जननी माता की कहानी Hindi Story


मातृभूमि जगत जननी माता की कहानी

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जननी माता की कहानी Hindi Story

जन्मभूमि जननी माता के ऊपर एक प्रेरक कहानी खास आपके लिए

मैं अपनी पहली यात्रा से स्वदेश लौट रहा था. लगभग डेढ़ वर्ष के प्रवास के बाद. यूरोप में कुछ दिन बिताये पर घर पहुचने की उत्कंठा बड़ी तीव्र थी, कार्यक्रम थोडा काटा और तेहरान से वायुयान चला तो बस मौसम बहुत ख़राब है, वायुयान कराची उतारा जा रहा है. बड़ी कोफ़्त हुई. ख़ैर करांची उतरा तो वहाँ एक तनाव की सी स्थिति थी. पुर्तगाली गोवा से भाग रहे थे. बड़ी संख्या में करांची में उनका दल वायुयानों की प्रतीक्षा में हवाई अड्डे पर पसरा हुआ था. हिन्दुस्तानी नागरिको को अलग घेरे में डाल दिया गया बाहर जा नहीं सकते थे.




वहाँ स्नान की भी व्यवस्था बड़ी वैसी थी. इतने में एक व्यक्ति आया और भौजपुरी में बोला पंडित जी आपका घर बनारस के आस पास तो नहीं है? मेरा भी वतन वही है और तब बातचीत शुरू हो गई और तब कानून की कैद नहीं रही, मेरा हमवतन मुझे करांची की सैर करा लाया, बेहद खातिर और दूसरी उड़ान की सारी व्यवस्था कर दी. विदा लेने लगा तो उसकी आखें नाम थी, बोला मुल्क बदल जाए तो बदल जाये पर वतन तो वतन होता है, गंगा और गंगा के कछार से मेरा सलाम कहे. तब मुझे याद आया कि लंका के आतिथ्य सत्कार को अस्वीकार करते हुए भगवान रामचंद्र ने कहा था.

|| अपि स्वर्णमयी लंका न में लक्ष्मण रोचते

जननी जन्म भूमिश्च स्वर्गादपी गरीयसी ||  

लक्ष्मण लंका सोने की ही क्यों न हो, मुझे नहीं रुचती. जननी माता और जन्मभूमि स्वर्ग से अधिक गौरवशाली होती है. राम की उक्ति की सार्थकता यकायक मेरे हम वतन पाकिस्तानी की आखों से झलमला गई. मनुष्य उभर कर ऊपर आ जाती है. राष्ट्रीयता के दायित्व का वरण एक चरम मानवीय मूल्य के आगे कुछ छोटा पड़ जाता है. इससे राष्ट्रीय भावना की क्षति नहीं होती, वह भावना भी और संस्कृत होती है, क्योकि तभी व्यक्ति दुसरे की भावना को आदर देना सीखता है, देश भक्ति का सही अर्थ पाता है.

देशभक्ति मानवीय मूल्यों की कीमत पर पाना, पाना नही. देश का वरण न जाने किन-किन दबावों और जरूरतों से आदमी करता है पर माँ का कोई वरण नहीं करता, न कोई जन्मभूमि (जननी माता) का वरण करा है. वह माँ का बस बेटा होता है. (जननी माता) जन्मभूमि का, माटी का बस हो जाता है, जो मनुष्य इस अपने आप बरसे प्यार को भूल जाएगा, वह किसी निष्ठा के योग्य नहीं रहेगा. जिसको माँ से प्यार होगा, वतन से प्यार होगा, वही दूसरे मनुष्य को, दूसरे के वतन को प्यार दे सकेगा, उसके प्यार को आदर दे सकेगा, कानूनी आदर भाव नहीं, भीतर से आदर से सकेगा.

माँ जब देती है, वतन जब देता है, तो हमें उस समय कहाँ सुधि रहती है कि हम कुछ पा रहे है, उस समय तो हमारा धीरे धीरे पलना बढ़ना और इनके प्यार का बरसना एक साथ घटित होते रहते है, मानो उनका देना ही हमारा आकार बन रहा हो. माता और जन्मभूमि के स्नेह के पिंड के सिवा हम है क्या? उसी दिल्ली उतरने के पहले मुझे याद आया, विवाह के पूर्व का एक लोकाचार. हमारे क्षेत्र में वर जब विवाह करने चलता है तो अपने घर से निकलता है, गाव के देवी देवताओं की परिक्रमा करता है, अंत में माँ से विदा लेता है और उससे कहा जाता है कि माँ का एक बार दूध पियों. दूध पीने की केवल रस्म अदा की जाती है और एक गीत गाया जाता है.

|| जात है पूता तू त गौरी बियाहन गौरी बिहायन

दुधवा के मोल दइ जाऊ

गइया के दुधवा टी हटिया बिकाला टी बटिया बिकाला

भाई के दूध अनमोल ||

पुत्र तुम गौरी सी सुलक्षण कन्या ब्याह्ने जा रहे हो, दूध का मोल चुकाते जाओं. गाय का दूध हाट में बिकता है, बाट में बिकता है, माँ के दूध का कोई मूल्य चुकता नहीं कर सकता है. (जननी माता) जन्म जन्मान्तर में भी कोई इसका ऋण नहीं भर सकता है. मैंने इस गीत की गूंज मन में सुनी और मेरी आखें छलछला उठी.

दिल्ली की जमीन पर उतरा मैंने अपनी जन्मभूमि (जननी माता) को प्रमाण किया. कौन स्वर्ग मुझे प्यार देता, जितना इस भूमि ने दिया है, अमरीका में ही था तो एक दिन एक हमवतन घर आ टपके और उसी समय एक अमेरिकी नीग्रो कवि भी. दोनों ने चाय पी, बहस शुरू हुई, भारत में जन्मे और अमरीका के अन्न से दसेक वर्षों तक पले भारत के सपूत बोले हिन्दुस्तान में नहीं लौटूंगा एक घोर नरक है, सांप बिच्छु, गर्द गुबार का देश है. वहाँ का आदमी एकदम जाहिल है, बेईमान है.

न वहाँ भौतिक सुख सुविधा है, न कोई आध्यात्मिक गहराई ही और अमरीका स्वर्ग है, कम से कम चार सो वर्षों तक पृथ्वी पर यही एकमात्र देश है, जो स्वर्ग बना रहेगा. मेरा नीग्रो कवि मित्र बिफर पड़ा सिर्फ चार सो वर्ष, इस स्वर्ग ने बड़ी कम उम्र पाई और यह बतलाओ कि यह कचरा फेंक उपभोक्ता सभ्यता का देश यह आदमी और आदमी के बीच अदृश्य झिल्ली की दिवार बनाने वाली संस्कृति का देश, यह खरीदो-खरीदो के पागलपन वाला देश अगर स्वर्ग है तो फिर नरक कहाँ है ? किसी तरह मैंने दोनों का बीच बचाव किया, पर स्वयं भीतर उद्वेलित हो गया स्वर्ग तलाशने की यह लाचारी क्यों आती है और अपने दिए गये स्वर्ग से विरक्त क्यों नहीं होती है ? यह पहेली बड़ी अनबुज पहेली है.

मन देश के लिए, देश की छोटी-छोटी चीजों के लिए तरसता रहता है, तब भी स्वर्ग को नहीं छोड़ पाता, स्वर्ग के प्राणी उसे दुतकारते है, अपमानित करते है, विडम्बना यह है कि स्वर्ग में द्वितीय श्रेणी के नागरिक का अधिकार पाने के लिए व्यक्ति अपने देश की सरकार से अपेक्षा रखता है. क्योकि वह समझता है, मैं देश को विदेशी मुद्रा देता हूँ वह यह भूल जाता है कि (जननी माता) मात्रभूमि और स्वर्ग में अंतर है, मातृभूमि तो आपकी लात भी सहती है, स्वर्ग नहीं सहता, भगवान रामचंद्र जी ने और भगवान कृष्ण ने स्वर्ग की उपेक्षा झूठे ही नहीं की.

मेरे मन में विचार बहने लगे. मनुष्य हाडमांस ही नहीं है, वह कुछ और भी है, वह हवा पानी, मिटटी का स्पर्श भी है, एक ऐसा रंग भी है, जो उसे सूरज से मिलता है, जिसे बचपन के आकाश में उगते, उठते और ढलते उसने देखा है, जो उस अलाव की आग से आता है, जिसके आस पास बैठे बैठे कहानियाँ सुनी है, सोने वाले लड़के को गुदगुदाकर जगाया, हँसमुख साथी को चिकोटी काटी और एक ऐसी गूंज से आता है, जो निबिड़ एकांत में, घोर असहायता और निरुपायता का कही पता नहीं रहा, बेगाने अपने हो गए है और ऐसे आदमी के लिए बहिश्त की कोई हकीकत नहीं रह जाती, स्वर्ग की कोई कामना नहीं रह जाती तब एक कामना रह जाती है.

|| मुझे तौड लेना वन वाली उस पथ पर तुम देना फेंक

मात्रभूमि पर शीश चढाने जिस पथ जाते वीर अनेक ||

यह कामना आज बड़ी रूमानी कामना लगती है, क्योकि स्वर्ग कुछ अधिक लुभावना हो गया है, स्वर्ग इसलिए लुभावना हो गया है कि दूसरे के सुख और दूसरे के दुःख की चिंता कम हो गई है, अपना सुख कुछ भारी पड़ने लगा है, पर नहीं मैंने दूसरी तरह के प्रवासी भारतीय देखे है, जो साफ़ कहते है कि हम इस नरक में सिर्फ इसलिए रह रहे है कि हमारे बच्चे अच्छी शिक्षा पा सके, उन्हें ऐसे नरक की विवशता न सताये.

ये भारतीय बहुत धनी होने नहीं जाते, बहुत गरीब न रहे, इसलिए जाते है और तथा कथित स्वर्ग में अपनी (जननी माता) जन्मभूमि से जुड़े रहते है. वे जन्मभूमि पर दावा भी नहीं करते, पर गर्व जरुर रखते है. बेंकाक, सिंगापूर, वियतनाम, क्वालालम्पुर. जकार्ता इन तमाम शहरो में मुझे ऐसे भारतीय मिले , बड़ी आत्मीयता से मिले, अपनी पूरी व्यावसायिकता छोड़कर मिले. इनके साथ मैं गावों में गया तो देखा कि गाँव के लोग इतने प्यार से अपनी भाषा में इनसे बात कर रहे है, शिकायत कर रहे है कि आप तो भूल गए, इधर आते ही नहीं, मैं दंग हो गया.

मेरे एक मार्गदर्शक अंग्रेजी नहीं जानते थे, परिमार्जित हिंदी भी नहीं जानते थे, पर भौजपुरी और थाई दोनों भाषाओ में समान अधिकार रखते थे. उन्हें थाई लोगों से प्यार था. पर जब उनसे मैंने पूछा कि बुढ़ापा कहाँ काटना चाहेंगे तो बोले, अपनी भुइया अपनी भूमि में मरते समय अपने आगन की तुलसी के दो दल और गंगाजल को एक बूंद मिल जायेगी. और मैंने पाया कि इस आदमी की दुविधा एक मानवीय दुविधा है, वह अपनी निजता का प्रतिबिम्ब तो पाना चाहता है, पाकर तृप्त भी होता है, पर अपनी निजता को खोना नहीं चाहता कंठगत प्राण की तरह उसे बचाए रखना चाहता है.

शायद अपनी जड़ से इतना लगाव न होता तो इतना प्यार अनायास दूसरे से पाने का उसे सोभाग्य प्राप्त नहीं होता. मैं कुछ बहक गया, बात चली थी स्वर्ग से मात्रभूमि की तुलना की. स्वर्ग से (जननी माता) मातृभूमि इसलिए ही शायद बड़ी है कि स्वर्ग का भोग करने वाले अपने को ऊँचा समझने लगता है, मातृभूमि से प्यार करने वाला विनम्र बना रहता है, यह समझने के लिए कि जैसे अपनी भूमि के लिए तडपता है, वैसे ही दूसरा भी तो तडपता होगा.

बडप्पन कही रहने या कही न रहने से नहीं आता है, आता है दुसरे को बडप्पन देने से, दुसरे के दुःख को अपना दुःख मानने से, अपभ्रंश का एक पुराना दौहा है, जिसका भावार्थ है, यदि तुम पूछते हो बड़ा घर कौन है, तो देखो वह छोटी सी टूटी फूटी झोपडी, उसमे सबसे प्यारे बंधू रहते है, जो कोई भी कष्ट में हो, उसक कष्ट का निवारण करने के लिए उसकी तरफ से जूझने के लिए तत्पर रहते है, वह झोपडी इस देश का सबसे बड़ा घर है.

|| जो पुच्छई बड्डाई घर सो बड्डा घर ओई

विब्भलजनअब्भुध्दरणकंत कुड़ीरई जोई ||

मेरे देश के सबसे बड़े घर है श्री राम के चित्रकूट की कुटिया, राधा की वह गौशाला जिसमे श्री कृष्ण उनकी गाय दुहने जाते थे, बुद्ध की वह आम की बगीची का डेरा जिसे उन्होंने वैशाली की नगरवधू अम्बपाली से भिक्षा में लिया था, महात्मा गाधी की साबरमती आश्रम में सीधी सादी कुटिया जो सही अर्थ में ह्रदय कुंज है.

आजादी की लड़ाई में कैदखाना भी बड़ा घर हो गया था. ऐसे बडप्पन का अहसास किस गहरी मानवीय ममता में आता है, उसकी फसल किसी स्वर्ग में तैयार नहीं हुई, ऐसी फसल का दाना चखने के लिए ईश्वर को बार – बार भूमि पर उतरना पड़ा है और उन्हें जन्मभूमि की ही ममता ने जन-जन का आराध्य बनाया है. श्री कृष्ण को ब्रज नहीं बिसरता राम को सरयू माँ की तरह पुकारने लगती है और विरक्त शंकराचार्य को मुमूर्ष माँ की पुकार पर पेरियार के तट पर आना पड़ता है.

मुझे तो स्वर्ग को कोई स्वाद मालूम नहीं, लेकिन मठके निकले ततके नेनू के साथ माँ के द्वारा परसी गई उस रोटी का स्वाद कुछ अलग होता है, इतना जानता हूँ और जानते रहना चाहता हूँ इसलिए जन्मभूमि के बाहर निकलने पर वापिस आते समय अपूर्व सुख मिलता है, उस सुख पर अमरीका वाले अपने भारतीय हमवतन के चार सौ साला स्वर्ग हजार बार न्योछावर है

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