नीरा की कहानी Hindi Story

नीरा के ऊपर एक कहानी

नीरा – अब और आगे नहीं, इस गंदगी में कहाँ चलते हो, देवनिवास थोड़ी दूर और कहते हुए देवनिवास ने अपनी साइकिल धीमी कर दी, किन्तु विरक्त अमरनाथ ने ब्रेक दबाकर ठहर जाना ही उचित समझा. देवनिवास आगे निकल गया. मौलसीरी का वह सघन वृक्ष था, जो पोखर से सड़ी हुई दुर्गन्ध आ रही थी. देवनिवास ने पीछे घूमकर देखा, मित्र को वही रुका देखकर वह लौट रहा था. उसकी साइकिल का लेम्प बुझ चला था. सहसा धक्का लगा, देवनिवास तो गिरते-गिरते बचा और एक दुर्लब मनुष्य अरे राम कहता हुआ गिरकर भी उठ खड़ा हुआ. बालिका उसका हाथ पकड़कर पूछने लगी, कही चौट तो नहीं लगी बाबा?




Hindi Story - नीरा की कहानी

Hindi Story – नीरा की कहानी

बाबा ने कहा नहीं बेटी, मैं कहता न था, मुखे मोटरों से उतना दर नहीं लगता जितना इस बे दुम के जानवर साइकिल से. मोटर वाले तो दूसरों को ही चौट पहुँचाते है, पैदल चलने वालों को कुचलते हुए निकल जाते है, पर वे बेचारे तो आप ही गिर जाते है. क्यों बाबू साहब आपको तो चोट नहीं लगी? हम लोग तो चौट घाव सह सकते है. देवनिवास कुछ झेंप गया था. उसने बूढ़े बाबा से कहा – आप मुझे क्षमा कर दीजिये. तभी बुढा बाबा बोला – श्रीमान मैं आपको क्षमा करू? अरे आप क्या कह रहे है. दो चार हंटर आपने नहीं लगाये.

धर भूल गए, हंटर नहीं ले आये, अच्छा महोदय आपको कष्ट हुआ न, क्या करू? बिना भीख माँगे इस सर्दी में पेट गालियाँ देने लगता है. नीदं भी नहीं आती, चार छ: पहरों पर तो कुछ न कुछ इसे देना ही पड़ता है, और भी मुझे एक रोग है, दो पैसो बिना वह नहीं छूटता पढने के लिए अखबार चाहिए, पुस्तकालयों में चिथड़े पहनकर बैठने ना पाउँगा, इसलिए नहीं जाता.

दुसरे दिन का बासी समाचार पत्र दो पैसो ने ले लेता हूँ अमरनाथ भी पास आ गया था, उसने यह काण्ड देखकर हँसते हुए कहाँ देवनिवास मैं मना करता था न ! तुम अपनी धुन में कुछ सुनते भी हो, चले तो फिर चले, और रुके तो अड़ियल टट्टू भी झक मारे, क्या उसे कुछ चोट आ गई है – क्यों बूढ़े लो यह अठन्नी है. जाओ अपनी राह, तनिक देखकर चला करों. बुढा मसखरा भी था.

अठन्नी लेते हुए उसने कहा देखकर चलता, तो यह अठन्नी कैसे मिलती ! तो भी बाबूजी, आप लोगो की जेब में अखबार होगा, मैंने देखा है, साइकिल पर चढ़े हुए बाबुओं के पाकेट ने निकला हुआ कागज़ का मुट्ठा, अखबार ही रहता होगा. चलो बाबा, झोपडी में सर्दी लगती है. वह छोटी सी बालिका अपने बाबा को जैसे इस तरह बातें करते हुए देखना नहीं चाहती, यह सन्कोंच में डूबी जा रही थी, देवनिवास चुप था. बुड्ढे को जैसे तमाचा लगा, वह अपने दयनीय और घ्रणित भिक्षा व्यवसाय को बहुधा नीरा से छिपाकर बनाकर कहता.

उसे अख़बार सुनाता और भी न जाने क्या-क्या ऊँची नीची बातें बका करता, नीरा जैसे सब समझती थी, वह कभी बूढें से प्रशन नहीं करती थी. जो कुछ वह कहता चुपचाप सुन लिया करती है. कभी कभी बुड्ढा झुंझलाकर चुप हो जाता, तब भी वह चुप रहती, बूढ़े को आज ही नीरा ने झोपडी में चलने के लिए कह्कर पहले पहल मीठी झिड़की दी. उसने सोचा कि अठन्नी पाने पर भी अखबार माँगना नीरा न सह सकी. अच्छा तो बाबूजी भगवान यदि कोई हो तो आपका भला करे, बुड्ढा लड़की का हाथ पकड़कर मौलसिरी की और चला.

देवनिवास सत्र था. अमरनाथ ने अपनी साइकिल के उज्जवल आलोक में देखा नीरा एक गौरी सी सुंदरी, पतली दुबली करुणा की छाया थी. दौनो मित्र चुप थे. अमरनाथ ने ही कहा अब लोटेंगे कि यही गड गए. तुमने कुछ सुना अमरनाथ वह कहता था, भगवान यदि कोई हो कितना भयानक अविश्वास देवनिवास ने साँस लेकर कहा. दरिद्रता और लगातार दुखो से मनुष्य अविश्वास करने लगता है.

निवास यह कोई नई बात नही है अमरनाथ ने चलने की उत्सुकता दिखाते हुए कहा. किन्तु देवनिवास तो जैसे आत्मविस्मृत था. उसने कहा सुख और सम्पत्ति में क्या ईश्वर का विश्वास अधिक होने लगता है? क्या मनुष्य ईश्वर को पहचान लेता है? उसकी व्यापक सत्ता को मलिन वेश में देखकर दूरदूरता नहीं ठुकराता नहीं. अमरनाथ अब की बार आलोचकों के विशेषांक में तुमने लौटे हुए प्रवासी कुलियों के सम्बंध में एक लेख लिखा था न.

वह सब कैसे लिखा था ?  अखबारों से आकड़े देखकर मुझे ठीक ठाक स्मरण है. कब किस द्वीप में कौन कौन स्टीमर किस तारीख में चले, सतलज पंडित और एलिफटा नाम के स्टीमरों पर कितने कितने कुली थे, मुझे ठीक ठाक मालुम था, और? वे सब कहाँ है? सुना है, इसी कलकत्ते के पास कही मटियाबुर्ज है, वही अभागों का निवास है. अवध के नवाब का विलास या प्रायश्चित भवन भी तो मटियाबुर्ज ही रहा.

मैंने उस लेख में भी एक व्यंग इस पर बड़े मार्के का दिया है. चलो खड़े खड़े बाते करने की जगह नहीं. तुमने तो कहा था कि आज जनाकिर्ण कलकत्ते से दूर तुमको एक अच्छी जगह दिखाऊंगा. यही, मतियाबुर्ज है. देवनिवास ने बड़ी गंभीरता से कहा अब तुम कहोंगे कि यह बुड्ढा वही से लौटा हुआ कोई कुली है. हो सकता है, मुझे नहीं मालुम हो, अच्छा चलो अब लौटे, कहकर अमरनाथ ने अपनी साइकिल को धक्का दिया, देवनिवास ने कहा चलो उसकी झोपडी तक, मैं उससे कुछ बात करूँगा.

अनिच्छा पूर्वक चलो कहते हुए अमरनाथ में मौलसिरी की और साइकिल घुमा दी, साइकिल के तीव्र आलोक में झोपडी के भीतर का दृश्य दिखाई दे रहा था, बुड्ढा मनोयोग से लाई फाँक रहा था और नीरा भी कल की बची हुई रोटी चबा रही थी. रूखे औठो पर दो एक दाने चिपक गए थे, जो उस दरिद्र मुख में जाना अस्वीकार कर रहे थे. टिन का गिलास अपने खुरदुरे रंग का नीलापन नीरा की आखों में उड़ेल रहा था.

आलोंक एक उज्जवल सत्य है, बंद आखों में भी उसकी सत्ता छिपी नहीं रहती. बुड्ढे ने आखे खोलकर दौनो बाबुओं को देखा. वह बोल उठा बाबूजी आप अख़बार देने आये है? मैं अभी पथ्य ले रहा था, बीमार हूँ न इसी से लाइ खाता हूँ, बड़ी नमकीन होती है. अखबार वाले भी कभी कभी नमकीन बातों का स्वाद दे देते है. इसी से तो, बेचारे कितने दूर दूर की बातें सुनाते है. जब मैं मारीशस में था, तब हिन्दुस्तान की बाते पढ़ा करता था. मेरा देश सोने का है, ऐसी भावना जग उठती थी.

अब कभी कभी उस टापू की बाते पढ़ पाता हूँ तब यह मिट्टी मालूम पड़ता है, पर सच कहता हूँ बाबूजी मारीशस में अगर गोली न चली होती और नीरा की माँ न मरी होती हाँ गोली से ही वह मेरी थी तो मैं अब तक वही से जन्मभूमि का सोने का सपना देखता और इस अभागे देश. नहीं नहीं बाबूजी मुझे यह कहने का अधिकार नहीं है, मैं हूँ अभागा हाय रे भाग.

नीरा घबरा उठी थी. उसने किसी तरह दो घुट जल गले से उतारकर इन लोगो की और देखा. उसकी आखे कह रही थी कि जाओ मेरी दरिद्रता का स्वाद लेने वाले धनी विचारको और सुख तो तुम्हे मिलते ही है , एक न सही. अपने पिता को बाते करते देखकर वह घबरा उठी थी. वह डरती थी कि बुड्ढा न जाने क्या-क्या कह बैठेगा. देवनिवास चुपचाप उसका मुँह देखने लगा.

नीरा बालिका न थी. फिर भी जैसे दरिद्रता के भीषण हाथों ने उसे दबा दिया था सीधी ऊपर नहीं उठने पाई. क्या तुमको ईश्वर में विश्वास नहीं है? अमरनाथ ने गंभीरता से पूछा. आलोचकों में मैंने एक लेख पढ़ा था. वह इसी प्रकार के उलाहनो से भरा था कि वर्तमान जनता में ईश्वर के प्रति अविश्वास का भाव बढता जा रहा है. और इसलिए वह दुखी है. यह पढ़कर मुझे तो हँसी आ गई. बुड्ढ़े ने अविचल भाव से कहा. हँसी आ गई. कैसे दुःख की बात है. ये सब अमरनाथ ने कहा.

दुःख की बात सोचकर ही तो हँसी आ गई. हम मुर्ख मनुष्यों ने त्राण की आशा से ईश्वर पर पूर्णकाल में विश्वास किया था. परम्पर विश्वास और सद्भाव को ठुकराकर. मनुष्य, मनुष्य का विश्वास नहीं कर सका. इसलिए तो एक सुखी दुसरे दुखी की और घृणा से देखता था. दुःख ने ईश्वर का अवलम्बन लिया, तो एक सुखी दुसरे दुखी की और घृणा से देखता था. दुःख ने ईश्वर का अवलम्बन लिया, तो भी भगवान ने संसार के दुखो की सृष्टि बंद कर दी क्या? मनुष्य के बूते का न रहा, तो क्या वह भी, कहते-कहते बूढ़े की आखों से चिनगारियाँ निकलने लगी.

किन्तु वे अग्निकण गलने लगे और उसके कपोलों के गढ़े में वह द्रव इकट्ठा होने लगा. अमरनाथ क्रोध से बुड्ढ़े को देख रहा था. किन्तु देवनिवास उस मलिना नीरा की उत्कंठा और खेदभरि मुखाकृति का अध्ययन कर रहा था. आपको क्रोध आ गया, क्यों महाशय आने की बात ही है, ले लीजिये अपनी अठन्नी, अठन्नी देखर ईश्वर में विश्वास नहीं कराया जाता.

उस चोट के बारे में पुलिस में जाकर न कहने के लिए भी अठन्नी की आवश्यकता नहीं एश्वर्य वालो को, जिन पर भगवान की पूर्ण कृपा है, अपनी सहृदय से ईश्वर का विश्वास कराने का प्रयत्न करना चाहिए, कहिये इस तरह भगवान की समस्या सुलझाने के लिए आप प्रस्तुत है. इस बूढ़े नास्तिक और तार्किक से अमरनाथ को तीव्र विरक्ति हो चली. अब वह चलने के लिए देवनिवास से कहने वाला था. किन्तु उसने देखा, वह तो झोपडी में आसन जमाकर बैठ गया है.

अमरनाथ को चुप देखकर देवनिवास ने बूढ़े से कहा अच्छा तो आप मेरे घर चलकर रहिये. सम्भव है कि मैं आपकी सेवा कर सकूँ. तब आप विश्वासी बन जाए तो कोई आश्चर्य नहीं. इस बार तो वह बुड्ढा बुरी तरह देवनिवास को घूरने लगा. देवनिवास वह तीव्र दृष्टी सह न सका. उसने समझा कि मैंने चलने के लिए कहकर बूढ़े को चोट पहुचाई है. वह बोल उठा क्या आप? ठहरो भाई तुम बड़े जल्दबाज मालुम होते हो बूढ़े ने कहा क्या सचमुच तुम सेवा करना चाहते हो और नीरा की आखे बूढ़े को आगे ना बोलने की शपथ दिला रही थी.

मगर नीरा जिसे तुम बड़ी देर से देख रहे हो, अपने घर लिवा ने की बड़ी उत्कंठा है, जब कुलियों के लिए इसी सिली, गन्दी और दुर्गंधीय भूमि में एक नवनुभुती उत्पन्न हुई थी, तब मुझे यह कटु अनुभव हुआ था कि वह सहानुभूति भी चिरायध से खाली न थी. मुझे एक सहायक मिले थे और मैं यहाँ से थोड़ी दूर पर उनके घर रहने लगा था. मीरा से अब न रहा गया.

वह बोल उठी बाबा चुप न रहोगे, खाँसी आने लगेगी. ठहर नीरा हाँ तो महाशय जी, मैं उनके घर रहने लगा था और उन्होंने मेरा आतिथ्य साधरणतः अच्छा ही किया. एक ऐसी ही काल रात थी. बिजली बादलों में चमक रही थी और मैं पेट भरकर ठंडी रात में सुख की झपकी लेने लगा था. इस बात को बरसो हुए, तो भी मुझे ठीक स्मरण है कि मैं जैसे भयानक सपना देखता हुआ चौक उठा.

नीरा चिल्ला रही थी क्यों नीरा? अब नीरा हताश हो गई थी और उसने बूढ़े की रोकने का प्रयास छोड़ दिया था. वह एकटक बूढ़े का मुँह देख रही थी. बुड्ढे ने फिर कहना प्रारम्भ किया हाँ तो नीरा चिल्ला रही थी. मैं उठकर देखता हूँ तो मेरे वह परम सहायक महाशय इसी नीरा को दोनों हाथो से पकड़कर घसीट रहे थे और यह बेचारी छुटने का व्यर्थ प्रयत्न कर रही थी.

मैं अपने दोनों दुर्बल हाथो को उठाकर उस नीच उपकारी के ऊपर दे मारा. वह नीरा को छोड़कर निकल मेरे घर से कहता हुआ मेरा अंकिचन सामान बाहर फेकने लगा. बाहर ओलों सी बूंदे पड़ रही थी और बिजली कौंधती थी. मैं नीरा को लिए सर्दी से दांत किटकिटाता हुआ एक ठूँठ वृक्ष के नीचे रात भर बैठा रहा. उस समय वह मेरा एश्वर्यशाली सहायक बिजली के लेम्पो की गर्मी में मुलायम गद्दे पर सुख की नींद सो रहा था.

यद्यपि मैं उसे लौटकर देखने नहीं गया, तो भी मैं निश्चयपूर्ण कहता हूँ कि उसे सुख में किसी प्रकार की बाधा उपस्थित करने का दंड देने के लिए भगवान का न्याय अपने भीषण रूप में नहीं प्रकट हुआ. मैं रोता था पुकारता था किन्तु वहाँ सुनता कौन है. तुम्हारा बदला लेने के लिए भगवान नहीं आये, इसलिए तुम अविश्वास करने लगे. लेखको की कल्पना का साहित्यिक न्याय तुम सर्वत्र प्रत्यक्ष देखना चाहते हो न.

निवास ने तत्परता से कहा. क्यों न मैं ऐसा चाहता? क्या मुझे इतना भी अधिकार न था ? तुम समाचार पत्र पढ़ते हो न. अवश्य तो उसमे कहानियाँ भी कभी कभी पढ़ लेते होंगे और उनकी आलोचनाए भी. हाँ तो फिर, जैसे एक साधारण आलोचक प्रत्येक लेखक से अपने मन की कहानी कहलाना चाहता है और हठ करता है. कि नहीं यहाँ तो ऐसा नहीं होना चाहिए था, ठीक उसी तरह तुम सृष्टिकर्ता से अपने जीवन की घटनावली अपने मनोनुकूल सही कराना चाहते हो.

महाशय मैं भी इसका अनुभव करता हूँ कि सर्वत्र यदि पापों का भीषण दंड तत्काल ही मिल जाया करता, तो यह सृष्टि पाप करना छोड़ देती. किन्तु वैसा नहीं हुआ. उलटे यह एक व्यापक और भयानक मनोवृति बन गई है, कि मेरे कष्टों का कारण कोई दूसरा है. इस तरह अपने कर्मो को सरलता से भूल सकता है. क्या तुमने कभी अपने अपराधो पर विचार किया है? देवनिवास बड़े वेग से बोल रहा था.

बुड्ढा न जाने क्यों कांप उठा? साइकिल का तीव्र आलोक उसके विकृत मुख पर पद रहा था. बुड्ढ़े का सिर धीरे-धीरे नीचे झुकने लगा. नीरा चौककर उठी और एक फटा सा कम्बल उस बुड्ढ़े का ओढ़ाने लगी. सहसा बुड्ढ़े ने सिर उठाकर कहा मैं इसे मान लेता हूँ कि आपके पास बड़ी अच्छी युक्तियाँ है. और उनके द्वारा मेरी वर्तमान दशा का कारण आप मुझे ही प्रमाणित कर सकते है.

किन्तु वृक्ष के नीचे पुआल से ढकी हुई मेरी झोपडी को और उसमे पड़े हुए अनाहार, सर्दी और रोगों से जीर्ण मुझे अभागे को मेरा ही भ्रम बताकर आप किसी बड़े भारी सत्य का अविष्कार कर रहे है, तो कीजिये, जाइए मुझे क्षमा कीजिये. देवनिवास कुछ बोलने ही वाला था कि नीरा ने दृढ़ता से कहा आप लोग क्यों बाबा को तंग कर रहे है ? अब उन्हें सोने दीजिये.

देवनिवास ने देखा कि नीरा के मुख पर आत्मनिर्भरता और संतोष की गम्भीर शांति है. स्त्रियों का ह्रदय अभिलाषाओं का, संसार के सुखो का क्रीड़ास्थल है, किन्तु नीरा का ह्रदय नीरा का मस्तिष्क इस किशोर अवस्था में ही कितना उदासीन और शांत है. वह मन ही मन नीरा के सामने प्रणत हुआ. दोनों मित्र उस झोपडी से निकले रात अधिक बीत चली थी, वे कलकत्ता महानगरी की घनी बस्ती में धीरे-धीरे साइकिल चलाते हुए घुसे. दोनों का ह्रदय भारी था.

वे चुप थे. देवनिवास का मित्र कच्चा नागरिक नहीं था. उसको अपने आकड़ों का और उनके उपयोग पर पूरा विश्वास था. वह सुख, दरिद्रता और वैभव, कटुता और मधुरता की परीक्षा करता, जो उसके काम के होते, उन्हें संभाल लेता फिर अपने मार्ग पर चल देता. सार्वजनिक जीवन का खेल रचने में वह पूरा खिलाडी था. देवनिवास के आतिथ्य का उपभोग करके अपने लिए कुछ मसाला जुटाकर वह चला गया.

किन्तु देवनिवास की आखों में, उस रात्रि के बूढ़े की झोपडी का दृश्य अपनी छाया ढालता ही रहा. सप्ताह बीतने पर वह फिर उसी और चला. झोपडी में बुड्ढा पुआल पर दिखाई दी. उसने धीरे से पूछा बाबूजी आज फिर. नहीं मैं वाह विवाद नहीं करने आया हूँ तुम क्या बीमार हो?  हाँ बीमार हूँ बाबूजी और यह आपकी कृपा है. मेरी? हाँ उसी दिन से आपकी बाते मेरे सिर में चक्कर काटने लगी है.

मैं ईश्वर पर विश्वास करने की बात सोचने लगा हूँ बैठ जाइये सुनिए. देवनिवास बैठ गया था. बुड्ढ़े ने फिर कहना आरम्भ किया मैं हिन्दू हूँ. कुछ सामान्य पूजा पाठ का प्रभाव मेरे ह्रदय पर पड़ता रहा, जिन्हें मैं बाल्यकाल में अपने घर पर्वो और उत्सवो पर देख चूका था. मुझे ईश्वर के बारे में कभी कुछ बताया नहीं गया. अच्छा जाने दीजिये वह मेरी लम्बी कहानी है, मेरे जीवन की संसार से झगड़ते रहने की कथा है. अपनी घोर आवश्कताओ से लड़ता झगड़ता मैं मारीशस पहुँचा. वहाँ कुलसम नीरा की माँ से मेरी भेट हो गई. मेरा उसका ब्याह हो गया.

आप हँसिये मत, कुलियों के लिए वहाँ किसी काजी या पुरोहित की उतनी आवश्यकता नहीं कुलसम ने मेरा घर बसाया. पहले वह चाहे रही, किन्तु मेरे साथ सम्बंध होने के बाद से आजीवन वह एक साध्वी गृहिणी बनी रही. कभी कभी वह अपने ढंग पर ईश्वर का विचार करती और मुझे भी इसके लिए प्रेरित करती, किन्तु मेरे मन में जितना कुलसम के प्रति आकर्षण था, उतना ही उसके ईश्वर सम्बंधी विचारों से विद्रोह.

मैं कुलसम के ईश्वर को तो कदापि नहीं समझ सका. मैं पुरुष होने की धारणा से यह तो सोचता था कि कुलसम वैसा ही ईश्वर माने, जैसा उसे मैं समझ सकूँ और वह मेरा ईश्वर हिन्दू हो क्योकि मैं सब छोड़ सकता था, लेकिन हिन्दू होने का विचार मेरे मन में दृढ़ता से गया था, तो भी समझकर कुलसम के सामने ईश्वर की कल्पना अपने ढंग की, उपस्थित करने का मेरे पास कोई साधना न था, तो भी समझदार कुलसम के विचारों की खिल्ली उड़ाता हुआ हँसकर कह देता तो मेरे लिए तुम्ही ईश्वर हो, खुदा हो, तुम ही सबकुछ हो, वह मुझे चापलूसी करते हुए देखकर हँस तो देती थी किन्तु उसका रोया-रोया रोने लगता.

मैं अपनी गाढ़ी कमाई के रुपयों को व्यसनों में गवां मस्त रहता. मेरे लिए वह भी कोई विशेष बात न थी. न तो मेरे लिए नास्तिक बनने में ही कोई विशेषता थी. धीरे-धीरे मैं उच्छश्र्न्खल हो गया. कुलसम रोती बिलखती और मुझे समझाती किन्तु मुझे यह सब बातें व्यर्थ की सी जान पड़ती. मैं अधिक अविचारी हो उठा. मेरे जीवन का वह भयानक परिवर्तन बड़े वेग से आरम्भ हुआ.

कुलसम उस कष्ट को सहन करने के लिए जीवित न रह सकी. उस दिन जब गोली चली थी. तब कुलसम के वहाँ जाने की आवश्यकता न थी. मैं सच कहता हूँ बाबूजी, वह आत्महत्या करने का उसका एक नया ढंग था. मुझे विश्वास होता है कि मैं ही इसका कारण था. इसके बाद मेरी वह सब उद्दंडता तो नष्ट हो गई थी. जीवन की पूंजी जो मेरा निज का अभिमान था वह भी चूर चूर हो गया था.

मैं नीरा को लेकर भारत के लिए चल पड़ा. तब तक तो मैं ईश्वर के सम्बंध में एक उदासीन नास्तिक था, किन्तु इस दुःख ने मुझे विद्रोही बना दिया. मैं अपने कष्टों का कारण ईश्वर को ही समझने लगा और मेरे मन में यह बात जम गई कि यह मुझे दंड दिया गया है. बुड्ढा व्याकुल हो उठा था. उसका दम फूलने लगा, खासी आने लगी. नीरा मिट्टी के घड़े में जल लिए हुए झोपडी में आई.

उसने देवनिवास को और अपने पिता को अन्वेषक दृष्टि से देखा. यह समझ लेने पर कि दोनों में से किसी के मुख पर कटुता नहीं है, वह प्रकृतिस्थ हुई. धीरे-धीरे पिता का सिर सहलाते हुए उसने पूछा बाबा, लावा ले आई हूँ, कुछ खा लो. बुड्ढ़े ने कहा ठहरो बेटी फिर देवनिवास की और देखकर कहने लगा बाबूजी उस दिन भी जब नीरा के लिए मैंने भगवान को पुकारा था, तब उसी कटुता से. संभव है, इसीलिए वे न आये हो.

आज कोई दिनों से मैं भगवान को समझाने की चेष्ठा कर रहा हूँ. तीरा के लिए मुझे बड़ी चिंता हो रही है. वह क्या करेगी? किसी अत्याचारी के हाथ पड़कर नष्ट तो न हो जायेगी. देव निवास कुछ बोलने को था, कि नीरा कह उठी बाबा तुम मेरी चिंता न करो भगवान मेरी रक्षा करेंगे. देवनिवास की अंतरात्मा पुलकित हो उठी. बुड्ढ़े ने कहा करेंगे बेटी? उसके मुख पर एक व्याकुल प्रसन्नता झलक उठी. निवास ने बूढ़े की और देखकर विनीत स्वर में कहा मैं नीरा से ब्याह करने के लिए प्रस्तुत हूँ.

यदि तुम्हे बूढ़े को अब की खांसी के साथ ढेर सा रक्त गिरा, तो भी उसके मुँह पर संतोष और विश्वास की प्रसन्न लीला खिलने लगी. उसने अपने दोनों हाथ देवनिवास और नीरा पर फैलाकर रखते हुए कहा है मेरे भगवान .

 

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