धूपगढ़ की कहानी Hindi Story


प्रकृति के सौन्दर्य कहे जाने वाले धूपगढ़ की कहानी

धूपगढ़ के बारे कहाँ जाए तो समय की डाली पर सुबह और सांझ के दो फुल खिले है. दोनों का वर्ण एक होते हुए भी सुगंध भिन्न भिन्न है. दोनों, दो समय स्थितियों के प्रस्थान बिंदु है. वसुंधरा पर मासूम रंगों की अदृश्य कुंची से उकेरे जाने वाले दिक्काल के उद्गम है. सुबह पखेरुओं के पंखो पर गतिमान होकर गए देश क्षितिज तक जाती है. सांझ उन्ही पंखो पर ढेर सारा आत्मविश्वास और कर्म पूर्णता की तृप्ति लेकर अपने घर गाँव लौटती है. सबेरा पावों में पंख लगाकर जीवन को अग्नि कण चुनने भेजता है.




सांझ अग्निमय जीवन को कल्याणी शीतल आँच के साथ घर लौटाती है. पिता की सी प्रेरणा और शक्ति सम्पन्नता सबेरे के पास है. माँ की सी ममता और हृदय रसज्ञता सांझ के पास है. उसकी ममता को प्रकृति पत्र-पत्र पर अलिखित पाती सा देखते है. उसकी रसज्ञता फलो के रस में और जीवन के रस में अनुभव करते है. सांझ नयी भौर तक जाने तक की यात्रा का आरम्भ है.

वैसे तो कई सुबहों और शामो की प्रकाश भीगी पलकों को उठते गिरते देखा है, परन्तु उन सांझो में एक सांझ यादो के वृत पर फल की तरह लगी हुई है. धूपगढ़ की साझ का रूप रंग, आकार, रस कुछ निराकार बनकर मन के अन्तरिक्ष में फैला हुआ है. पचमढ़ी पर्वतों की रानी कही जाती है. सतपुड़ा का सारा निसर्गत सौन्दर्य पचमढ़ी की गौदी में झूल रहा है.

धूपगढ़ हिंदी कहानी, Hindi Story

धूपगढ़ हिंदी कहानी, Hindi Story

खाइया और पहाड़ियाँ अपनी-अपनी दिशा में जाकर गहराई और ऊँचाई की नाप बन जाती है, खाईया अनमापी गहराई को नापती सी लगती है. पहाड़िया ऊंचाई को गौरव देती है. इसी पचमढ़ी में स्थित है, धुपगढ, सुबह आकर सबसे पहले इसे प्रमाण करती है. सांझ जाते जात्ते सबसे आखिरी में इससे विदा लेती है. प्रकाश सबसे लम्बा स्नान यही करता है. धूपगढ़ की सुबह निराली है. धूपगढ़ की सांझ सुहानी है. धूपगढ़ सतपुड़ा का गौरव है. इस गौरव को सुबह सांझ धुप स्नान कराती है.

कुमकुम और रोली का टिका भी लगाती है. धूपगढ़ की उज्जवल हँसी वनवासियों की रुखी नंगी देह ओ शीतल स्पर्श देने की कोशिश करती है. धूपगढ़ स्थित पेड़ों से दो चार पत्ते घर लौटते वनवासी की पाग पर गिर जाते है. दो चार फुल वनवासी स्त्री की चुनर में टक जाते है. यह देख सांझ की आखों में करुणा उभर आती है. धूपगढ़ की सुबह देखि है सांझ भी देखी है.

दोनों में किसका सौन्दर्य ज्यादा है ? किसका रंग घना है? किसका प्रभाव गहरा है? नहीं कह सकते. यह तुलना ही अनुचित है. सुबह-सुबह है. सांझ-सांझ है. दौनो की अपनी दुनिया है. अपनी महिमा है. अपना सम्मोहन है. सामान्य सुबह और सांझ अपने प्राकृतिक चक्र के कारण सहज रूप में आती जाती है. इनके होने में प्रकृति की इच्छा ही अभिव्यक्त होती है.

उसी निसर्ग का आह्लाद इनमे पिघलकर बगरता है. परन्तु स्थान-स्थान पर इन सुबहों-साझो की मुद्राए और भंगिमाए भिन्न-भिन्न होती है. कोई स्थान ऐसा होता है. कि उसे पाकर प्रकृति श्रृगारित हो उठती है. जिसके होने से उस भू-भाग के क्षितिजों तक निशि वासर उत्सव मनाता रहता है. उस वन क्षेत्र के जीवो की निर्धनता का भी एक सुख होता है. भौतिक निर्धनता की पूर्ति उस क्षेत्र में प्रकृति अपने सानिध्य के सुख से करती है. इस तरह के सुख के केंद्र में स्वतंत्रता और उन्मुक्तता होती है, जो मनुष्य और मनुष्येत्तर जीवो की प्राकृतिक प्रकृति है.

धूपगढ़ की सुबह को देखने के लिए ब्रह्मपुत्र में जागना होता है. घर्र घर्र नाद वाली लौह गाड़ी पर सवार होकर वन वल्लरियों के बीच से ऊपर चढ़ना होता है. बीच में छोटी गहरी नदी पार करनी होती है. फिर एक अनबुझी और अनमापी चढ़ाई पर बढ़ते जाना. परिकल्पना के पंखो पर तैरते हुए ऊपर और ऊपर चढ़ते चले जाना गोल घुमावदार पथ पर कहीं कहीं हल्का सा टकराता हुआ भय दबे पाँव आता है. उधर सिंह रहता है.

कल ही एक गाय को चौरागढ़ के पास सिंह ने मार डाला. विकट चढ़ाई, नीचे देखे तो साँस रूकती सी जाती सी जान पड़ती है. ऊपर समतल भाग में पाँव पाँव जमीन को छुकर अपने होने के प्रमाण पाने की अविजित ख़ुशी को पा लेना. धूपगढ़ का पूर्वी छौर. जहाँ से सूर्योदय दिखाई देता है वह सतपुड़ा की सबसे ऊँची चौटी तक बन जाता है. इसे देखना अच्छा लगता है.

इस रश्मि स्तम्भ पर चलकर सूर्य तक कोई बिरला ही पहुंचता है. प्राची के हिरण्य गर्भ से बालारुण की जन्म बेला की प्रतीक्षा में विश्वमोहिनी शक्ति जैसे जाग गई हो. शितिज पर पतली सी रेखा उभरती है और बालक की किलकारी दिशाओ तक फैल जाती है. पक्षी उसी किलक को अपने स्वर्ग में भरकर आकाश को जाते है. क्षितिज पर भुवन भास्कर की पहली रेखा. जैसे किसी बालक ने पूरब की स्लेट पर महासमुद्र में आती हुई उषा का जल सतह पर सुनहरे रंग का केश बंध हेयर बैंड दिखाई दे रहा हो. जैसे युद्ध में विजय के बाद भारत वर्ष ने अपनी विजय प्रतीक स्वर्णिम कटार प्रकृति के महाटेबल पर रख दी हो.

जैसे संतरे की रंगभरी फाँक रात्री ने उषा की हथेली पर धर दी हो. धीरे धीरे आदित्य तरबूज की फाँख सरीखा आधा उभर आता है. उषा का जैसे भाल साफ़ निकल आया हो. भारतवर्ष की स्वतंत्रता की अर्धशती जैसे सूर्य गोलक बनकर महानिलय ने झाँक रही हो. और फिर सूर्य बिम्ब. जैसे कुमकुम नहाया कलश किरण पूरित चौक पर धर दिया हो. या महाकुम्भ ने लाल मिटटी का घड़ा अँधेरे की सड़क पर तृषित मानव की तृषा तृप्ति के लिए भर दिया हो या भूमंडल पर जितने भी सेवाभावी मनुष्य है, उनकी निष्कलुष गैरिक वसना सेवा भावना स्वर्ण कलश सी चमक लेकर मूर्त हो उठी हो.

धूपगढ़ के सूर्योदयिक क्षण को प्रत्येक दृष्टा अपनी नील कुसुमित आखों में आज लेना चाहता है. साड़ी वनस्पति अपने प्रमाण सूर्य को अर्पित कर देती है. माधवी लताओं के हाथो में फुल आ जाते है. वनेली गंध सुबह की बेला में घुलकर समनो का स्पर्श करती है और क्षण दो क्षण में वह सौरभित पवन रूखे गालों और सूखे बालों में वह भरने लगता है.

सूर्य की प्रतिभा लामिला कण – कण तक पहुँच जाती है. सब अँधेरे के समुद्र से निकलकर अपनी देह निधारने लगते है. अपने-अपने स्वरुप पहचानने लगते है. सब अपने अपने रंग में पुन: रंग जाते है. सकल वानस्पतिक चेतना सूर्य स्थित महाचेतना से संवाद करने लगती है. प्रात: की धरती का वह सौन्दर्य शब्दों में अट नहीं पाता. वह रूप राशि इच्छाओं की लता सी देह यष्टि.

उभरे वक्ष भागों पर हवा की लहर से कापते हुए घास पात के केश पुंज. अल्हड उवनी. पक्षियों भौरों के मिस गुनगुनाते अधर, सुरभित साँसों में अपनत्व की उष्णता. नूपुरों में कर्ण आह्लादन लय. प्राकृतिक चेतन सौन्दर्य का यह सप्त वर्णी ज्वार कब कोई अपने ह्रदय में पूरी तरह समेट सका है? मधुरिमा के देश को जाने की यह धूपगढ़ गमन शीलता चेतना की सारस्वत यात्रा की पूर्व पीठिका सी लगती है.

झंझटो के झुरमुटो से निकलना. जीवन संघर्ष की गहरी अथाह नदी को पार करना. शून्य शिखर गढ़ की चढ़ाई में अनहद नाद की ध्वनि की झंकार का कर्ण पदों से टकराना मन के श्रृंगो का नीचे छुटते चले जाना. पारद शिराओं का शांत होकर चेतना की भाव भूमि पर नत शिर होना. तर्क पीड़ित बुद्धि से जड़ता का भर जाना. दाह पीड़ित लहराते मदमाते शीश का भू लुन्ठित होगा.

मचलते हरिण शावक से ह्रदय को उन्मुक्त धरा पर नवल गति मिल जाना. अंकिचन सूखते से तृण विटप में नवल किसलय का पल्लवन होगा. फिर अगरु वासित मलय शीतल सप्तपर्णी विटप की छाया में चेतना का विश्राम करना. और तिमिर के ज्वार में डूबी मानवता की हथेली पर गर्व उन्नत अडिग जलते दीप का धर देना. बस ऐसा ही आभास धूपगढ़ के गर्वोन्नत और अज्वल शिखर पर पहुँचते हुए होता है. वहाँ से चेतना का रुख स्वर्ग सरीखी कल्पित भूमि पर पहुचते का नहीं, बल्कि अनुपात पूरित तप्त जलती मानवता की मुक्ति की और हो जाता है.

धूपगढ़ की साँझ महाचेता के मनोमय कौश के अनुराग का राग है. दिवस की प्राण वल्लभा साँझ अपनी विराट लीला के अतिन्द्रिय सूर्य बटोही को अपने अंक में सुला लेती है. धूपगढ़ के शीर्ष से जहारो कोसो दूर यह ममत्व उत्कर्षण पश्चिम क्षितिज पर होता है, जिसकी विस्मय विमुग्ध लोल लहरियाँ तृण लता विटप से लेकर गिरि खोह, नदी समुद्र, महल कुटी तक फैल जाती है.

तमतमाते दिवस की अवसान बेला में सब कुछ शांत है, वनस्पति शांत है, पक्षी शांत है, सांसारिक प्रपंच शांत है, श्वेत वर्णी दिवस नभ की नीलिमा शांत है, अन्थकी उड़ान झुरमुट में शांत है, तेज दौड़ शांत है, तेज दौड़ शांत है, थरथराती आवाजे शांत है, दिन डूब रहा है. सांझ हो रही है. धुपगढ से लेकर सांध्य क्षितिज तक फैली इस सतपुडिया भूमि पर नील कबरी के नूपुरों के धूलि कण तैरने लगते है.

इस विशाल वन प्रांतर में प्यासे बंजारे सा भुला बटोही आवाज लगाता है. दिशाए प्रत्युत्तर में प्रति आवाज देती है. नभ का जगमगाता प्रभाकर बुझ गया है. द्वार का टिमटिमाता दीपक उस बटोही को आमन्त्रण देता है. धुल धूसरित थके. हारे पाँव दरवाजे पर आकर थम जाते है. पीड़ा से छटपटाती देह स्लथ होकर प्राण वल्लभा के अंक में गिर जाती है. कम्पित अंधरों का मौन, दृग धार बनकर फूटता है.

मृग मरीचिका की काली छाया में से अपने अस्तित्व को सम्भाले हुए जीवन का मंदिर चादी सा उभरता है जिसके सत्कर्म के स्वर्ण कलश की चमक नीले आकाश में भास्वर चमकती है. यह साझ पृथ्वी को अमृत सोम शीतलता और दुग्ध धार देने वाली है, यह वनैले पशुओं की जागरण बेला है. इसमें मनुष्य जीवन की अलस भरी है. तो हिंस्त्र पशुओं की अंगडाई भी है.

मनुष्य और मनुष्येत्तर जीव इसकी अतिथि शाला में विश्राम कर सूर्य की पहली किरण के साथ पुनः धरती को नापने हेतु उत्फुल्ल होते है. जो जंगल राज का राजा अपनी कर्णभेदी दहाड़ से सारसवर्णी जीवो की सान्सोछेदन में तत्पर भी होता है. जन्म और मृत्यु प्रकृति के लिए दो सहज स्थितियाँ है. उसका यह खेल है. उसके लिए दोनों ही सुख दुःख का कारण नहीं है.

सुबह और साँझ भी प्रकृति की सहजात गति है. इस महानिलय में भोर और साँझ पलक उठने और गिरने के सिवाय और कुछ नही है सुबह की लालिमा में न तो प्रसन्नता होती है और न ही साँझ की पीताभ में उदासी प्रकृति सुख दुःख से परे है. वह नियंता है. सुबह सांझ उसी नियंता प्रकृति की उदी उदी आखें है जिनमे श्वेत रतनार भरा है. उस रहस्य की बोरगंध पृथ्वी पर वानस्पतिक सृष्टि और जीवन सृष्टि में ही फलित होती है. सुबह साझ का बरसता हुआ अहेतुक वात्सल्य ही सृष्टि का जीवन है. समय चक्र है. इसका आदि अंत नहीं है. सुबह सांझ न उदय है न अंत दोनों ही समय चक्र में नव्य और शुभ्र जोड़ने की अनुरागमयी बेलाए है.

 

इस कहानी के लेखक के बारे में कुछ बाते

डॉ. श्री राम परिहार का जन्म खंडवा जिले के छोटे से गाँव फेफरिया में १६ जनवरी सन १९५२ को हुआ. आपके पिता श्री देवाजी परिहार कृषक थे. आपका बचपन गाँव के प्राकृतिक सौन्दर्य में व्यतीत हुआ. माता श्रीमती लाखुदेवी द्वारा बचपन से लौकगीत और लोक संस्कारों का वातावरण प्राप्त हुआ. अत: आपकी लेखनी में लोक संस्कृति का दर्शन अनायास ही होने लगता है. वर्तमान में आप उच्च शिक्षा विभाग में कार्यरत है.

आपकी प्रमुख रचनाओं में आँच अलाव की अँधेरे में उम्मीद, धुप का अवसाद, ठिठके पल पाखुरी पर, चौकस रहना है, झरते फुल हर सिंगार के, हंसा कहो पुरातन बात आदि है.

अनेक साहित्यिक संस्थाओं द्वारा आपको सम्मान प्राप्त हो चुके है, जिसमे वगीश्वरी पुरस्कार, ईसुरी पुरस्कार, दुष्यंत कुमार राष्ट्रीय अलंकरण आदि प्रमुख है.

श्री राम परिहार की भाषा संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली है. आपने अलंकारिक भाषा का प्रयोग करते हुए ललित शैली का प्रयोग किया है जो आपकी विशेषता है.

अपने सूर्योदय और सूर्यास्त के नयनाभिराम दृश्यों के लिए पर्यटकों में विख्यात पचमढ़ी स्थित धूपगढ़ सतपुड़ा पर्वत श्रृखला की सबसे ऊँची चोटी है. डॉ. श्री राम परिहार ने अपने इस निबंध में इसी धूपगढ़ की प्रात: और साध्य बेला का छायावादी चित्रण और प्रकृति का मानवीय करण किया है. लेखक ने इसमें सुबह और सांझ के दो चिर प्रतीकों के माध्यम से जीवन और मृत्यु सुख और दुःख, आदि और अंत, उतार और चढ़ाव के गतिशील कालचक्र का शब्दांकन किया है, आलेख में प्रकृति के मरोरम दृश्य, वनवासियों की अभाव्ग्रस्त किन्तु उन्मुक्त जीवन शैली तथा वन्य पशुओ और वन्य प्रदेश की वनेली गंथ है. लेखक ने सुबह और साझ के द्वारा जीवन के संघर्ष और विश्वशांति के परस्पर संबंध, संतुलन और सामंजस्य को व्यक्त किया है, निबंध में प्रकृति का ज्ञान और चेतना का विज्ञान है, गति भी है और विराम भी इसमें जीवन का राग है और आत्मा का विराग भी. सुबह और सांझ एक दुसरे के विलोम नहीं बल्कि एक दुसरे के पूरक है. लेखक यह शब्द सेतु मन मस्तिष्क को धूपगढ़ के प्राकृतिक सौन्दर्य तक पहुँचाने में सफल है.

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