पूजे जाने वाले वृक्ष Worshiped Tress


The Worshiped Tress

विश्वभर में वृक्षों को पूजा जाता है. उनका सम्मान किया जाता है. इसी परिप्रेक्ष्य में यदि हम भारत को देखे तो यहाँ वृक्षों का सम्मान विश्व में सबसे ज्यादा होता है. क्योकि भारत में एक नहीं बल्कि अनेक वृक्षों को विधि विधान पूर्वक (Worshiped Tress) पूजा जाता है.




Worshiped Tress

Worshiped Tress

पौधे प्रत्यक्ष देवता है, क्योकि वे सिर्फ हमें देते ही है. हमसे कुछ लेते नहीं है. इसीलिए इन्हें हिन्दुस्तान ही नहीं, बल्कि विश्वभर में पूजा जाता है. विभिन्न वृक्षों को पूजे जाने के पीछे कहीं विशिस्ट कारण है, तो कहीं उन्हें प्राचीन समय से चली आ रही मात्र प्रथा के कारण पूजा जाता है.

आस्ट्रेलिया के टाई रोल प्रदेश में लोग कुछ  वृक्षों का इतना सम्मान करते है कि वे उनके समक्ष नंगे सर रहते है. उत्तरी अमेरिका के नेब्रास्को नामक शहर में १० अप्रेल सन १८७२ को एक विशाल वृक्ष पर्व मनाया गया था. इस दिन यहाँ सेकड़ों लोगों द्वारा वृक्षारोपण किया गया था. आज भी न्युयोर्क में वृक्ष महोत्सव मनाया जाता है.

जिसका प्रारम्भ सन १९८८ से हुआ था. इंग्लेंड में बलूत को अत्यंत पवित्र माना जाता है. और इसे पूजा जाता है. अफ्रीका में कानो के निवासी उनके मुकदमो का फैसला सदेव किसी वृक्ष के नीचे ही बैठकर करते है. पारसी समुदाय के लोग भी वृक्षों की विशेष उपासना एवं पूजा करते है.

उनका मानना है कि वृक्षों में साधू संतो की आत्माओं की निवास होते है फारस में फज्ल ए दरख्त नामक एक पोधे को अत्यंत पवित्र वृक्ष माना जाता है. और उसका पूजन किया जाता है. ग्रेट ब्रिटेन में ओक के वृक्ष को भी इसी प्रकार मानते हुए पूजा जाता है. साइप्रस, मध्य अमेरिका, मेक्सिको आदि में खजूर की पूजा की जाती है.

इस प्रकार हम देखते है कि विश्वभर में वृक्षों को पूजा जाता है. उनका सम्मान किया जाता है. इसी परिप्रेक्ष्य में यदि हम भारत को देखें तो यहाँ वृक्षों का सम्मान विश्व में सबसे ज्यादा होता है, क्योकि भारत में एक नही बल्कि अनेक वृक्षों को विधि विधान पूर्वक पूजा जाता है. उदाहरण भारत में भगवान विष्णु को सर्वाधिक प्रिय तुलसी का पूजन सर्वविदित है. तुलसी के साथ-साथ काले धतूरे को भी पूजते है.

भारतीय धार्मिंक ग्रन्थों में कहा गया है कि तुलसी और काले धतूरे का पूजन एक साथ करने से ब्रम्हा, विष्णु और महेश तीनों ही का पूजन हो जाता है, क्योकि धतुरा शिव रूप है, तुलसी विष्णु रूप है, जब कि इन दोनों में विलुप्त ब्रम्हा शक्ति का वास है.

पीपल में भगवान वासुदेव का वास कहा गया है. इसलिए भारतवासी पीपल का नित्य स्पर्शन एवं पूजन करते है, पीपल के नीचे गोमूत्र मिले जल से स्नान करने से अनेकानेक बाधाएँ दूर होती है.

 

वट वृक्ष में जड़े ऊपर से निकलकर धरती की और गमन करती है.

अत: ब्रम्हा रूप मानते हुए वट का पूजन सम्पूर्ण भारत में सर्वविदित है. आवलें का पूजन भी इसी प्रकार कार्तिक माह की शुक्ल पक्ष की नवमी को किया जाता है. दरअसल इस वृक्ष के नीचे अल्प समय बिताने मात्र से शरीर के श्वसन तन्त्र का विशिष्ट शोधन होता है.

विष पान करने वाले नीलकंठ पर चढाने जाने वाले

बिल्व पत्र विष का हरण करने में सक्षम होते है, इन पत्रों का जन्मदाता बिल्व वृक्ष भी इसी प्रकार शरीर के सम्पूर्ण विषों अर्थात विकारों को दूर करने में सक्षम होता है. इसलिए भारत में इसे भी पूजा जाता है. नवरात्रि में सप्तमी के दिन बिल्व में माँ भगवती की शक्तियों का आह्वान कर उसे शिवजी को अर्पित करने से साधक की बाधाएं दूर होती है. उसका अमूलचूल कल्याण होता है.

 

गणेशजी को दूर्वा प्रिय होने से पूजने योग्य है.

इसे गणेशजी को अर्पित करने से मनोकामना पूर्ण होती है. शमी का वृक्ष पापों का नाश करने वाला होता है. यह भगवान राम का अत्यंत प्रिय वृक्ष था. अर्जुन के अस्त्र शस्त्रों को अज्ञातवास के समय इसी वृक्ष में छुपाया गया था.

विजयादशमी की संध्या के समय शमी का पूजन वर्ष प्रयत्न कल्याणकारी होता है. जो व्यक्ति दूबों को शमी वृक्ष पर अर्पित करता है. उसका सर्वत्र कल्याण होता है. उसके विघ्न दूर होते है तथा मनोकामनाएँ पूर्ण होती है. कृष्ण को प्रिय होने के कारण कदम्ब का वृक्ष पूजनीय है. कदम्ब के पूजक को अपने जीवन साथी का सतत प्रेम प्राप्त होता है

 

आम्र मंजरी को बसंत ऋतु में पूजा जाता है.

उसका पूजन वसंत पंचमी पर करने से परम उपकार होता है. धुलेंडी के दिन मंजरी पान भी किया जाता है. जिस व्यक्ति के भवन में वास्तु अथवा अन्य प्रकार का दोष होता है, उसे आर्क पूजन करने को कहा जाता है. अपनी जड़ों में भगवान गणपति के रूपों को समेटने वाले इस वृक्ष Worshiped Tress का बुधवार को पूजन करने वाले के भवन के दोष स्वत: दूर हो जाते है तथा वह सुखी रहता है.

 

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