संस्कृत भाषा भारत की धरोहर


भारतीय संस्कृत भाषा हमारी धरोहर

आज भौतिक चकाचौंध ने मानव को संस्कारविहीन बना दिया है. हम अपनी संस्कृति को भूलकर पाश्चात्य संस्कृति अपना रहे है और दुखी हो रहे है. संस्कृत भाषा एक ऐसी भाषा है, जिसमे कदम कदम पर जीवन के संस्कारों का खजाना गड़ा है. इस गड़े धन की परवाह किये बिना हम भौतिकवाद की तरफ भाग रहे है और स्वयं ही दुखी हो रहे है.




संस्कृत भाषा भारत की धरोहर

संस्कृत भाषा भारत की धरोहर

भारतीय संस्कृति संस्कृत भाषा में ही निहित है, संस्कृत को देवभाषा कहा गया है. सभी भाषाओँ की जननी भी संस्कृत को ही माना गया है. संस्कृत भाषा के विषय में जानने के पूर्व हमें इसके पूर्व को समझना होगा. संस्कृत अर्थात संस्कारों के लिए बनी भाषा ही संस्कृत है.

 

“संस अर्थात संस्कार कृते अर्थात के लिए”

आज भौतिक चकाचौंध ने मानव को संस्कारविहीन बना दिया है. हम अपनी संस्कृति को भूलकर पाश्चात्य संकृति अपना रहे है. और दुखी हो रहे है. संस्कृत एक ऐसी भाषा है, जिसमे कदम कदम पर जीवन के संस्कारों का खजाना गडा है. इस गड़े धन की परवाह किये बिना हम भौतिक वाद की तरह भाग रहे है. और स्वयं ही दुखी हो रहे है.

आज का विद्यार्थी यदि संस्कृत के विषय में सोचता है तो बस १० वी तक तो पढनी है, पास हो जाऊं, बस वह यह नहीं समझ पा रहा है कि संस्कारों का बीज ही उसकी उम्र में ५ वी से १० वी तक बोया जाता है और यदि उसे संस्कृत भाषा रूपी पानी से सिंचित किया गया है तो वह युवाव्स्थाता एक पुष्ट वृक्ष रूप संस्कारों के फल के साथ अपनी सुगंध सभी दिशाओं में फैलाएगा. संस्कृत के श्लोक उसे युवावस्था में अपनी और बरबस आकर्षित करेंगे. युवावस्था में यदि वह माँ का अपमान करता है, तो उसे याद आएगा.

 

जननी जन्मभूमिश्चत स्वर्गादिपति गरीयसी या मातृ देवो भव

अर्थात माता और मातृभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर है एवं माता ही सर्वोच्च देव है. उसे देवी मानो.

 

अपने अध्ययन के प्रति यदि वह लापरवाह हो रहा है तो उसे याद आएगा.

पुस्तकस्था तू या विघा, परहस्तगतम धनम

कार्यकाले समुत्पन्ने न सा विघा न तद धनम

 

अर्थात पुस्तक में स्थित विघा और दूसरे के हाथ में गया धन कार्य के उत्पन्न होने पर काम न आवे तो न वह विघा के समान है और न वह धन, धन के समान है.

 

इस प्रकार संस्कृत में ऐसे कई श्लोक है, जो विद्यार्थी जीवन में यदि ध्यान से पढ़े गए है. तो उनका प्रभाव हर अवस्था में अवश्य हो होगा. संस्कृत भाषा को पढ़कर हम वर्तमान पीढ़ी को  अपने मार्ग से भटकते में रोक सकते है  एवं उन्हें एक संस्कारवान व  अनुशासनबध्द जीवन जीने की प्रेरणा दे सकते है, लेकिन इसके लिए उन्हें संस्कृत के महत्व को बताना जरुरी होगा.

केवल १० वी कक्षा तक रटन विघा से पास होने तक ही संस्कृत को सीमित नहीं करना होगा. जीवन में बचपन से लेकर वृद्धावस्था तक संस्कृत का अपना महत्व है. युवावस्था, प्रोढ़ावस्था तक मनुष्य की सभी इन्द्रियों उसका साथ देती है. लेकिन वृधावस्था में वे भी शिथिल हो जाती है और वृधावस्था का सच्चा जीवन एकमात्र धर्म है.

यदि धर्म आपको कंठस्थ है तो व्यक्ति किसी का भी मोहताज नहीं रहता है. हम जिंदगीभर जिस सम्पत्ति को एकत्र करते रहते है. वह भी हमारा साथ नहीं देती. संतान भी वृधावस्था में कहना माने या न माने, क्या भरोसा. इस कलयुग रूपी दानव के आगे कुछ भी कहना मुश्किल है, लेकिन हमारी युवावस्था व बचपन में धर्म का जो बीज संस्कृत द्वारा बोया गया था,

वह यदि हमें कंठस्थ है तो हम एकमात्र सहारा उसे ही बनाकर अपनी वृधावस्था व्यतीत कर सकते है तथा मृत्यु उपरांत आने वाले भव भी सुधार सकते है. मनुष्य, धर्म तभी कर सकेगा, जब उसे संस्कृत का थोड़ा भी ज्ञान होगा, क्योकि अधिकांश धर्म में स्तुति की भाषा संस्कृत ही है.

 

जैन धर्म में संस्कृत और प्राकृत भाषा का उपयोग समान रूप से किया गया है.

भगवान महावीर के ग्रंथो, जिन्हें, आगम कहा गया है, प्राकृत भाषा में है. वही भक्तामर, महावीर राष्ट्क, कल्याण मंदिर, सामाजिक, प्रतिक्रमण आदि संस्कृत में है. हिन्दू धर्म में रामरक्षा महामृत्युंजय जाप, गायत्री मन्त्र, गीता आदि संस्कृत में है. व्यक्ति अपने जीवन में इस सभी को कंठस्थ करके अपना जीवन सुखी कर सकता है, लेकिन आवश्यक है संस्कृत के प्रति आस्था, निष्ठा, प्रेम सभी साथ छोड़ देते है, लेकिन धर्म कभी साथ नहीं छोड़ता, लेकिन आवश्यक है कि वह कंठस्थ हो.

अंत में मैं यही सोचती हूँ की हमें हमारे जीवन की इस महान पूँजी संस्कृत को बचाना होगा इसके माध्यम से हमें संस्कृत व संस्कार दौनों की ही रक्षा करनी होगी. समाज, राष्ट्र व परिवार तीनों में ही संस्कृत जो वही सम्मान व आदर दिया जाए जो आज अंग्रेजी को दिया जा रहा है. इस प्रकार हमें संस्कृत की रक्षा करनी होगी.

 

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