पृथ्वी का वातावरण Atmosphere Information


वायुमंडल (Atmosphere Information)

हमारी पृथ्वी सौर परिवार के ग्रहों में अनोखी है, आपको पृथ्वी से जुड़ी वायुमंडल Atmosphere Information यहाँ पर दी गई है. क्योकि अभी तक पृथ्वी ही ऐसा ग्रह है, जहाँ जीवन संभव है. पृथ्वी पर वायु के बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा स कती. चारों और पृथ्वी की संरक्षी गैसों का आवरण पाया जाता है जो वायुमंडल कहलाता है. वायुमंडल के कारण ही पृथ्वी पर जीवन संभव हो पाया है. जीवन को प्रभावित करने वाला वायुमंडल पृथ्वी के ऊपर लगभग ५०० किमी तक व्यापक है, परन्तु उसके भी लगभग १०००० किमी ऊपर तक वायुमंडल का विस्तार पाया जाता है. इसके बाद यह बाह्रा अन्तरिक्ष में धीरे धीरे चला जाता है.




Atmosphere Information

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वायु का संघटन (The composition of air Atmosphere Information)

वायु गैसों का मिश्रित रूप है, जिसमे नाइट्रोजन ७८%, आक्सीजन २०.९०%, आर्गन ०.९०% व कार्बनडाई आक्साइड व विरल गैसे जैसे – हीलियम, हाइड्रोजन, मेथेन, निओन, जेनान, व क्रिप्टन आदि है. वायुमंडल में नाइट्रोजन गैस की सबसे अधिक मात्र पाई जाती है. पौधों के जडों की मिट्टी में अनगिनत बेक्टीरिया होते है. जो वायुमंडल से नाइट्रोजन ग्रहण करते है तथा इसके स्वरुप को बदलने में सहायता प्रदान करते है. नाइट्रोजन गैस पौधों के जीवन के लिए अति आवश्यक है.

 

वायुमंडल की गैस (Atmospheric gas)

वायुमंडल की दूसरी मुख्य गैस है. आक्सीजन जीव जंतु व मानव जीवन के लिए अति आवयश्क है, हरे पेड पोधों भी प्रकाश संश्लेषण क्रिया से आक्सीजन की उत्पत्ति करते है. आक्सीजन वायुमंडल में एक स्थाई गैस है. प्राकृतिक पारिस्थितिक संतुलन दिन पर दिन बिगड़ता जा रहा है. इसका कारण वन विनाश तथा आधुनिक मानव के क्रियाकलाप है.

जीव जंतु व मनुष्य अपनी श्वासोत्सर्जन क्रिया द्वारा कार्बन डाई आक्साइड गैस बाहर निकालते है, जिसे हरे पोधों द्वारा उपयोग में ले लिया जाता है इसी से हरे पेड़ पौधें अपना भोजन ग्रहण करते है. इन्ही क्रियाओं से प्रकृति में कार्बन डाई आक्साइड का संतुलन बना रहता है. परन्तु आज का आधुनिक मानव अपनी क्रियाओ के द्वारा इस संतुलन को नष्ट करने में लगा है.

जैसे जीवाश्म इधनों के दहन व वनों की अंधाधुंध कटाई से वायुमंडल में कार्बन डाई आक्साइड की मात्रा लगातार बढती जा रही है. जिससे पृथ्वी के धरातल का तापमान बढ़ रहा है. जिसे वैश्विक उष्मन (Global Warming) के नाम से जाना जाता है.

पृथ्वी की जलवायु और मौसम के ऊपर इससे प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है. २०वी शताब्दी में पृथ्वी के तापमान में लगभग ०.८% की वृद्धि हुई है. जिसका मुख्य कारण मानव के क्रियाकलाप है.

पृथ्वी के हरित क्षेत्र पर भी इसका प्रतिकूल असर होता है. कार्बन डाई आक्साइड गैस सूर्य से निकली ऊर्जा को अपने अन्दर अवशोषित कर उसे बाहर निकलने से रोकती है. वायुमंडल में कार्बन डाई आक्साइड की मात्रा बढ़ने से हरित ग्रह प्रभाव में वृद्धि के साथ ही पृथ्वी का तापमान भी बढ़ जाता है. इसके अनेक दुष्परिणाम सामने आते है, जैसे नीचे के स्थानों का बाढ़ग्रस्त होना, तूफानी मौसम व हिमानी का पिघलना.

जलवाष्प भी वायुमंडल में अल्प मात्रा में होती है. वायु में इसकी उपस्थिति के कारण ही वर्षा व हिमवर्षा होती है. जलवाष्प जलवायु में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. हाइड्रोजन, हीलियम, आर्गन, औजोन एवं क्रिप्टॉन वायुमंडल की अन्य गैसें है. सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी किरणों से औजोन गैस हमारी रक्षा करती है. यह गैस पृथ्वी के ऊपर एक आवरण के रूप में कार्य करती है व पृथ्वी पर जीवन की सुरक्षा करती है.

 

वायु प्रदूषण (Air Pollution and Atmosphere Information)

प्राकृतिक पर्यावरण में जो अवांछित व अनचाहे परिवर्तन मानवीय क्रिया कलापों द्वारा हो रहे है वे सभी प्रदूषण के अंतर्गत आते है. जो पदार्थ प्रदूषण उत्पन्न करते है, वह प्रदूषक कहलाते है. दो प्रकार के पदार्थ वायु में प्रदूषण उत्पन्न करते है. ठोस व गैसीय. ठोस पदार्थों में राख, धुल आदि के कण आते है. चीनी के कारखानों से निकलने वाली खोई वायु को प्रदूषित करती है सीमेंट के कारखाने बड़ी मात्रा में वायुमंडल में धुल छोड़ते है जो जन जीवन के लिए हानिकारक है.

हाँट मिक्स प्लाट तथा पत्थर कूटने व पीसने से भी धूल वायुमंडल में मिलती रहती है. लकड़ी चीरने वाले कारखानों द्वारा भारी मात्रा में धूल वायुमंडल में मिलती रहती है. निकिल सीसा, एस्बेस्टस, केडियम, आर्सेनिक, टिटेनियम जैसे खनिज वायुमंडल में गैसिस व ठोस दूषित पदार्थों को बढ़ाते है. धूल भरे तूफ़ान तथा ज्वालामुखी के प्राकृतिक स्त्रोत वायु को प्रदूषित करते है.

शोधनशालाएं व ताप विद्युत संयंत्र द्वारा भी वायु में योगिकों की व्रद्धि होती है, फसलों पर कीटनाशकों के छिडकाव से वायु में फ्लोरों कार्बन तत्व मिल जाते है. बड़े-बड़े शहरों में ज्यादा भीडभाड व यातायात होने के कारण कार्बन मोनो आक्साइड की भारी मात्रा वायुमंडल में पहुंचती है. धुएं व कोहरें के मिश्रण से वायुमंडल में धूम्र कोहरा बनता है. जो मानव के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है. गैसीय पदार्थों में वायु प्रदूषण का मुख्य स्त्रोत वाहनों के द्वारा छोड़ा जाने वाला धुआं है. कारखानों में ईधन के जलने से वायुमंडल में कार्बन डाई आक्साइड निरंतर बढती जा रही है. वायु प्रदूषण रोकने के लिए हमें सरकार की मदद करनी चाहिए व उसके खतरे के प्रति भी सावधान बरतनी चाहिए. केवल भारत में नहीं बल्कि संसार के अनेक देशों में वायु प्रदूषण रोकने के लिए विभिन्न प्रकार के कानून बनाये गए है. लेकिन उनका पालन न तो किया जाता है और न ही करवाया जाता है.

Atmosphere Information

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वायुमंडल की बनावट, चार ऊर्ध्वाधर परतें वायुमंडल में पाई जाती है

  • क्षोभमंडल
  • समतामंडल
  • मध्यमंडल
  • तापमंडल

 

क्षोभमंडल (Troposphere and Atmosphere Information)

क्षोभमंडल में अधिकतर मेघ जलवायु व धूल कण विघमान होते है. मौसम के सारे परिवर्तन जैसे पवन चलना, मेघों का बनना व गर्जन, वर्षा और विद्युत का चमकना इसी तरत में होते है. वायुमंडल की सबसे निचली परत क्षोभमंडल कहलाती है. वायुमंडल की ९०% सहित इसी परत में पाई जाती है इस परत की ऊपरी सीमा क्षोभसीमा कहलाती है.

जिसका विस्तार ध्रुवों के ऊपर ८ किमी व विषुवत रेखा पर १८ किमी तक है. इस परत में ऊचाई बढ़ने के साथ तापमान घटता जाता है. जिसकी दर प्रति १००० मीटर पर ६.४ डिग्री सेल्सियस है.

 

समतापमंडल (Stratosphere and Atmosphere Information)

समतापमंडल का विस्तार क्षोभमंडल के ऊपर लगभग ५० किमी तक है. इस परत में ऊचाई के साथ तापमान का गिरना रुक जाता है इसलिए इसे समतापमंडल कहा जाता है. इसमें जेट स्टीम पवनें निरंतर चलती रहती है इसकी गति अत्यंत तेज होती है. जलवाष्प व धूल कण इस परत में नहीं पाए जाते है. यह परत स्वच्छ व शांत होती है. जिसमें जेट विमानों को उड़ाने में बहुत आसानी होती है. औजोन परत समताप मंडल में स्थित होती है जो सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी किरणों का अवशोषण करके पृथ्वी पर जीवन को सुरक्षा देती है.

 

मध्यमंडल (Mesosphere and Atmosphere Information)

इस परत का विस्तार पृथ्वी के ऊपर ५० से ८० किमी की ऊँचाई तक है. यह परत समतापमंडल व तापमंडल के बीच पाई जाती है. ऊँचाई के साथ परत में तापमान गिरता जाता है. इस परत की निचली सीमा, समताप सीमा व ऊपरी सीमा मध्यम सीमा द्वारा निश्चित होती है.

 

तापमान (Temperature and Atmosphere Information)

पृथ्वी धरातल से ८० किमी के ऊपर तापमंडल पाया जाता है. ऊचाई बढ़ने के साथ ही इस परत में तापमान भी बढ़ जाता है. १०० किमी से ३०० किमी के बीच आयनमंडल परत पाई जाती है. जिसमे इलेक्ट्रान का घनत्व बहुत अधिक है और यह रेडियो व दूरदर्शन संचार के लिए अत्यंत उपयोगी है. इस तापमंडल के ऊपर वायुमंडल अधिक विरल होकर सूर्य के वायुमंडल अधिक विरल होकर सूर्य के वायुमंडल में विलीन हो जाता है.

 

तापमान और वायुदाब (Temperature and Air Pressure)

पृथ्वी के धरातल पर क्षेतीय व ऊर्ध्वाधर रूप में तापमान में भिन्नता पाई जाती है. तापमान का अर्थ फारेनहाईट या सेल्सियस में मानी जाने वाली ऊष्मा की मात्रा से लिया जाता है. तापमान का वितरण तीन बातों पर निर्भर करता है. किसी स्थान का अक्षांश, उसकी समुद्र तल से दूरी तथा उस स्थान की समुद्र से ऊचाई होता है.

 

अक्षांश (Latitude)

किसी स्थान के अक्षांश व उस स्थान पर सूर्य के ताप की प्राप्ति में गहरा सम्बंध होता है ताप की सबसे ज्यादा मात्रा विषुवत रेखा के क्षेत्रों में पड़ती है और ध्रुवों पर सबसे कम तापमान पाया जाता है क्योकि विषुवत रेखा पर सूर्य की किरणें पूरे सीधी पड़ती है लेकिन ध्रुवों पर सूर्य की किरणें हमेशा तिरछी पड़ती है.

 

समुद्र तल से दूरी (Distance from sea level Atmosphere Information)

तापमान का प्रभाव समुद्र से दूरी पर भी पड़ता है समुद्र तट के पास के स्थानों में हमेशा तापमान समान या मृदु बना रहता है. समुद्र से दूर जाने पर आंतरिक भागों में तापमान बढ़ता जाता है और जलवायु में भी विषमता पाई जाती है. तापमान पर समुद्र से दूरी का प्रभाव इस कारण होता है जैसे पानी, स्थल की अपेक्षा देर से गर्म होता है व देर से ठंडा होता है.

 

समुद्र से ऊचाई (Attitude)

समुद्र तल से प्रत्येक १६५ मीटर की ऊचाई पर तापमान में १ डिग्री सेल्सियस की कमी हो जाती है. समुद्रतल से किसी स्थान की ऊचाई व उसके तापमान में आपस में गहरा संबंध है.

 

वायुदाब

वायु में भार होता है इसलिए वह पृथ्वी के धरातल पर दाब डालती है. वायुमंडल का दाब बैरोमीटर से नापा जाता है, समुद्र तट के निकट पृथ्वी के धरातल पर वायु दाब सघन पाया जाता है, परन्तु हम जैसे-जैसे समुद्र तल से ऊचाई पर जाते है तो वायुमंडल विरल होता जाता है और वहाँ यह कम दबाव डाल पाती है. इसलिए ऊँचे स्थानों अर्थात पहाड़ों पर वायुदाब कम पाया जाता है.

 

वायु की भिन्नता

वायुदाब में भिन्नता क्षेतिज रूप में पाई जाती है. कहीं वायुदाब के दबाव तथा तापमान में प्रतिकूल सम्बंध होता है. वायु ताप कहीं ज्यादा तो कहीं कम होता है. अर्थात जब वायु अधिक होता है तो वायु हल्की को जाती है तथा वायु दबाव कम हो जाता है और ठंडी वायु के अधिक सघन होने से वायु का दबाव बढ़ जाता है.

 

पवन के बारे में जानकारी

क्षेतिज संचार तथा वायु की गति को पवन कहते है. वायु के चलने की दिशा के अनुसार ही इसका नामकरण किया जाता है. जैसे पश्चिम दिशा से चलने वाली वायु को पछुआ तथा पूर्व दिशा से चलने वाली वायु को पुरवा कहा जाता है. पवन हमेशा उच्च दाब से निम्न दाब की और ही चला करती है.

 

ग्रहीय पवन

स्थाई पेटियों में वर्षभर चलने वाली पवन ग्रहीय अथवा सनातनी पवन कहलाती है, अर्थात पृथ्वी के धरातल पर विभिन्न प्रकार की पवन चला करती है. पृथ्वी के घूर्णन (Rotation) का प्रभाव इन पवनों के चलने की दिशा पर पड़ता है. इसी कारण पवन सीधी न चलकर दक्षिणी गोलार्द्ध में अपनी दाहिनी और मुड जाती है. इसी तरह उत्तरी गोलार्द्ध में विषुक्त रेखा की और चलने वाली पवन पश्चिम की और व ध्रुओं की और चलने वाली पवन पूर्व की तरफ मुड़ जाती है. पवनों के मुड़ने को कोरियोलिक प्रभाव कहा जाता है. इस प्रभाव की व्याख्या फ्रंसीसी विद्वान कोरियोलिस द्वारा किये जाने के कारण इनके नाम पर किया गया.

 

तीन प्रकार की ग्रहीय पवन जो पृथ्वी पर चला करती है.

  • ध्रुवीय पवन
  • पछुआ पवन
  • व्यापारिक पवन

 

स्थलीय तथा समुद्री समीर (Land Sea Breezes)

तब वहाँ पर निम्न वायुदाब स्थापित हो जाता है. ये पवन आद्रता से पूर्ण होती हो. समुद्र से स्थल की और तब धीमी पवन चलने लगती है. इन्हें समुद्री समीर भी कहते है. रात्री में स्थलीय भाग ठंडा हो जाता है. तब वहाँ पर उच्च वायुदाब होता है. पवन अब स्थल से समुद्र की और चलने लगी है जो शुष्क होती है, यह स्थलीय समीर कहलाती है.

 

वायुमंडलीय आद्रता

जलवाष्प की मात्रा जो वायुमंडल में विघमान होती है, वायुमंडलीय आद्रता कहलाती है. जलवाष्प का मुख्य स्त्रोत महासागर और सागर में उपस्थित जल है. जल वाष्प की उपस्थिति स्थलीय वायुमंडल में कम तथा समुद्री वायुमंडल में अधिक पाई जाती है जलवाष्प की मात्रा स्थलीय क्षेत्रों में भी ध्रुओं की अपेक्षा विषुवतीय क्षेत्रों में अधिक पाई जाती है शीत ऋतु की तुलना में ग्रीष्म ऋतु में जलवाष्प अधिक होती है.

 

वाष्पीकरण

जल के जलवाष्प में बदलने तथा गैसीय रूप धारण करने की प्रक्रिया वाष्पीकरण कहलाती है. वाष्पीकरण की प्रक्रिया होती रहती है. लेकिन वायुमंडल एक सीमित मात्रा में ही जलवाष्प ग्रहण कर सकता है. जलवाष्प की वह मात्रा जो वायु एक निश्चित ताप पर ग्रहण कर सकती है, उसे सम्प्रक्त वायु कहते है. इस प्रकार हम कह सकते है कि गर्म वायु में ठंडी वायु की तुलना में जलवाष्प धारण करने की क्षमता अधिक होती है.

 

संघनन

जब वायुराशि का तापमान गिर जाता है तो उसकी जलवाष्प धारण करने की क्षमता भी कम हो जाती है तापमान पर जलवाष्प युक्त वायुराशि सम्प्रक्त होती है उसे ओसांक कहते है. जलवाष्प से सम्प्रक्त वायु का तापमान ओसांक से नीचे चला जाता है तो वायु अपने अन्दर नमी को रोक नहीं सकती तब अतिरिक्त जलवाष्प जल बिन्दुओं में बदल जाती है इस प्रक्रिया को ही संघनन कहा जाता है. जब जलवाष्प का संघनन होता है तभी मेघ, ओस, पाला या कोहरे का निर्माण होता है.

 

वर्षण तथा वर्षा

पानी, ओला, हिम या हिम वर्षा की रूप में वर्षण होता है बादलों (मेघों) में विघमान जल कण तथा हिम के कण (Ice-Crystal) जब आपस में एक होकर अपना आकार बढ़ाते है, तब बादल (मेघ) उनका भार सम्भालने में असमर्थ हो जाते है तथा वे पृथ्वी के धरातल पर गिरने लगते है. इस क्रिया को वर्षण कहते है.

 

वर्षा की क्रिया

संघनन की क्रिया जब जीरो डिग्री सेल्सियस तथा इससे भी कम तापमान पर होती है तो अतिरिक्त जलवाष्प हिमकणों में परिवर्तित हो जाती है. जब ये हिमकण आकार में बड़े हो जाते है तो ये भारी होकर हिम वर्षा के रूप में धरातल पर गिरने लगते है. वर्षा तीन प्रकार की होती है संवाहानिक वर्षा, पर्वतीय वर्षा चक्रवातीय वर्षा.

संवाहानिक वर्षा (Conventional Rain Fall)

दिन के समय अधिक तापमान होने के कारण स्थल मार्ग गर्म ओ जाता है, तब उस स्थल के ऊपर की वायु गर्म होने के कारण ऊपर उठ जाती है. उसका स्थान लेने के लिए ऊपर की वायु नीचे आने लगती है. इस प्रकार वायु में संवाहानिक धाराएँ उत्पन्न होने लगती है. विषुवत रेखीय देशों में ऐसी वर्षा पुरे वर्ष होती रहती है. अद्र्तायुक्त गर्म वायु के ऊपर उठने से तापमान गिर जाता है व नमी (आद्रता) का संघनन होने के कारण वर्षा के रूप में धरातल पर आने लगती है. विषुवत रेखीय देशों में इस प्रकार का वर्षा प्रत्येक सायंकाल (शाम) होती है और इसके साथ ही मेघों का जोर से गरजना तथा बिजली चमकना भी होता रहता है.

 

पर्वतीय वर्षा (Retief Rain Fall)

जब कोई पर्वत बाधा के रूप में नमीयुक्त पवनों के सामने आ जाता है तब ये पवन ऊपर उठ जाती है जिससे इनका तापमान गिर जाता है और उनकी नमी संघनित होकर पर्वत के सम्मुख ढाल पर वर्षा के रूप में गिरने लगती है. लेकिन इसके विमुख ढाल पर वर्षा के रूप में गिरने लगती है. लेकिन इसके विमुख ढाल पर उतरने पर दबाव के कारण पवनों का तापमान बढ़ने लगता है और उनकी नमी भी कम होने लगती है जिस कारण इस तरह की पवन वर्षा नहीं करती. ऐसा क्षेत्र वर्षा छाया प्रदेश कहलाता है. भारत के पर्वतीय घाट पर पर्वतीय वर्षा होती है. मानसूनी पवनों द्वारा ऐसी वर्षा होती है.

 

चक्रवाती वर्षा (Cyclonic Rain Fall Atmosphere Information)

पौधों तथा प्राणी जगत के लिए वर्षा बहुत मत्वपूर्ण है. वर्षा अगर ज्यादा हो जाए तो बाढ़ आ जाती है जबकि यदि वर्षा कम हो तो सूखा पड़ जाता है तथा अकाल तक की स्थिति उत्पन्न हो जाती है.

चक्रवातीय वर्षा को वाताग्रीय वर्षा भी कहा जाता है. शीतोष्ण कटिबंध में ऐसी वर्षा होती है. जहाँ पर वायुराशियों के शीतल व उष्ण वाताग्र आपस में मिलते है. रेनगेज से वर्षा नापी जाती है. यदि किसी समतल जगह पर १० सेमी गहरा जल एकत्रित हो जाता है तो इसका मतलब है कि उस जगह पर १० सेमी वर्षा हुई है.

 

मौसम तथा जलवायु Atmosphere Information

मौसम किसी स्थान विशेष में एक निश्चित समय में जो वायु दशाए होती है, जिनमे पवन, वायुदाब, तापमान आद्रता, मेघ व वर्षा आदि तत्व विघमान होते है, वह मौसम कहलाता है.

 

जलवायु

जलवायु अल्पाविधि को नहीं दीर्घ काल तक की औसत दशाओं के योग को बताती है. जलवायु का आशय मोसम के तत्वों के योग से है.

 

महत्वपूर्ण तथ्य Key Facts

  • वायुमंडल में प्रचुर मात्रा में नाइट्रोजन व आक्सीजन है.
  • क्षोभमंडल में मौसम सम्बंधी सभी घटनाएँ होती है.
  • वायु में मौजूद जलवाष्प आद्रता कहलाती है.
  • जेट विमान उड़ाने के लिए समतापमंडल महत्वपूर्ण है.
  • कार्बन डाई आक्साइड की मात्रा वायुमंडल में बढ़ने से तापमान में वृद्धि हो रही है.
  • मानसून व स्थलीय तथा समुद्री समीर स्थानीय पवनों में मुख्य है.
  • पवनों के चलने का कारण वायुदाब में भिन्नता का होना है.
  • वायुमंडल में उर्ध्वाधर रूप में स्थित चार प्रमुख परतें है. क्षोभमंडल, समतापमंडल, मध्यमंडल व तापमंडल हमारे लिए मौसम व जलवायु बहुत महत्वपूर्ण है.

 

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2 Responses

  1. अजय कुमार says:

    Sir वर्षण में कोहरा, ओस , पाला क्यों नहीं पाया जाता है ?

  2. अजय कुमार says:

    वर्षण में कोहरा , पाला , ओस नहीं आते क्यों ?

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