मैथिलीशरण गुप्त जीवन परिचय

मैथिलीशरण गुप्त

मैथिलीशरण गुप्त का जन्म उत्तर प्रदेश के झाँसी जनपद के अंतर्गत चिरगांव के एक प्रतिष्ठित वैश्य परिवार में 13 अगस्त 1886 को हुआ था. इनके पिता सेठ रामचरण निष्ठावान राम भक्त तथा कवि थे. अत: गुप्तजी को कविता करने कि प्रेरणा अपने पिता से प्राप्त हुई. सरस्वती के सम्पादक आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के सम्पर्क में आकर इनकी काव्य प्रतिभा का समुचित विकास हुआ.




गुप्तजी ने महात्मा गांधी से प्रभावित होकर स्वाधीनता आन्दोलन में भाग लिया तथा कारावास का दंड भोगा. वे राष्ट्रपति द्वारा सन 1952 तथा 1957 में राज्यसभा के सदस्य मनोनीत किये गए. आगरा तथा प्रयाग विश्वविद्यालयो ने डी.लिट् कि मानद उपाधि से इन्हें सम्मानित किया. राष्ट्रपति ने पद्मभूषण से अलंकृत किया. संकेत, महाकाव्य पर इन्हें हिंदी साहित्य सम्मेलन ने मंगला प्रसाद पुरस्कार प्रदान किया. 12 दिसम्बर सन 1964 को गुप्तजी इस संसार का परित्याग कर चिर निद्रा में विलीन हो गए.

 

रचनाये

मैथिलीशरण गुप्त ने मौलिक तथा अनुदित चालीस ग्रन्थों की रचना की इनमे से प्रसिद्ध काव्य कृतियाँ है. साकेत, यशोधरा, द्वापर, पंचवटी, भारत – भारती, जयद्रथ वध सिद्धराज और विष्णुप्रिया. साकेत महाकाव्य तथा पंचवटी खंडकाव्य है.

 

भावपक्ष

मैथिलीशरण गुप्त के काव्य में मूल स्वर राष्ट्रीय सांस्कृतिक चेतना का है. भारत-भारती में प्राचीन भारतीय संस्कृति तथा सभ्यता के स्वर्णिम इतिहास की गौरव गाथा तथा वर्तमान दासता की दयनीयता दशा पर करुण क्रन्दन और भविष्य के प्रति उद्बोधन है.

 

हम कौन थे, क्या हो गये और क्या होंगे अभी

प्राचीन भारत के गौरव गान के साथ-साथ गुप्तजी ने अपने युग की नवीन विचार धाराओं को भी अपनाया. गुप्तजी ने अपने काव्य में भारतीय नारी के त्याग कि सराहना करते हुए उसकी दिन हीन दशा पर संवेदना व्यक्त की है. भारतीय जीवन का मार्मिक चित्र निम्न पंक्तियों में अंकित किया गया है.

 

अबला जीवन हाय तुम्हारी ये कहानी, आँचल में है दूध और आँखों में पानी

गुप्तजी के काव्य में प्रकृति का अनेक रूपों में चित्रण हुआ है. यह चित्रण मोहक और रमणीय है. पंचवटी खंडकाव्य की ये प्रारम्भिक पंक्तिया इस दृष्टी से दृष्टव्य है.

 

चारू चन्द्र की चंचल किरणें खेल रही है जल थल में, स्वच्छ चाँदनी बिछी हुई है, अवनि और अम्बर तल में.

गुप्तजी के काव्य में नवरसो का परिपाक मिलता है. मुख्य रूप से श्रृंगार, शांत, करुण और वीर रस की प्रधानता है.

 

कलापक्ष

गुप्तजी की काव्य भाषा खडी बोली है . इनकी भाषा सरल, सरस, सुव्यवस्थित और परिमार्जित है. भाषा में ओज तथा प्रसाद गुण का प्राधान्य है. गुप्तजी की भाषा कड़ी बोली का आदर्श और उन्नत रूप है. गुप्तजी की काव्य शैली में विभिन्न रूप प्रयुक्त है. उन्होंने प्रबंध काव्य, खंड काव्य गीति नाट्य तथा पद शैली में काव्य रचना की है. प्रबंध काव्य लिखने में गुप्तजी को विशेष सफलता प्राप्त हुई है.

मैथलीशरण गुप्त

मैथलीशरण गुप्त

गुप्तजी के काव्य में अलंकारों का सफल प्रयोग मिलता है. इन्होने परम्परागत उपमा, उत्प्रेक्षा, रूपक, विभावना, विषम आदि के साथ मानवीकरण आदि नवीन अलंकारो का भी प्रयोग किया है. छंद योजना की दृष्टी से गुप्तजी ने सभी प्रचलित मांत्रिक, वर्णवृत्त, तुकांत, अतुकांत छंदों का प्रयोग किया है.

साहित्य में स्थान मैथिलीशरण गुप्त भारतीय संस्कृति के अमर गायक व सामाजिक चेतना के प्रतिनिधि कवि है. इन्हें राष्ट्रकवि होने का गौरव प्राप्त है. वस्तुतः आधुनिक हिंदी कविता का भव्य उनके द्वारा राखी गई सुदृढ़ नीव पर खड़ा है.

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