जाते है. इस समय इस द्वार के निकट कोणार्क के प्रधान पाषाण कोर्त्तक राजीव खड़े है. ऐसा मालूम होता है कि अभी बाहर से आये है. और उन्होंने कुछ कहना समाप्त किया है. बातचीत के बीच में कभी कभी मंदिर की तरफ से पत्थर पर खुदाई की आवाज आती है, जिसमे मालुम होता है. कि काम जारी है.

कोणार्क Hindi Story

कोणार्क Hindi Story

विशु – कब आखिर कब हम अम्ल के ऊपर त्रिपटधर को स्थापित कर पायेंगे? आज दस रोज हो गए, केवल इसी के कारण मूर्ति को प्रतिष्ठापन नहीं हो रहा है. राजीव की और मुहँ करके राजिव, तुम कहते हो कि तुमने कलश के अध्योअंश को और हल्का कर दिया?

राजीव – हाँ फिर भी कलश ठहर नहीं पाया. मैंने अम्ल के हर एक अनुपात को फिर से नापा. कही कमी नहीं.

विशु – छप्र के ऊपर वाली भूमि के जोड़ तो ठीक है न?

राजीव – वे सब जोड़ तो आप ही ने अपने हाथों से स्थापित किये थे.

विशु – जानता हूँ. लेकिन मंदिर की महती कल्पना मेरी बुद्धि के परे हो चली है. मुझे न मालूम था कि सूर्यदेव के जिस विशाल वाहन का स्वप्न मैं देखा करता था, वह सच्चा होते-होते इस पार्थिव धरातल से उठकर भगवान भास्कर के चरण छुने के लिए उतावला हो उठेगा.

राजीव – राजनगरी के ज्योतिषी भानुदत्त का कहना है..

नेपथ्य के निकल आते नूपुरों की ध्वनि. सौम्य श्री का प्रवेश सर पर उष्णीय, कानो में मकरकुंडल, गले में हार, हाथो में मंजीर, मानो विशेषत: तैयार होकर आये हो.

सौम्य – यह ठीक रहेगा न विशु? अपने वेश भूषा को दिखाते है. कोई कमी तो नही है, नाट्याचार्य की वेश भूषा में?

राजीव – हाथो में वीर श्रंखला कहाँ है, तात सौम्य श्री?

सौम्य – इतना भी नहीं समझे राजीव? हाथो में मंजीर देखते हो? मंजीर बजाने की भंगिया यदि नहीं हो तो वह नाट्याचार्य की मूर्ति क्यों कर लगेगी? और यदि मंजीर बजाना है तो सुवर्ण श्रृंखला कलाइयों में कैसे ठहर सकती है?

राजीव – समझा तात

सौम्य – लेकिन तुम्हारा क्या विचार है विशु? हाथो को कटक मुद्रा में रखूं न? यह देखो, बाए हाथ में मंजीर को उल्टा करके इस तरह रखूँगा. बाए हाथ वाली मंजीर को वृक्ष से लगाकर उलट कर रखता है. और दाये हाथ को ऊपर से कटक मुद्रा में इस तरह दिखता है. मानो मंजीर बजाकर मैं नर्तकियो को संकेत दे रहा हूँ. ठीक है न? विशु को चुप और ध्यानमग्न देख कर रुक जाता है. और पूछा मामला क्या है विशु?

विशु – राजीव से ज्योतिषी क्या क्या कहता है, राजीव?

राजीव – कहता है कौनार्क देवालय ज्यों ही पूरा होगा त्यों ही इसके पत्थरों में पंख लग जायेंगे और सारा मंदिर आकाश में उड़ जाएगा.

सौम्य – मैंने भी सुनी थी वह भविष्वाणी लेकिन एक परिवर्तन चाहता हूँ.

राजीव – वह क्या तात सौम्य ने कहा?

सौम्य – मन्दिर उड़ेगा नही. नाट्याचार्य सौम्य श्री के संकेत पर जब नट मंदिर में देवदासियाँ नृत्य करेगी, तो ताल देने के लिए कोणार्क देवालय ही थिरक उठेगा.

विशु – परिहास की बात नहीं है बन्धु

सौम्य – विशु तो क्या तुम सच मानते हो कि कोणार्क के ये भारी पत्थर, ये विशालकाय मूर्तियाँ गगन गामी हो जायेगी.

विशु – विचारपूर्ण मुद्रा कह नहीं सकता पर एक बात अवश्य है. हमने पत्थर में जान दाल दी है. उसे गति दे दी है. सौत्साह वह भूल रहा है कि वह धरती का पदार्थ है. उसके पैर धरती पर नहीं टिकते. पत्थर का यह मंदिर आज कल्पना के स्पर्श से हवा की तरह गतिमान, किरण की तरह स्पर्शहीन, सुगन्ध की तरह सर्वव्यापी हो रहा है. लेकिन धरती उसे जकड़े हुए है, ईष्र्या से मुझे लगता है, जैसे अनजाने ही हम लोगो ने पृथ्वी और आकाश के बीच भीषण संघर्ष खड़ा कर दिया है.

सौम्य – पृथ्वी और आकाश के संघर्ष की बात फिर सोचना विशु. उत्कर्ष के पृथ्वी पति की क्रोधाग्नि झेलने का भी कोई प्रबंध किया है?

विशु – महाराज श्री नरसिंह देव की कोधाग्नी? उसे तो करुणा की फुहारे क्षण भर में शांत कर देती है.

सौम्य – लेकिन वही फुहारे जब गर्म तवे पर पड़ती है. तो उसकी जलन और भी बढ़ जाती है और फुहारें छू मंतर हो जाती है.

विशु – तुम्हारा मतलब ?

सौम्य – उत्कल नरेश का क्रोध चाहे चाहे क्षणिक भले ही हो, लेकिन महामात्य राजराज चालुक्य उसे प्रज्वलीत रखते है और उन्होंने दया से पसीजना नहीं सिखा है.

विशु – महामात्य चालुक्य राज्य के सब कुछ नहीं है.

सौम्य – तुम भ्रम में हो, बंधू माहाराज नरसिहं देव तो बंग प्रदेश में यवन को पराजित करने में लगे है, और लोग कहते है, राजनगरी में महामात्य ही आजकल सर्वेसर्वा है.

राजीव – तात दूर दूर से आने वाले शिल्पी, महामात्य द्वारा किये गए अत्याचारों के समाचार लाते है. उनमे से कितनो के ही कुतुम्बो पर महामात्य के अन्याय का हथौड़ा पद चूका है. दिन प्रतिदिन तरह तरह की आशंका जनक खबरे आ रही है.

सौम्य – सुना है अब तो महादंडपाशिक के सब अधिकार भी उन्होंने हथिया लिए है.

राजीव – तब तो सारे दंडपाशिक सैनिक उनके अधीन होंगे.

सौम्य – वही तो राज्य सेना तो बंग प्रदेश में यवनों से लड़ रही है और इधर दंडपाशिक सैनिको के बल पर महामात्य की शक्ति दिन प्रतिदिन बढती ही जा रही है.

विशु – किसी की शक्ति बढ़े और किसी की घटे हमें तो कोणार्क को पूरा करना है.

राजीव – यदि आप धर्मपद की बात सुने तो शायद अपना विचार बदल डाले तात!

सौभ्य – धर्मपद कौन?

राजीव – एक किशोर शिल्पी हाल ही में आया है. आयु तो अल्प है. शायद १६ वर्ष भी नहीं, किन्तु बुद्धि तीक्ष्ण, आपसे मिलना भी चाहता है.

विशु – क्यों?

राजीव – साफ़ नहीं बताया, विचित्र जीव है, कभी तो मौन हो मंदिर के कलश की और निर्निमेष देखना रहता है और कभी भी अल्प समय में ही चमत्कारपूर्ण मूर्तिया तैयार कर देता है. कीर्तिस्तम्भ पर गायकों के रूप उसी ने उत्कीर्ण किये है.

विशु – एक १६ वर्ष के किशोर ने? राजीव, मैं उससे मिलूँगा.

राजीव – कहिये तो अभी बुला लाऊं? तात, उसकी ओजमयी वाणी नहीं चाहिए, राजीब मेरी कला में जीवन का प्रतिबिम्ब और उसके विरुद्ध विद्रोह दोनों सन्निहित है, तुम उस किशोर को बुला लाओ. मेरी दृष्टी के स्पर्श से उसकी प्रतिभा की गंध जागृत होकर उसकी वाणी को मौन कर देगी. मुझे उसकी कला चाहिए.

सौम्य – मुझे भी उसकी कला चाहिए .

विशु – क्या उसे नृत्य संगीत सिखाओगे बंधू?

सौम्य – नहीं सौचता हूँ मेरी मूर्ति तुम तो पूरा करने से रहे. इधर मैं तैयार खड़ा हूँ. यह प्रतिभावान किशोर ही पूरा कर देगा.

विशु – यह कैसे हो सकता है? लाओ अभी पूरा करता हूँ. छेनी हथोडा से प्रस्तरखंड पर अधूरी मूर्ति सौम्य श्री तत्पर मुद्रा में खड़ा है.

सौम्य – कितनी देर वेश भूषा में खड़ा रहना पड़ेगा?

विशु – थोड़ी ही देर जल्दी है.

सौम्य – नहीं प्रतिष्ठापन में जितनी ही देरी हो रही है उतना ही समय मुझे मिल जाता है. संगीतक की तैयारी के लिए.

विशु – सौमु, अगर कोणार्क पूरा नही हुआ तो उसे नष्ट करना होगा, और मुझे पातकी का प्रायश्चित करना होगा.

सौम्य – शिल्पी तुम विष्णु हो, शंकर नहीं, निर्माता हो संहारक नहीं, और फिर ये स्तम्भ और ये पाषाण इन्हें तो भूकंप ही गिरा सकते है, अथवा कला की गति.

विशु – सौमू जिन चुम्बक पत्थरो के आकर्षण से सूर्य भगवान की मूर्ति निराधार स्थित है, तुमने उसे ध्यान से देखा है?

सौम्य – क्या उनमे भूकंप की शक्ति भरी है?

विशु – सुनो एक रहस्य की बात ठीक बीच में जो चुम्बक है उससे ही मूर्ति बड़े वेग से गिर पड़ेगी. और भूकंप की भाती ही मंदिर की शिलाए और स्तम्भ गिरने लगेंगे. राजीब का प्रवेश साथ में एक और युवक आयु लगभग १८ वर्ष सावला रंग. उसके दृढ़ कपोल, तजोमयी आखे, घुंघराले बाल घोषित करते है कि वह असाधारण वृत्ति का व्यक्ति है. तंग अंगरखा और ऊँची धोती पहने है. राजीव के पीछे-पीछे आकर द्वार के निकट खड़ा होता है. जब विशु से बाते करता है, तब उसकी दृष्टी मानो विशु की काया के नीचे अन्तर्निहित किसी पुरातन विशु को खोजती है.

राजीव – आचार्य यही वह युवक है धर्मपद

विशु – सुना है तुम आशु शिल्पी हो. इतनी छोटी आयु में तुम्हे किस गुरु ने दीक्षा दी?

धर्मपद – किसी ने नहीं आचार्य मैं शिल्पी बना, क्यों कि मुझे जीवित रहना था.

विशु – कला तुम्हारा जीवन है, यही न?

धर्मपद – जीवन भी है और जीवन यापन का साधन भी.

विशु – वह सारे जीवन का प्रतिबिम्ब है देखो हमारे कोणार्क देवालय को आँखे भरकर देखो. यह मंदिर नहीं सारे जीवन की गति का रूपक है. हमने जो मूर्तिया इसके स्तम्भों, इसकी उपपीठ अधिस्थान में अंकित की है उन्हें ध्यान से देखो. देखते हो, उनमे मनुष्य के सारे कर्म, उसकी सारी वासनाएँ, मनोरंजन और मुद्राए चित्रित है. यही तो जीवन है.

धर्मपद – क्षमा करे आचार्य श्रृंगार मूर्तियों को देखते-देखते मैं अघा गया हूँ.

सौम्य – अभी से? युवक किसी रमणी के सामने यह बात न कह देना, नहीं तो तुम्हे अविवाहित रहना पड़ेगा.

विशु – गंभीर होकर तो तुम उन लोगो में हो जो इन प्रणय मूर्तियों में अश्लीलता देखते है, जीवन का आदि और उत्कर्ष नहीं?

धर्मपद – जीवन के आदि और उत्कर्ष के बीच एक और सीढ़ी है जीवन का पुरुषार्थ अपराध क्षमा हो आचार्य आपकी कला उस पुरुषार्थ को भूल गई है. जब मैं इन मूर्तियों में बंधे रसिक जोड़ों को देखता हूँ तो मुझे याद आती है. पसीने में नहाते हुए किसान की, कौसो तक धारा के विरुद्ध नौका को खेने वाले मल्लाह की, दिन दिन भर कुल्हाड़ी लेकर खटने वाले लकडहारे की इनके बिना जीवन अधूरा है, आचार्य.

विशु – लेकिन कला नहीं, कला की पूर्ति चयन में है. छाटने में जंगल में तरह-तरह के फूल, पौधे, वृक्ष चाहे जहाँ उगे रहते है. लेकिन उपवन में माली छाँट- छाँटकर सुन्दर और मनमोहक पौधो और वृक्षों को ही रखता है.

धर्मपद – छाँटने वाली आखों का खेल है, आचार्य आज के शिल्पी की आखें वहाँ नहीं पड़ती, जहाँ धूल में हीरे छिपे पड़े है.

राजीव – मैं ठीक कहता था न तात धर्मपद तर्क निपुण है?

धर्मपद – मैं तर्क करने नहीं आया हूँ. मैं तो एक ऐसे संसार की और आपका ध्यान खींचना चाहता हूँ जो कि आपके निकट होते हुए भी आपकी आखो से ओझल हो गया है. इस मंदिर में वर्षो में १२०० से अधिक शिल्पी काम कर रहे है. इनमे से कितनो की पीड़ा से आप परिचित है? जानते है आप कि महामात्य के भ्रत्यो ने इनमे से बहुतो की जमीन छीन ली है. कइयो की स्त्रियों को दासियों की तरह काम करना पड़ रहा है, और उधर सारे उत्कल में अकाल पद रहा हिया.

विशु – तुम समझते हो कि हम लोग को यह सब मालुम नहीं है लेकिन राज्य की बातों में पड़ना शिल्पियों के लिए अनुचित है.

धर्मपद – मगर यह भी तो उचित नहीं कि जब चारों और अत्याचार और अकाल की लपटे बढ़ रही हो, शिल्पी एक शीतल और सुरक्षित कोने में यौवन और विलास की मूर्तियाँ ही बनाता रहे. अगर मुझे माहाशिल्पी के अधिकार मिलते होते है.

सौम्य – तो तुम कोणार्क को अब तक कभी का पूरा कर चुके होते है.

धर्मपद – मगर यह भी तो उचित नहीं कि जब चारो और अत्याचार और अकाल की लपते बढ़ रही हो, शिल्पी एक शीतल और सुरक्षित कौने में यौवन और विलास की मूर्तिया ही बनाता रहे. अगर मुझे महाशिल्पी के अधिकार मिलते होते तो.

सौम्य – तो तुम कोणार्क को अब तक कभी का पूरा कर चुके होते.

धर्मपद – पूरा करना अब भी कठिन नहीं.

सौम्य – क्या ? धर्मपद तुम भूल रहे हो कि तुम महाशिल्पी आचार्य विशु के सामने खड़े हो. पिछले दस दिन से निरंतर चेष्टा करने पर भी ये मंदिर पर कलश स्थापित नहीं कर सके और तुम शास्त्रीय अध्ययन और अनुभव से शून्य तुम कहते हो, इसे पूरा करना कठिन नहीं. अपनी शक्ति से बाहर की बात न करो युवक.

विशु – जो अब तक मौन हो इस वार्तालाप को सुनता रहा है, नहीं सौम्य मुकुन्द उसे अपनी बात कहने दो, बोलो युवक, क्या तुम अम्ल के ऊपर शिखर को स्थापित कर सकते हो? करोगे, सोच समझकर उत्तर दो, यह साधारण समस्या नहीं है.

राजीव – आचार्य – माहामात्य आ रहे है.

विशु – चालुक्य? जी आ रहे है ? और वो भी यहाँ पर , और बिना सुचना दिए?

राजीव – जी हाँ कई अश्वारोही साथ है, सुनिए.

सौम्य – महादंड पाशिक, सुना तुमने विशु? यह कहकर सभी बाहर झाककर देखते है.

विशु – ऐसी जल्दी में महामात्य का हम यथोचित स्वागत कैसे कर सकते है? राजीव ने अन्दर से वेत्रासन तो ले आओ, युवक तनिक इस पोशाक और चादर को भलीभाति रख दो सौम्य माह्मात्य प्राचीर के अन्दर आ गए?

सौम्य – खिड़की से मुँह हटाते हुए. वे यही सीधे आ रहे है, विशु महामात्य का इस तरह सहसा आना मुझे अच्छा नही लगता, विशु.

राजीव – आचार्य वे आ गए – दो प्रतिहारियों का प्रवेश प्राचीन भटो का वेश, कंधो पर गदा या खड्ग. अन्दर आकर द्वार के दोनों और खड़े हो जाते है. उसके बाद महामंत्री चालुक्य आते है. पुष्टकाय आयु लगभग ४५ मुख पर क्रूर मुद्रा, बड़ी-बड़ी मुछे. नेत्र छोटे है और बाते करते समय और संकुचित लगते है. बातचीत के वक्त भौहे सुकड जाती है और बाए हाथ से ठुड्डी सहलाते भी है. पोषाक पुराने ढंग से बाँधी हुई धोती, रेशमी उत्तरीय, सुवर्ण मस्तक पर, बाजू पर एक बाजूबंद, कमर में कटार, उत्तरीय कुछ लटक रहा है और एक हाथ से उसे पकड़ते हुए वेग से अन्दर आते है. और अभ्यर्थना की उपेक्षा करते हुए बैठ जाते है. धर्म पद बीच वाले दरवाजे के पास खड़ा है. सौम्य श्री खिड़की के पास, राजीव दरवाजे के निकल और विशु सबके बीच के कुछ आगे सभी लोग झुककर महामात्य को प्रणाम करते है, कुछ क्षण के लिए स्तब्धता.

चालुक्य – कमरे के सभी व्यक्तियों पर सरसरी निगाह डालकर फिर विशु पर आख्ने ठहरा देते है. तुम जानते हो मैं क्यों इस तरह सहसा आया हूँ.

विशु – आर्य के आने की कोई पूर्व सूचना नहीं मिली.

चालुक्य – सूचना देना, तो तुम लोगो का भंडा फौड़ कैसे होता?

विशु – विशु  ने कहा

चालुक्य – राजनगरी में मैंने ठीक सुना था कि कोणार्क में राज्य कौष नष्ट हो रहा है. न शिल्पी लोग ठीक काम कर रहे है न मजदूर. दस दिन हो गए कलश तक स्थापित न हो सका.

विशु – हम लोग बराबर उसी चेष्टा में लगे हुए है.

चालुक्य – चेष्टा में लगे हुए है. यहाँ तो मैं देखता हूँ गप्पे हो रही है. सहसा धर्मपद पर दृष्टी पड़ जाती है. बाते करते हुए और यह युवक क्यों खड़ा है.

धर्मपद – मैं, आचार्य के सामने शिल्पियों की दुःख गाथा कह रहा था.

चालुक्य – शिल्पियों की दुःख गाथा? प्रतिहारी, इसे धक्का देखर निकालो. मुफ्तखोर कहीं का.

धर्मपद – मैं आप ही जाता हूँ | बीच वाले दरवाजे से प्रस्थान, आहत अभिमान की मुद्रा में |

विशु – महामंत्री, आपके शब्द बहुत कटु है. उसे तो मैंने ही-

चालुक्य – कटु शब्द अब कटु शब्दों से काम नहीं चलेगा विशु. मैंने सुना है कि शिल्पी लोग राज्य के विरुद्ध सर उठा रहे है, सुवर्ण मुद्राओं में वेतन माँगते है|

सौम्य – महामात्य आपको किसी ने बढ़ाकर खबर दी है| सुवर्ण मुद्रा भला ये बेचारे क्या मांगेंगे हाँ, यह अवश्य है कि इस अकाल के समय उनके कुतुम्बो पर महान कष्ट आ पड़ा है.

चालुक्य – देखता हूँ नाट्याचार्य तुम भी इन लोगो से मिले हुए हो| मंदिर पूरा होना तो अलग रहा, यहाँ  तुम लोग मिलकर राज्य पर दबाव डालने के लिए अभिसंधि कर रहे हो.

विशु – महामंत्री मेरी भी सुनिए

चालुक्य – चुप रहो मैं तुम जैसे लोगो को राह पर लाने की युक्ति भली भांति जानता हूँ, विशु वर्षो से बिन माँगी प्रशंसा सुनते-सुनते तुम अपने को दंडविधान से परे समझने लगे हो आज मैं तुम्हारे इस घमंड को चूर करने ही आया हूँ. सुन लो और कान खोलकर सूत्र लो. आज से एक सप्ताह के अन्दर यदि कोणार्क देवालय पूरा न हुआ, तो तुम लोगो के हाथ काट दिए जायेंगे.

विशु – शिल्पियों के हाथ काट लिए जायेंगे?

चालुक्य – हाँ, शिल्पियों के हाथ काट लिए जायेंगे आज से आठवे रोज या तो मंदिर में सूर्यदेव की मूर्ति का प्रतिष्ठान होगा या तुम बारह सो व्यक्तियों की भुजाओं पर प्रहार.

चालुक्य – महाराज नरसिंहदेव की आज्ञा है. और मेरी महादंडपाशिक की आज्ञा है | अचानक थौड़ी देर बाद नेपथ्य से दूर होता स्वर सावधान, सावधान महादंडपाशिक राजराज चालुक्य पधारते है. इधर मंच पर सब लोग खड़े है.

राजीव – अब क्या होगा?

सौम्य – राजनगरी में अपराधियों के हाथ कटते मैंने देखे है. बड़ी पीड़ा होती है.

विशु – शिल्पियों के हाथ काट लिए जायेंगे?

चालुक्य – हाँ महाराज नरसिंह देव आज्ञा है. और मेरी महादंड पाशिक की आज्ञा है. थोड़ी देर से बाद नेपथ्य से दूर होता हुआ स्वर सावधान महादंडपाशिक राज राज चालुक्य पधारते है. और इधर सब लोग मंच पर सब लोग चुप खड़े है.

राजीव – अब क्या होगा?

सौम्य – राजनगरी में अपराधियों के हाथ कटते मैं देखे है, बड़ी पीड़ा होती है.

विशु – उत्कल नरेश कि आज्ञा? महाराज मेरी बरसो की सेवाओं पर इतना भीषण कुठाराघात करेंगे.

सौम्य – क्या मालूम उत्कल नरेश की आज्ञा है, या महामात्य का अपना उत्पात. हमारे पास साधन भी नहीं समय भी तो नहीं कि? महाराज के मन की बात जान सके. वे अभी तक वंग विजय के उपरांत लौटे भी नहीं है.

राजीव – सात दिन केवल सात दिवस के बाद हम सबो के हाथ काट लिए जायेंगे?

सौम्य – ये हाथ?

राजीव – क्या कोई उपाय नहीं आचार्य?

धर्मपद – एक उपाय है.

सौम्य – धर्मपद

राजीव – तुम फिर आ गए? तुमको तो….

विशु – युवक, वह तुम्हारा अपमान नहीं, मेरी प्रताड़ना थी.

धर्मपद – आचार्य ठोकर खाकर धूल सिर पर चढ़ती है.

सौम्य – सिर पर चढ़ने के सपने छोड़ दो युवक कोणार्क के प्रांगण में सात रोज बाद उत्कल के समस्त शिल्पियों का रक्त बहेगा.

धर्मपद – मैंने सुना है. मैं बाहर पास ही खड़ा था.

विशु – युवक, विनाश का वह संदेश अपने साथियो को भी सुना दो साहस नहीं कि उस विकराल घड़ी के लिए उन्हें तैयार कर संकू.

धर्मपद – निर्दय अत्याचार की छाया में ही जो विकसते और मुरझाते है, उनको एकाध विपत की घड़ी के लिए तैयार होने की जरुरत नहीं आर्य. लेकिन मैं कहता हूँ इसकी नौबत ही क्यों आये?

विशु – मेरी बुद्धि काम नही दे रही है.

धर्मपद – मुझे अवसर दे आचार्य .

विशु – तुम्हे?

धर्मपद – महामंत्री के आने से पहले आपने मुझसे पूछा था. क्या तुम अम्ल के ऊपर शिखर को स्थापित कर सकोगे? मेरा उत्तर है. आचार्य कि मुझे अवसर दिया जाए.

विशु – यदि अवसर दिया जाये तो तुम क्या करना चाहोगे?

धर्मपद – आचार्य, मुझे लगता है कि कोणार्क के कमल की पंखुड़िया उल्टी है. उन्हें पलट देने पर कलश शायद ठहर सकेगा.

सौम्य – कोणार्क का कमल?

राजीव – तुम्हारा मतलब छप्र के ऊपर कमलाकार अम्ल से है?

धर्मपद – जी इसके हरेक पटल को फिर से इस तरह रखा जाए कि जो बाहरी हिस्सा है वह अन्दर केंद्र  पर हो और जो नुकीला भाग है, वह बाहर निकले तो उसकी आकृति खिले कमल की सी हो जाएगी, कली की सी नहीं. लेकिन कलश स्थिर रहेगा.

विशु – मानो अंधे को टिमटिमाता प्रकाश दिखा हो. युवक तुम्हारी बात सारहीन नहीं जान पड़ती. अम्ल के केंद्र पर शायद अधिक भार देने से कलश की यष्टि को सहारा मिले.

धर्मपद – मेरे मन में जो चित्र है उसे यो पूरी तरह तो नहीं समझा सकता किन्तु देखिये, अम्ल का आकार यदि कुछ इस तरह का हो.

विशु – इस बात में कुछ तथ्य है, शायद अम्ल के बाहरी भाग पर इस समय अनुपात से अधिक भार है. हम उस भार को हल्का कर सके. तुम ठीक तो कहते हो युवक तुम ठीक कहते हो, भार को हल्का करने के लिए अगर पटल को अन्तर्मुखी कर दिया जाए तो सम्भव है. धर्मपद मेरे साथ अभी चलो हम छप्र के ऊपर चढ़कर अभी तैयारी करेंगे. पटल बदलने की.

धर्मपद – ठहरिये

विशु – मानो स्वप्न भ्रष्ट हुआ हो.

धर्मपद – ठहरिये यदि मेरी युक्ति सफल हो जाए और कोणार्क शिखर को हम स्थापित कर सके तो मुझे क्या मिलेगा.

विशु – तुम क्या चाहते हो? जो कुछ मेरे हाथ में है तुम्हे दूँगा.

धर्मपद – मैं चाहता हूँ कि यदि शिखर पूरा हो जाए तो एक दिन के लिए सिर्फ एक दिन के लिए मंदिर प्रतिष्ठान के दिन आप अपने सब अधिकार मुझे दे दे.

विशु – अगर कोणार्क पूरा हो जाता है तो एक दिन क्या सभी दिन के लिए वे अधिकार तुम्हारे हो जायेंगे मैं तुम्हे अपने स्थान पर शिल्पी बना दूँगा.

राजीव – यह आप क्या कह रहे है. महाशिल्पी

विशु – मैं ठीक कह रहा हूँ इस युवक की प्रतिभा ने मुझे मुग्ध कर लिया है. राजीव तुम नही जानते. मुझे प्रधान के पद से कोई मौह नहीं मोह है तो यही कि कोणार्क पूरा हो जाए अब इस युवक ने ठंडी होती हुई राख को फूंक मार कर प्रज्वलित कर दिया है मेरे हाथ मेरी भावनाए इसी क्षण कोणार्क को पूरा करने के लिए आतुर है.

 

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