चारू चन्द्र की चंचल किरणें

चारू चन्द्र की चंचल किरणें खेल रही है जल थल में,

स्वच्छ चाँदनी बिछी हुई है अवनि और अम्बल में.

पुलक प्रकट करती है धरती हरित तृणों की नौकों से,

मानो झूम रहे है तरु भी मंद पवन के झोकों से.




सन्दर्भ प्रसंग – प्रस्तुत पद्याश राष्ट्रकवि मैथलीशरण गुप्त द्वारा रचित पंचवटी खंडकाव्य से है. यहाँ पर कवि ने पंचवटी के रात्रिकालीन प्राकृतिक सौन्दर्य का वर्णन किया है.

चारू चन्द्र की चंचल किरणें

चारू चन्द्र की चंचल किरणें

व्याख्या – सुन्दर चन्द्रमा की चंचल किरणें जल और स्थल पर क्रीड़ाये कर रही है. चन्द्रमा की स्वच्छ, सफ़ेद चाँदनी पृथ्वी और आकाश में फैली हुई है. इस चाँदनी के स्पर्श से पृथ्वी हर्षित है. वह अपनी इस प्रसन्नता को हरी भरी घास के तिनकों की नौकों द्वारा प्रकट कर रही है. वृक्ष भी ऐसे लग रहे है, मानो वे वायु के मंद – मंद झोकों से स्पर्श पाकर आनंद के साथ झूम रहे हों.

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