मीता की कहानी Hindi Story


मीता के स्नेहबंधता  के ऊपर हिंदी कहानी

मीता – माँ ये है मीतु मैत्रेयी, धुर्व ने परिचय करवाया तो देखती ही रह गई, कटे बाल के नीचे एक छोटा सा चेहरा वह भी आधा धुप के चश्मे से ढका हुआ. गहरे नील रंग के ऊपर चटख पीले रंग का स्वेटर उसकी बुनाई. इतनी प्यारी कि कोई और होता तो पास बिठाकर पहले बुनाई उत्तर लेती बाकी बाते बाद में होती. पर ये मीतू थी. मैत्रेयी अपनी सारी खीज उन पर उड़ेलते हुए मैंने कहा, बहुरानी आई है, चलकर मुआयना कर लीजिये.




बहुरानी, उन्होंने चौककर पूछा फिर चश्मा उतारकर मुझे सीधे देखते हुए बोले, बहुरानी आई है तो तुम्हारा स्वर इतना तल्ख क्यों है?

Story in Hindi - मीता की कहानी

Story in Hindi – मीता की कहानी

एक तो नहीं साथ रहते पुरे २८ साल हो गए है. मेरे स्वर का एक एक उतार चढाव उन्हें कंठस्थ हो गया है. फिर भी मैंने कोई जवाब नहीं दिया और चाय बनाने के बहाने रसोई में चली गई. आधा पौने घंटे बाद जब चाय नाश्ता सजाकर बाहर ले गई, उस समय बैठक कहकहो से गुलजार थी. इस बीच शायद शिव भी कालेज से लौट आया था और उसी के किसी चुटकुले पर सब लोग ठहाके लगा रहे थे.

मुझे देखते ही शिव ने आगे  बढ़कर ट्रे थाम ली. ध्रुव ने मेज से सारा कबाड़ हटाकर जगह बनाई. पानी का जग और चटनी की शीशी अन्दर छुट गई थी. ट्रे रखकर शिव दौड़कर दोनों चीजे ले आया. सब कुछ एकदम स्वाभाविक ढंग से ही हो रहा था. जब से सविता ससुराल गई है, बच्चे इसी तरह माँ का हाथ बटा लेते है. पर पता नही क्यों आज मुझे यह सब अच्छा नहीं लगा. थोडा सब्र तो किया होता इन लोगो ने. मैं भी तो देखती मीतू नाम की यह लड़की कितना अदब कायदा जानती है. घर की बहू बनकर आ रही है, यह तो हुआ नहीं कि खुद चलकर रसोई घर तक आती, झूठमुठ ही सही, मदद के लिए पूछती. बस लाट साहब की तरह बाहर बैठी रही. लड़के बेचारे बैरों की तरह दौड़ धूप कर रहे है.

 

नाश्ते के लिए गरम समोसे बना लिए थे. सूजी के लड्डू और घर का बना चिवड़ा भी साथ था. हाय माँ आपने यह सब घर पर बनाया है. मीता किलककर बोली, मैं तो विश्वास नहीं कर सकती रोज इतना भारी नाश्ता देती है आप तभी आपके दोनों सुपुत्र मौटुमल हो रहे है. ऐ हमें नजर मत लगाओं ध्रुव ने टोका माँ की जीवन भर की साधना है हमारे पीछे, जानती है मिताजी शिव ने कृत्रिम गंभीरता ओढ़कर कहा, माँ ने हमको खिला पिलाकर ऐसा तैयार कर दिया है कि अब कैसी ही कर्कश बीबी मिले, हम निपट लेंगे. मैदान छोड़कर भागेंगे नहीं.

 

कमरा एक बार फिर हँसी में डूब गया. मुझे लेकिन बड़ा ताव आ रहा था. मेरे बच्चो को मोटुमल कहने का हक़ इसे किसने दे दिया? अभी तो घर में आई भी नहीं और रौब झाड़ने लगी? वाह, यह भी कोई बात हुई. तुम्हारे माँ बाप ने तुम्हे नहीं खिलाया तो हम क्या करे? तुम अपने राज में डबलरोटी खिला खिलाकर उसे दुबला कर लेना बस.

 

चलूँ माँ मैंने अपनी तन्द्रा से चौककर देखा सब लोग उठ खड़े हो गए थे, मीता नमस्ते कर रही थी. फिर वह चली गई दरवाजे तक छोड़कर हम लोग लौट आये. ध्रुव उसे घर तक छोड़ने चला गया. पहली बार आई थी. बच्चो के पापा घर में आते ही शुरू हो गए. जिस तिस को तो तुम नेग बाटती फिरती हो. उसे यूँ ही खाली हाथ भेज दिया.

 

मैं कोई जवाब नहीं दिया. खाली प्लेट प्याले समेटकर रसोई में चली आई. हुँह पहली बार आई थी तो कोई क्या करे. रीति रिवाजो का ठेका क्या हमने ही ले रखा है. वह क्या एक बार झुककर पैर नहीं छु सकती थी. एकदम ही अंग्रेज बनी जा रही थी.

 

सारी शाम मैं रसोई में ही बनी रही. मुझे मालूम था, मेरी प्रतिक्रिया जानने को अब उत्सुक होंगे. पर मैंने किसी को हवा नहीं लगने दी. शिव एक दो बार आकर मंडरा गया, परमें व्यस्त होने का दिखावा करती रही.

 

रात खाते की मेज पर भी एक अव्यक्त तनाव था. बच्चो के पापा ने एक दो चुटकुले सुनाकर उसे तोड़ने की कौशिश भी की, पर बात कुछ बनी नहीं.

 

खाने के बाद भी काम कहाँ ख़त्म होता है, सारे दरवाजे खिड़कियाँ मुझे ही देखने होते है. घर भर की बत्तियाँ बुझानी होती है. टंकी में पाइप छौड़ना होता है. दूध दही के बर्तनों को जाली की अलमारी में रखना होता है. आँगन में सूखते कपडे उतरना होता है.

 

एक एक काम निपटाती जा रही थी कि देखा, ध्रुव पास आकर खड़ा हो गया है. माँ उसने कांपते हुए स्वर में पुकारा, क्या है? तौलिए को तहाते हुए मैंने पूछा. तुम्हे मीता कैसी लगी? मेरे लगने का क्या है, तुम्हे पसंद आनी चाहिए, बस नहीं माँ तुम्हारी पसंद बहुत जरुरी है. तुम्हारी और पापा की. शाम से मन में जो अंधड़ उठ रहा था, ध्रुव के प्रश्न से तीव्र हो उठा. तुमने जवाब नहीं दिया माँ. अच्छा यह बताओ क्या उसे पता था कि तुम उसे कहाँ ले जा रहे हो, मैंने प्रति प्रश्न किया, हाँ क्यों ?

 

तो क्या वह ढंग के कपडे पहनकर नहीं आ सकती थी? कम से कम तुम उसे मैंने कहाँ था, माँ फिर? वह बोली मैं जैसी हूँ वैसी ही उन्हें देख लेने दो बेकार नाटक करने से फायदा खैर कपड़ो को छोड़ो. वैसे कैसी लगी, बताओ.

 

ध्रुव इतनी आजिजी से पूछ रहा था कि उसका दिल दुखाते न बना. अच्छी है, मैंने अनमने ढंग से कहा और बात समाप्त कर दी. वरना सच तो यह था कि मैंने मीता को ठीक से देखा ही नहीं था. पहली ही नजर में उसका हुलिया देखा और मन खट्टा हो गया था. बहू को लेकर मन में कितनी कोमल कल्पनाए थी, सब राख हो गई थी. गुस्सा तो अपने लाड़ले पर आ रहा था. प्रेम करते समय इन लोगो की अक्ल क्या घास चरने चली जाती है.

 

कैसे प्यारे प्यारे रिश्ते आ रहे थे पर तकदीर में तो यह सर्कस सुन्दरी लिखी थी न एक उसास भरकर रह गई मैं. एक बार हम लोगो की स्वीकृति की मुहर लगने भर की देर थी, फिर तो सारे काम फटाफट और कायदे से होते चले गए. मीता के पिताजी स्वयं घर आये और उन्होंने ओपचारिक रूप से रिश्ते की पहल की . मीता को अपनी बहू बना लेने के लिए करबद्ध निवेदन किए. उन्होंने बताया कि पत्नी की मृत्यु के बाद उनके बच्चे अक्सर हॉस्टल में ही पीला है. वे भी हमेशा टूर पर ही बने रहे. दो साल पहले लड़के की शादी हुई है. तब से घर कुछ आकार ग्रहण करने लगा है. हॉस्टल में रहने के कारण मीतू काफी कुछ सीखने से वंचित रह गई है. वे डर रहे थे, पर ध्रुव ने उन्हें आश्वस्त किया है कि माँ बहुत सहनशील और स्नेहमयी है, वे उसे अपने अनुसार ढाल लेगी.

 

उत्तर में ध्रुव के पापा ने भी उन्हें आश्वस्त किया. कहा कि हम लोग इतने दकियानूसी नहीं है कि एक आर्किटेक्ट लड़की में सोलहवी सदी की बहु तलाशे.

 

इस प्रकार बहुत ही सौजन्यपूर्ण वातावरण में परिचय का पहला और समाप्त हुआ. फिर धूमधाम से सगाई हुई

एक सूची मैंने ध्रुव को पकड़ाई थी. सूची क्या थी, होनेवाली बहू के लिए पूरी आचारसंहिता थी.

मीता अब शादी के बाद ही इस घर में आएगी.

भविष्य में वह बाल नहीं कटवाएगी.

हाथ में चूड़ियाँ डालने की आदत डालेगी.

शादी में सिर ढकेगी.

घर में मेहमान रहेंगे तब तक साडी पहनेगी.

लोगो के सामने ध्रुव को नाम लेकर नहीं पुकारेगी.

खूब लम्बी सूचि थी. बारीक से बारीक जो भी बात याद आती गई, जोड़ दी थी. शिव ने तो उसका नाम बीससूत्री कार्यक्रम रख दिया था. आते जाते ध्रुव को छेड़ देता, दादा भाई भाभी को कितने सूत्र रटा दिए? कभी कहता, भाभी से कहना, फस्ट डिवीजन आने से भी चलेगा, पर कम से कम पास होने लायक नंबर ही आने ही चाहिए.

 

यह छेड़छाड़ सिर्फ मजाक के तौर पर नही होती थी. इसमें एक अव्यक्त आक्रोश भी था. माँ के कारण उन लोगो की छाप एकदम पुरातन पंथी हो गई थी. ध्रुव मुहँ से तो कुछ नहीं कहता था, पर शिव के छेड़ने पर उदास जैसी हँसी हँस देता, उससे यह स्पष्ट हो जाता था.

 

आखिर एक दिन मैंने कह ही दिया, देखो शिव ये मजाक उड़ाने वाली बात नहीं है. ये मत सोचो कि मैं अपने लिए कुछ कर रही हूँ. मेरी तो बस यही इच्छा है कि नई बहू की आते ही आलोचना न शुरू हो जाए आखिर मेरी भी तो वह कुछ लगती है और तुम तो जानते हो शादियों में कुछ लोग आते ही इसी मकसद से है कि नुक्स निकाले और आलोचना शुरू कर दे. बच्चे इसके बाद चुप हो गए थे.

 

वैसे मैंने एकदम गलत भी नहीं कहा था. शादी में सचमुच कुछ लोग मीनमेख निकालने के लिए ही आते है. नयी नवेली दुल्हनो को सबसे ज्यादा आलोचना झेलनी पड़ती है. झूठ क्यों बोलूँ खुद ही मैं कई बार इस अभियान में सम्मिलित हुई हूँ दोनों और के परिवारों में अब तक जितनी बहुए आई है. सबके लिए मेरे पास कहने के लिए कुछ न कुछ है. सुरेश की बहु रसोई तक में चप्पले पहनकर घुमती है. महेश की बहू ९ बजे से पहले बिस्तर नहीं छोडती राजन की बहू रसोई में झाँकती तक नहीं. आलोक की बहू २४ घंटे उसके नाम का जाप करती रहती है. जेठ ससुर तक का उसे होश नहीं रहता. निखिल की बहू तो और भी तीसमारखा है. जहाँ पति को चार लोगो के बीच हसते बोलते देखेगी, बच्चे को लद्द से लाकर गौद में पटक देगी.

 

ये सारे नमूने मेरी आखों के सामने थे, इसलिए मन में एक आदर्श बहू की कल्पना थी. सोचा था कि ध्रुव के लिए जो लड़की लाऊँगी वह इन सबसे अलग होगी. पर अपना सोचा सब कहाँ हो पाता है. तुम्हारी सारी शर्तो का पालन करेगी तब तो तुम्हे वह अच्छी लगेगी. ध्रुव ने एक दिन गले में बाहें डालकर बड़ी आशा से पूछा था तब वही सोचकर संतोष कर लिया था कि लड़का आज भी मुझे कितना चाहता है. आसपास के वातावरण को देखते हुए यह भी कम न था. शादी हुई और खूब धूमधाम से हुई.

 

धर की पहली शादी थी. अनगिनत मेहमान आये थे. उनमे से कइयो को निराश लौटना पड़ा. टिका टिप्पणी का एक भी मौका हाथ नहीं लगा. मैं खुद बहुत डरी हुई थी. एक तो लड़की की माँ नहीं थी. कर्ता धर्ता बड़ी बहन थी, जो अमेरिका ने ही बस गई थी. पति पत्नी दोनों डॉक्टर थे. भैया भाभी तो अभी नए ही थे. पर स्वागत सत्कार में, खान पान ने कही कोई त्रुटी या अव्यवस्था नहीं हो पाई थी. मीता के पापा तो बिछे जा रहे थे, पर बहन बहनोई भैया भाभी, चाचा ताऊ सभी सौजन्य और विनम्रता की मूर्ति बने हुए थे. और जयमाला के समय जब मीता को देखा तो बस आखे जुड़ा गई. अपना यह रूप लावण्य इतने दिनों तक उसने कहाँ छिपा रखा था. लाल, सुर्ख बनारसी साडी में लिपटी वह किसी सलोनी गुडियां सी लग रही थी. अंतरजातीय विवाह को लेकर एक शूल था मन में, वह भी जाता रहा. इसी बात को लेकर नन्दरानी कोंचती रही है.

 

अब सर उठा के सबके सामने कह सकूंगी, भाई हमने तो लड़की का रूप गुण देखा, विद्या बुद्धि देखि और घर परिवार देखा. बस जात पात को आजकल पूछता की कौन है? आठ दस दिन घर में मेला सा लगा रहा. मीता जितने दो चार दिन रही, ननदों के बीच दबी ढकी बैठी रही. उनके बच्चो का लाड़ दुलार करती रही. रिश्ते की सास और जेठानियों की मान मनुहार करती रही. सभी लोग प्रसन्न थे और जाते समय हर कोई मुझे बधाई देता हुआ गया. शादी के बाद दोनों ८ से १० दिन के लिए मसूरी घूमने चले गए थे. उनके लौटने तक मैंने सविता को रोक लिया था. सोचा, ननद भौजाई थोड़े दिन साथ रह लेगी.

दूसरे दिन सुबह-सुबह मैं रसोई में व्यस्त थी कि सविता पास आकर फुसफुसाई माँ, बहूरानी को तो देखो. बड़े बड़े पीले फूलोवाली मैक्सी पहनकर वह मेज लगा रही है. मैं और सविता दोनों एक दूसरे का मुहँ ताक रहे थे. इस बात को कौन उठाये, और कैसे? मैं तो आजकल लड़कों से खौफ खाने लगी थी. पर सविता तो उन दोनों को घास नहीं डालती थी. दनदनाती हुई बाहर चली गई और बोली मितारानी आज ये कौन सी पौशाक निकाल ली?

घर की ड्रेस है दीदी! फिर सविता की प्रश्नार्थक दृष्टी को समझते हुए बोली, माँ का आर्डर था कि मेहमानों के सामने साडी पहननी होगी. इसलिए इतने दिन पहनती रही. पर इतना बंधा बंधा लगता है उसमे तो हमें मेहमानों में नहीं गिनती तुम?

आप तो घर की है दीदी है अपनी और कोई वक्त होता तो मैं इसी बात पर निहाल हो जाती, पर इस समय समस्या जरा नाजुक थी. मैंने आगे बढ़कर कहा, बेटे घर में जब तक कोई आ निकलता है और लोग अक्सर तुम्हे देखने के लिए ही आते है. पर माँ साड़ी पहनकर जरा भी आराम दायक नहीं लगता. काम तो कर ही नहीं सकती मैं. बस गुड़िया की तरह बैठे रहना पड़ता है. तो अभी तुम्हारे गुड़िया की तरह सजने सवरने के ही दिन है. काम करने की तो जिन्दगी पड़ी है. और अभी तो मैं बैठी हूँ.

ठीक है लेकिन माँ ऑफिस में तो साड़ी पहनकर जाना जरुरी नहीं है न? मुझसे तो गाड़ी चलाते न बनेगी. गाड़ी का मतलब लूना. ये भी एक शूल था मन में, शादी के सामान के साथ लूना देखकर मेरी भाभी फिर से हंस दी थी. वाह ध्रुवजी सीधेपन की हद कर दी आपने. आजकल बजाज सुपर से नीचे कोई बात नहीं करता. आज कम से कम.

मामाजी ध्रुव बात काटकर बोला, यह मेरी नहीं, मीता की गाडी है. मेरे पास तो अपनी प्रिया है. मीता ने पापा से कहा था कि जेवर चाहे न दे पर एक गाडी जरुर दे. यानी सब कुछ अपने आप ही तय हो गया था. मन इतना खट्टा हो गया था. स्कूटर ही ले लेते तो क्या हो जाता प्रिया शिव के काम आ जाती. स्कूटर पर तो दोनों जा सकते थे. तब यह पहनने ओढ़ने का झंझट भी न खड़ा होता है. दफ्तर सलवार कमीज पहनकर जाया करना, मैंने फैसला सुना दिया. लेकिन बहु घर में आती है तो समस्या सिर्फ पहनने ओढने की ही तो नहीं रहती.

उसका घर भर में उन्मुक्त होकर घूमना खिलखिलाना, दिन भर ध्रुव डार्लिंग की रट लगाना, शिव से छीना छपती करना, भूख लगने पर नाश्ते के डिब्बे टटोलना, बात-बात पर गले में झूल जाना सब कुछ आखों में खटकने लगता.

बच्चों के पापा तक को तो उसने नहीं बक्शा था. सुबह वे अखबार पढ़ते तो उनकी कुर्सी के हत्थे पर बैठकर ही पूरा अखबार पढ़ जाती. घर में रहती तब तक उनके आस पास मंडराया करती, पापा का जाप किये जाती. उन्हें इस तरह करके खाना खिलाती, दवाई समय पर न लेने के लिए डांटती. शाम को लौटती तो चाय तो प्याला हाथ में लेकर सीधे बगिया में पहुँच जाती और छोटे से पीढ़े पर बैठकर उनसे बतियाती रहती. उस समय तो सचमुच मेरा खून जल जाता. घर में तो जो चल रहा था, ठीक ही था. बाहर उसका प्रदर्शन करने की क्या जरूरत थी? आसपास के घरों में कोई जोड़ी आँखे उस समय खिडकियों पर टंग जाती थी.

हैरत तो यह थी कि बच्चो को, उनके पापा को, यह सब सहज स्वाभाविक लगता था. उनके माथे पर शिकन तक नहीं आती थी. उस दिन तो हद ही हो गई. रोज की तरह हम लोग दोपहर की चाय ले रहे थे कि मीता आंधी की तरह घर में घुस आई. अरे आज इतनी जल्दी. पहले आप लोग आँखे बंद कीजिये. प्लीज बात क्या है? पहले आँखे बंद. और हमारे पलक झपकाते ही उसने दोनों के गले में एक एक फूलमाता दाल दी और तालियाँ बजाते हुए किलकने लगी, मैनी-मैनी हैप्पी रिटर्न्स ऑफ़ थे डे. ये ख़ुशी का दिन आपके जीवन में बार – बार आये.

अरे बात क्या है मैंने कहना चाहा और एकदम मुझे याद आ गया आज १२ दिसम्बर थी, हमारी शादी की सालगिरह. दूसरी-दूसरी बातों में इतनी खो गई थी कि इसकी याद ही न आई थी. मेरा चेहरा देखते ही वह मेरे गले में झूल गई. पकड़ी गई न. आप लोगो ने सोचा होगा, चुप्पी लगा जायेंगे तो सही में छुट जायेंगे. ऐसा नहीं होगा. पापाजी ३ से ४ कड़कते नोट तैयार रखिये. हम लोगो की नीयत आज अच्छी नहीं है. तुम्हे कैसे पता चला बेटे. हमें तो याद ही नही रहा था. इन्होने गदगद होए हुए पूछा. लंच के समय ध्रुव की डायरी उलट पलट रही थी. तब नजर पड़ी. उसकी तो ऐसी खबर ली है मैंने इतनी महत्वपूर्ण बात भूल गया.

ध्रुव है कहाँ मैंने पूछा, शिव को लाने कालेज गया है. हमने तड़ी मारी है तो उसे पढ़ने थोड़े ही देंगे. आज तो हंगामा होगा. थोड़ी देर में वे दोनों भी आ गए. फिर तीनो में मिलकर हम दोनों की आरती उतारी, पैर छुए और उपहार भी दिए. मेरे लिए सुंदर रेशमी साड़ी और पापा के लिए स्वेटर. उसी समय दोनों चीजो का उद्घाटन करना पड़ा. कैमरे से घर पर रंगीन तस्वीरे खीची गई.

फिर सब लोग फेमस स्टूडियो गए. वहाँ एक ग्रुप फोटो हुआ. उस फोटो के लिए मीठा पारम्परिक बहू की वेशभूषा में सजी थी और मेरे पीछे खूब अच्छे से सिर ढककर खड़ी थी. शिव बार-बार उसे छेड़ रहा था. फस्ट शो हम लोगो ने अंगूर देखि. फिर ब्लू डाईमंड में खाना खाया. क्वालिटी में आइसक्रीम और बनारसी पानवाले के यहाँ का पान खाकर घर लौटे तो रात के ग्यारह बज रहे थे. बेहद थक गई थी मैं, पर यह थकान भी कितनी मीठी थी.

बार रे थक गई मैं तो इन लोगो ने सचमुच एक हंगामा कर डाला. अब इतनी उछल कूद के लायक थोड़े ही रह गए है हम रात मैंने हँसते हुए कहा. पर देखा ये चुप है और आग्नेय दृष्टी से मुझे घुर रहे है. क्या हुआ? मैंने घबराकर पूछा.

वह लड़की बेचारी माँ-माँ कहकर मरी जाती है, और तुम? क्यों, मैंने क्या किया है? अपने आप से पूछो कि तुमने क्या नहीं किया है. वह बेचारी बिना माँ की लड़की. बिना माँ की है तो मैं क्या करूं यह तो बताइए गोद में लेकर घूमू या लोरी गाकर सुनाऊ? उन्होंने जवाब नहीं दिया और करवट बदलकर लेट गए. इतना गुस्सा आया. यह अच्छा तरीका है, जवाब देते न बने तो बात ही ख़त्म कर दो.

अजीब मुसीबत है, मैं बुदबुदाई दिनभर घर में धींगामुश्ती चलती रहती है. छोटे बड़े का भी लिहाज नहीं रखा जाता. फिर भी मैं कुछ कहती. चुपचाप देखती रहती हूँ फिर भी मुझे चैन नहीं है. पराई लड़की पर तो लोगो को इतनी ममता हो जाती है. साल छ: महीने में अपनी जाई घर आती है, उसका तो कभी ऐसा लाड-दुलार नहीं किया. वे एकदम पलटे उसका लाड दुलार क्या खाक करूँगा? वह तो तुम्हारे अनुशासन में पली हुई बिटिया है. आज तक कभी खुलकर बात भी की है उसने मुझसे?

अब चुप रहने की बारी मेरी थी. जनवरी के प्रथम सप्ताह में ध्रुव को अचानक छ: महीने के प्रशिक्षण के लिए जर्मनी जाने का आदेश मिला. घर में एक ख़ुशी की लहर दौड़ गई. कितने सारे लोगो ने सिर्फ उसी का चयन हुआ था. गर्व से हम लोगो के कलेजे गज गज भर के हो गए थे.

जोर शोर से तैयारियाँ शुरू हो गई और मेरा दिल बैठने लगा. लड़का पहली बार इतनी दूर, परदेश में जा रहा था. आप फिर नयी नवेली बहू को पीछे छोड़कर जा रहा था. मीतू को भी क्यों नहीं ले जाते? घूम आएगी. इन्होने कहा था. लेकिन मीता ने इस प्रस्ताव का विरोध किया. वह बोली बेकार रूपये फेकने से क्या फायदा पापाजी ध्रुव का खर्च तो कम्पनी देगी. मेरा तो हम लोगो को ही उठाना पड़ेगा. कभी अपना भी चांस आएगा. है न शिव?

वह हमेशा की तरह हंसमुख बने रहने का भरसक प्रयास करती पर कभी कभी उसका चेहरा बेहद उदास हो आता. स्वाभाविक भी था. पर मुझे चिंता हो चली थी. आखिर मैंने एक दिन ध्रुव से कहा. बेटे तुम्हारे लौट आने तक मीता अपने पापा के यहाँ रहे तो कैसा है?

कहीं भी रह लेगी माँ. छ: महीने की तो बात है. पलक झपकते बीत जायेंगे. और सब कुछ ठीक ठाक रहा तो लौटते समय पन्द्रह बीस दिन के लिए उसे बुला लूँगा. घूम घाम लेंगे.

उसने तो बात समाप्त कर दी थी. पर मेरी चिंता वैसी की वैसी बनी हुई थी. बच्चो के पापा का स्वास्थ्य इन दिनों कुछ ठीक नहीं था. वह वहाँ उदास बनी रहेगी तो उसका सम्बन्ध सीधे मुझसे जोड़ देंगे. इसलिए डर लग रहा था.

शिव और मीता उसे छोड़ने बम्बई तक गए थे. लौटकर मीता अपने पापा के यहाँ चली गई. उसकी भाभी के यहाँ लड़का हुआ था. फिर महीने भर बाद भाभी अपने पीहर चली गई तो उसने घर की देखभाल के लिए वहाँ रह जाना चाहा तो हमने कोई आपत्ति नहीं की.

घर एकदम सुनसान हो गया था. बच्चो के पापा ध्रुव से ज्यादा मीता को याद कर रहे थे. हर चौथे आठवे दिन समधियाने पहुँच जाते. कभी घसीटकर साथ मुझे भी ले जाते. तब समधीजी चुटकी लेते. अपने बच्चों के लिए कैसे दौड़ दौड़कर आ जाते है आप मुझ गरीब की तो कभी सुध भी न ली.

शिव भी अक्सर देर से घर लौटना कभी भाभी के साथ खरीददारी करनी होती थी या कभी उन्हें फिल्म दिखानी होती थी. कभी कभार वह भी घर पर आ जाती, पर पहले का सा तूफ़ान बरपा नहीं करती. हँसती खिलखिलाती पर उसमे पहले की सी जीवतता नहीं थी. जब वह चली जाती तो यह कहते, कहा था, साथ चली जाओ. तब नहीं मानी पैसे का मुहँ देखती रही. अब मन ही मन घुल रही है.

मार्च का अंतिम सप्ताह रहा होगा. एक रात इनके पेट में जोर का दर्द उठा. पता नही कितनी देर से तड़प रहे थे. मेरी तो अचानक नींद खुली तो देखा पेट पकडे बैठे है. चेहरा सफ़ेद पड़ गया है. क्या हुआ? मैंने घबराकर पूछा, क्या पेट दर्द कर रहा है?

उन्होंने जवाब नही दिया. मैं उठी पानी गरम किया. रुई में हिंग की डली लपेटकर उसे जलाया. फिर प्लेट में अजवायन, काला नमक, हिंग और गरम पानी लेकर इनके पास आई. वे मना करते रहे, पर जब मैं बार बार आग्रह करने लगी तो चिढ़कर बोले, जरा बात तो समझा करों. वैसा दर्द नहीं है भाई.

फिर कैसा है? शिव की परीक्षा चल रही थी पढ़कर शायद अभी-अभी सोया था, पर उसे जगाना पड़ा. उतनी रात जाकर वह डॉ, शुक्ला को ले आया. उन्होंने मुआयना किया और पूछा. ये तकलीफ कब से है आपको? जी १५ से २० दिन से थोडा कष्ट हो रहा था.

इतना ताव आया मुझे. इतने दिनों तक चुप बने रहने में क्या तुक थी. शिव बोला, माँ यह समय गुस्सा करने का नही है. बाद में निपट लेना. पहले उन्हें सम्भालो. राम राम करके वह रात बीती. सुबह भर्ती होना ही पड़ा. ओपरेशन जरुरी था. इन्होने पहले ही अपने आदेश सुना दिए.

प्राइवेट नर्सिंग होम नहीं जायेंगे, सरकारी अस्पताल में भी प्राइवेट वार्ड नहीं लेते. जनरल में रहेंगे. इस ओपरेशन के बाद नर्सिगं की बहुत जरूरत होती है. प्राइवेट वार्ड में कोई झांकता भी नहीं. दस बुलाने जाना पड़ता है.

उनकी बात न मानने का कोई उपाय नही था. खजाने की चाबी उन्ही के पास थी. ध्रुव यहीं होता तो बात दूसरी थी, पर अब उतनी दूर से उसे बुलाने का कोई मतलब भी न था.

जनरल वार्ड में जो एक रात गुजारी है, उफ़ ये जिंदगी भर याद रहेगी. इनकी वैसी हालत में नींद आने का कोई प्रश्न नहीं था. पर आसपास के वातावरण ने मन को इतना बोझिल कर दिया कि सुबह उठकर लगा, मैं ही बीमार हूँ. और दुर्गन्ध अब भी याद आती है तो मन पर काटे से उग आते है. सुबह शिव कही से चाय लाया था मेरे लिए पर घुट भर भी गले से नहीं उतरी. दस बजे ओपरेशन होने को था. ९ बजे ही इन्हें स्ट्रेचर पर डालकर ले गए.

मैं और शिव भी पीछे-पीछे चल पड़े. जहाँ तक जाने दिया वहाँ तक गए. फिर मैं वही बैठकर इष्टदेव का जाप करने लगी. शिव बेचारा दौड़ धूप में व्यस्त हो गया.

नमस्ते बहिनजी, मैंने चौककर देखा मीता के पापा थे.

आपने तो खबर भी भी नहीं की. इतने बेगाने हो गए है हम लोग उनके स्वर में आक्रोश था, शिकायत थी. मैं क्या जवाब देती. वो तो मीतू अभी किसी काम से घर गई थी, तब पडोसी मेहता साहब ने बताया. सब कुछ इतना अचानक हो गया, मैंने अपराधी स्वर में कहा, शिव बेचारा एकदम अकेला पड़ गया था.

सारी दौड़ भाग उसी के जिम्मे थी. यही तो मैं कह रहा हूँ. उसे अकेले सारी दौड़ भाग करने की क्या जरुरत थी. हम लोग किसलिए है? कल को ध्रुव सनेगा तो क्या कहेगा. मुझे तो अपनी चिंता हो गई थी. ध्रुव मुझसे क्या कहेगा? इन पर इतना ताव आ रहा था. दर्द से तड़प रहे थे, पर मजाल है जो बटुए की पकड़ जरा सी ढीली हो जाए. जनरल वार्ड ने रहेंगे. वहाँ नर्सिंग अच्छी होती है. अब इतने बड़े आदमी को उस नर्क में ले जाऊँगी तो कैसा लगेगा.

अपनी इस दुश्चिंता में यह पूछना भी याद न रहा कि मीता कहाँ है.

साढ़े ग्यारह बजे उन्हें ओपरेशन थियेटर के पास वाले कमरे में लाकर रखा गया. ऐसे हट्टे – कट्टे हँसते बोलते व्यक्ति को इस तरह असहाय में देखकर मेरी तो रुलाई फूट पड़ी. मीता के भाई नरेश मुझे सहारा देकर बाहर ले आये और वापस बेंच पर बिठा दिया. असहाय सी मैं वहाँ बैठी रही.

दो घंटे बाद उन्हें वार्ड में ले जाने की अनुमति मिली. ये दो घंटे मेरे लिए दो युग हो गए थे. वार्ड में वापसी के समय काफिला जरा बड़ा था. घर परिवार के लोग थे और स्टाफ के भी. ढेर सी शीशिया स्ट्रेचर के साथ चल रही थी और सब लोग उन्हें उठाये हुए थे.

माँ तुम सीढियों से आ जाओ, लिफ्ट में तुम्हे परेशानी होगी. शिव ने कहा तो मैं सीढियों की और मुड़ गई. हाफती-कापती ऊपर पहुँची तब तक स्ट्रेचर शायद वार्ड में पहुँच चूका था. क्योकि गलियारे में उसका कहीं पता नहीं था. मैं वार्ड तक पहुँची ही थी कि नरेशजी की आवाज आई, माँजी इधर आइये.

उनके पीछे चलती हुई मैं गलियारे के छौर तक पहुँची. सर्व सुविधायुक्त कमरे का दरवाजा खुला और खाली स्ट्रेचर थामे लोग बाहर निकले. यह कमरा, मैंने अस्फुट स्वर में कहा. भाभी ने आरक्षित करवाया है. मेरा असमंजस ताड़कर शिव पास आकर फुसफुसाया. ये उसके बस की ही बात थी जी, उसके पापा गर्व से बता रहे थे, अधीक्षक से जाकर भीड़ गई. खड़े-खड़े कमरे का आरक्षण करवा लिया. बहुत लड़ाकू है यह लड़की.

मैंने मीता की और देखा. वह चुपचाप इनके पलंग के पास खड़ी थी. घर पर तो तिनका भी नहीं उठती, नरेश बोले, यहाँ आई है, तब से सफाई में जुटी है. तीन बार तो घर के चक्कर लगा आई है. समधीजी ने स्नेहसिक्त स्वर ने कहा.

कमरा सचमुच धुला पूछा चमक रहा था. दोनों पलंगो पर घर की साफ़ चादरे और तकिये रखे हुए थे. मेज पर सफ़ेद मेजपोश था. अलमारी के कागज़ बिछे हुए थे.  उसमे मेरे और इनके कुछ कपडे तह कर रखे हुए थे. चाय, शक्कर प्याले, प्लेटें, माचिस कुछ भी नहीं भूली थी वह. स्नान घर में बाल्टी, मग, तौलिया, चौकी सब व्यवस्थित ढंग से सजा हुआ था.

थोड़ी देर में स्टोव की घर घराहट शुरु हुई. देखा मीता चाय बना रही थी. माँ चाय पी लीजिये. थौड़ी देर में वह मेरे सामने खड़ी थी. कमरे में आने के बाद से उसने पहली बार बात की थी और उसका स्वर अत्यंत सपाट था.

चाय यहाँ? मैंने एक बेमतलब सा जुमला उठाया. तो कहाँ पिएंगी. क्या पापा को इस हालत में छौड़कर आप घर जायेंगी? उसकी बात में तर्क था पर उससे भी ज्यादा वजनदार उसकी आवाज थी. मैनें चुपचाप प्याला होठों से लगा लिया. मेरे चाय लेते ही सबने जैसे राहत महसूस की, क्योकि सभी थके हुए थे.

बहुत बेमन से प्याला उठाया था मैंने पर सच कहूँ तो पीने के बाद जी एकदम हल्का हो गया. सुबह से सर भारी हो रहा था. यह भी थोडा उतर गया. ५ बजे के करीब उन्हें कुछ होश आया. मीता उनके पास ही बेठी हुई थी. उस देखकर उतनी पीड़ा में भी वे थोडा सा मुस्करा दिए.

तब मुझे अहसास हुआ कि सचमुच उनकी यन्त्रणा बहुत भीषण रही होगी. नहीं तो क्या ओपरेशन से पहले एक बार भी अपनी लाड़ली बहू को याद न करते? पापा, आप और भैया अब घर जाइए. मीता का फरमान छुटा. रात को मेरा और माँ खाना लेकर भैया आएगा. आप अब सुबह आइयेगा.

मैं फल फुल खा लूँगी. मैंने हल्का सा प्रतिवाद किया. आपके लिए पक्का खाना बन जायेगा. उसने मेरी और बिना देखे जवाब दिया. वैसे बहनजी चाहे तो हमारे साथ घर चलकर. पापा प्लीज उसने जैसे सारे विवाह को समाप्त करते हुए कहा और उन दोनों का जबरन घर रवाना किया फिर शिव के साथ बैठकर उसने सारे पर्चे पढ़े और फिर शिव को दवाईया लाने भेज दिया और खुद इनके पलंग के पास स्टूल खींचकर बैठ गई.

दुसरे पलंग पर मैं चुपचाप पड़ी रही. बोलने की शक्ति ही नहीं रह गई थी. दो रातो का जागरण था, थकान थी, तनाव था. कब झपकी लग गई. पता ही नहीं चला. मीता ने खाने के लिए जगाया, तब जाकर आँख खुली.

समधीजी से रहा नहीं गया होगा. खाना लेकर खुद आ गए थे. बदले में लाड़ो की फटकार भी सुननी पड़ी. वे शिव का भी खाना लाये थे, पर मीता ने उसे अस्पताल में खाने नहीं दिया.

तुम पापा के साथ घर जाओगे और सुबह परीक्षा के बाद ही यहाँ आओगे समझे? लेकिन भाभी यहाँ वह मिमियाना. यहाँ की चिंता मत करो. यहाँ मैं हूँ, माँ है, भैया है. शिव बहुत कुंकुनाया आखिर उसे जाना ही पड़ा. उन लोगो को छोड़ने के लिए नरेशजी नीचे तक गए. मीता ने उनसे मेरे लिए पान मंगवाया. पान के बिना आज पूरा दिन हो गया था. पर मुझे याद ही नही आई थी. पर पता नहीं कैसे मीता जान गई थी.

खाने के बाद उसने मेरा बिस्तर ठीक किया. फिर स्नान घर में जाकर सारी प्लेटे गिलास धो डाले. दूध एक बार फिर गरम किया और सोने की तयारी करने लगी. भैया बारह बजे तक मैं एक झपकी ले लूँ. फिर ड्यूटी पर आ जाउंगी फिर चाहे आप पूरी रात सौये रहना. उसने कहा और आराम कुर्सी में हाथ का तकिया बनाकर लेट गई.

नरेशजी पलंग के पास एक कुर्सी खींचकर बैठ गए. मेरे आराम में जरा भी विध्न न डालते हुए दौनो भाई बहन रात भर ड्यूटी निभाने को तत्पर थे. मुझे कैसा तो लगा. मीता मैंने स्नेह सिक्त स्वर ने आवाज दी, भैया आराम कुर्सी में लेट जायेंगे. तू इधर पलंग पर आ जाना दिन भर खड़ी की खड़ी है.

पता नहीं मेरी आवाज में कुछ था या उसने प्रतिवाद नहीं करना चाहा. वह चुपचाप मेरे पास आकर लेट गई. आप सोने लगे तो मुझे जगा लीजियेगा भैया. नरेशजी आराम कुर्सी पलंग के पास खिसकाकर उसमे लेट गए. कमरे में एक अजीब सी शांति छा गई.

मैंने मीता की और देखा. पता नहीं क्यों उसे देखकर मुझे सविता की याद हो आई. दो बच्चो की माँ हो गई है. अब भी कभी कभी उस पर बचपन सवार हो जाता है. माँ के पास लेटने का मोह हो आता है. उन क्षणों में वह एकदम नन्ही सी बच्ची बन जाती है. मेरे पास लेती यह नन्ही सी लड़की. इसका भी तो कभी कभी मन होता होगा. तब किसके आँचल में मुँह छुपाती होगी. बड़ी बहन है, वह सात समंदर पार इतनी दूर है. भाभी तो खुद ही लड़की है अभी.

वह मेरी और पीठ करके लेती थी निस्पंद. सलवार सूट उतारकर उसने नाईटी पहन ली थी. उसमें वह एकदम बच्ची सी लग रही थी. दिनभर किसी उग्र तेज से दपदप करता उसका चेहरा अब एकदम निरीह, निष्पाप शिशु का सा लग रहा था.

ममता का एक ज्वर सा उठा मन में. एकदम उसे अंक में भर लेने की.

इच्छा हुई. पर सन्कोंच में मैं बस उसकी पीठ पर बालो पर हाथ फेरती रही.

अचानक मेरी उंगलिया उसकी पलकों को छु गई. वे गीली थी. क्या हुआ बेटे? मैंने प्यार से पूछा. वह कुछ नहीं बोली. बस जैसे रुलाई रोकने के लिए होठ सख्ती से भींच लिए.

अपने पापाजी के लिए परेशान हो? पर डॉक्टर साहब तो कह रहे थे. वे एकदम ठीक है. ओपरेशन बहुत अच्छा हुआ है. बस एक दो दिन में उठकर बैठ जायेंगे. यही कह रहे थे न, कहते कहते मैं भी शंकाकुल हो उठी. वह एकदम पलटी कुछ क्षण मुझे देखती रही, फिर मेरी छाती में मुँह छुपाकर सुबकते हुए बोली, पहले यह बताइए आपने हमें खबर क्यों नही की? पापाजी इतने बीमार हो गए और किसी को मेरी याद भी न आई?

यही तो अपने आपको कटघरे में खड़ा करके मैं बार बार पूछ रही थी. मुझे उसकी याद क्यों नही आई? अपनी बेटिया को कैसे भूल गई थी मैं ?

 

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