ब्रम्हा मुहूर्त की जानकारी

ब्रम्हा मुहूर्त की प्रारम्भिक क्रियाये

ब्रम्हा मुहूर्त के महत्वपूर्ण तथ्य

माता पिता गुरु का अभिवादन करना चाहिए. उपयुक्त पूज्यजनों का अभिवादन करने से व्यक्ति के उत्तम गुणों एवं देवी शक्तियों का संचार होता है. आपके दैनिक जीवन का अभ्युदय प्रारम्भ हो जाता है. वह मनुष्य तत्व की कोटि में पहुँचकर श्ने-शेन देवत्व के सन्निकट पहुँच जाता है.




ब्रम्हा मुहूर्त की जानकारी

ब्रम्हा मुहूर्त की जानकारी

हमारी भारतीय संस्कृति संस्कारों की जननी है. इसमें प्रात: काल उठने के बाद एवं स्नान से पूर्व जो आवश्यकता विभन्न कार्य है, शास्त्रों के उनके लिए सुनियोजित विधि बताई गई है.

 

ब्रम्हा मुहूर्त में जागरण

सूर्योदय से लगभग डेढ़ घंटे पूर्व ब्रम्हामुहूर्त में ही जाग जाना चाहिए. सूर्योदय के पश्चात सोना शास्त्र में निषिध्द है.

 

करावलोकन

आखों के खुलते ही दोनों हाथो की हथेलियों को देखते हुए निम्नलिखित श्लोक का पाठ करना चाहिए. कराग्र वसति लक्ष्मी: करमध्ये सरस्वती

करमूले स्थितो ब्रम्हा, प्रभाते कर दर्शनम्

 

अर्थात हमें प्रभातकाल में अपने दौनो हाथो को मिलाकर उनका दर्शन करना चाहिए. कारण, हाथ के अग्रभाषा में लक्ष्मी मध्य भाग में सरस्वती और हाथ के मूल भाषा में ब्रम्हा निवास करते है. मुस्लिम भाई नमाज पढ़ते समय अपने दौनो हाथो को मिलाकर अल्लाह से रहमत और बरकत की माँग करते है. जैन मान्यता के अनुसार कथन है.

 

ब्र्म्हो मुहूर्ते उत्थाय, कृत पच्च नमस्कृति

कोःम को में धर्म: कि व्रत चेति परामृशेत

पंडित आशाधरसुरी सागर धर्मामूत ६/१

अर्थात हमें ब्रम्हा मुहुर्त में विस्तार से उठकर पच्च नमस्कार

 

मंत्र या णमोकार मंत्र का उच्चारण करना चाहिए. फिर यह चिंतन करना चाहिए कि मैं कौन हूँ ? मेरा धर्म क्या है? मेरा वृत्त क्या है?

 

भूमि वन्दना

शैया से उठकर पृथ्वी पर पैर रखने के पूर्व पृथ्वी माता का अभिवादन करना चाहिए. उस पर पैर रखने की विविशता के लिए उससे क्षमा माँगते हुए निम्नलिखित श्लोक का पाठ करना चाहिए.

 

समुद्र वसने देवी, पर्वत स्तन म्न्धिते,

विष्णु पत्नी नमस्तुभयं, पादस्पर्श क्षमस्व में

 

अर्थात समुद्री रूपी वस्त्रों को धारण करने वाली पर्वत रूपी स्तनों से मंडित, भगवान विष्णु की पत्नी, है पृथ्वी देवी आप मेरे पाद स्पर्श को क्षमा कीजिये.

 

मंगल दर्शन

तत्पश्चात मांगलिक वस्तुओं जैसे शंख, मृदंग, सुवर्ण आदि का दर्शन करना चाहिए. इसी प्रकार सन्त, गुरु, अग्री सूर्य आदि को नमस्कार करना चाहिए. अथवा किसी देव मंदिर में विराजमान प्रतिमा के दर्शन करने चाहिए.

 

माता पिता गुरु का अभिवादन

तत्पश्चात माता पिता गुरु का अभिवादन करना चाहिए. उपयुक्त पूज्यजनों का अभिवादन करने से व्यक्ति में उत्तम गुणों एवं देवी शक्तियों का संचार होता है. उसका अभ्युदय प्रारम्भ हो जाता है. वह मनुष्यतत्व की कोटि में पहुँचकर श्ने-श्ने देवत्व के सन्निकट पहुँच जाता है

 

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1 Response

  1. Rakesh says:

    Great article

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