प्रकृति के क्रिया कलापों का वर्णन

प्रकृति के क्रिया

मैथलीशरण गुप्त द्वारा प्रकृति के क्रिया कलापों का वर्णन




है बिखरे देती वसुंधरा मोती सबके सोने पर,

रवि बटोर लेता है उनको सदा सबेरा होने पर.

और विरामदायनी अपनी संध्या को दे जाता है,

शून्य श्याम तनु जिससे उसका नया रूप झलकता है.

प्रकृति के क्रिया कलापों का वर्णन

प्रकृति के क्रिया कलापों का वर्णन

सन्दर्भ प्रसंग – प्रस्तुत पंक्तियो में कवि मैथलीशरण गुप्त ने प्रकृति के क्रिया कलापों का वर्णन किया है.

व्याख्या – जब सारा संसार नींद में लीन हो जाता है, तब रात्री के एकांत और शांत समय में पृथ्वी ओस कण रूपी मोतियों को चारो और बिखरे देती है. प्रातकाल होते ही सूर्य उन मौतियों को बटोर लेता है. इन मौतियों को वह विश्राम देने वाली संध्या को उपहार के रूप में देता है. इन मौतियों को प्राप्त कर संध्या रूपी सुन्दरी का आकाश रूपी साँवला शरीर नया रूप प्राप्त कर झलकने लगता है अर्थात संध्या के समय वही ओस कण तारे बनकर आकाश में चमकने लगते है.

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