विद्या निवास मिश्र परिचय


श्री विद्या निवास मिश्र के बारे में जीवन परिचय

विद्या निवास मिश्र जी का जन्म गौरख पुर जिले के पकड़ डीहा ग्राम में सन १९२६ में हुआ था. आपकी प्रारम्भिक शिक्षा मूलतः गाव में ही हुई. उच्च शिक्षा के लिए इलाहाबाद गए जहा से संस्कृत में एम्.ए किया . उसके बाद गौरखपुर विश्वविद्यालय में शोधकार्य किया और पी एच डी की उपाधि प्राप्त की. आपने कुछ समय के लिए उत्तर प्रदेश और विद्य प्रदेश के सूचना विभागों में काम किया बाद में अध्यापन कार्य करने लगे.

आप के एम मुंशी हिंदी तथा भाषा विज्ञान विद्यापीठ आगरा में निदेशक काशी विद्यापीठ और सम्पूर्णा नन्द संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति रहे. अमेरिका के बर्कले विश्वविद्यालय में भी अध्यापन कार्य किया.




विद्या निवास मिश्र

विद्या निवास मिश्र

आपकी रचना इस प्रकार है

निबंध संग्रह – चितवन की छाह कदम की फूली दाल, तुम चन्दन हम पानी, तमाल के झरोखे से, हल्दी, दूब और अक्षत, हिंदी की शब्द सम्पदा मैंने सिल पहुचाई आदि.

सम्पादन कार्य – विंध्य भूमि, पत्रिका तथा कुछ अन्य कृतिया.

कविता संग्रह – पानी की पुकार

मिश्र जी की भाषा परिमार्जित है. उसमे संस्कृत की सी समास बहुलता नहीं है. प्रचलित संस्कृत, उर्दू और अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग करके उन्होंने भाषा को सहज प्रवाह दिया है. देशज शब्दों का प्रयोग भी यत्र-तत्र मिल जाता है. किन्तु इस प्रकार के प्रयोगों से कही भी शिथिलता या अस्पष्टता नहीं आने पाई है.

मिश्र जी के निबंधो में शैलियों के विभिन्न रूप मिलते है. आपके निबंधो में विश्लेष्णात्मक, भावात्मक, विचारात्मक, व्याख्यात्मक, समीक्षात्मक आदि शैलियों को देखा जा सकता है.

उनकी भाषा शैली विविधतापूर्ण है. इसमें एक और तो संस्कृत बहुल शब्दावली की छटा है तो दूसरी और लोकभाषा की सरलता और ताजगी देखने को मिलती है. मिश्र जी के निबंध लालित्य पूर्ण है. श्रेष्ठ निबंधकार, भाषाविद और अध्यापक के रूप में मिश्र जी की हिंदी जगत में अपनी विशिष्ट पहचान रही है.

इनके निबंध में विभिन्न संस्मरणो एतिहासिक प्रसंगों तथा स्वानुभूति के आधार पर जननी और जन्मभूमि का महत्व प्रतिपादित किया है. हम स्वेच्छापूर्वक या अनिच्छापूर्वक किसी देश की नागरिकता ग्रहण कर सकते है, पर माँ और जन्म भूमि का स्वेच्छा वरण नहीं किया जा सकता है. इनका कोई विकल्प नहीं है. लेखक ने जहाँ पारम्परिक लोकगीत के द्वारा माँ के दूध को प्रतिष्ठित किया है, वही पौराणिक उद्धरणों के माध्यम से जन्मभूमि की महिमा का गान किया है.

लेखक ने उन प्रवासी भारतीयों की भावना को भी शब्द दिए है जो अपनी मात्रभूमि की गौद में जीवन व्यतीत करना चाहते है. यहाँ तक कि पुष्प भी अपनी मूक वाणी से यह कामना करता है कि उसे उस पथ डाल दिया जाए जिस पर मातृभूमि पर बलिदान होने वाले वीरों के पग पड़ें हो. निबंधकार अपने प्रस्तुतिकरण में जन्मभूमि को स्वर्ग से भी श्रेष्ठ निरुपित करने में सफल रहा है. लेखक के अनुसार मानवीय मूल्यों के रूप में स्थापित जन्मभूमि प्रेम, राष्ट्रीय भावना या देश प्रेम को क्षति नहीं पहुचाता बल्कि उसे और अधिक सुदृढ़ करता है. इससे व्यक्ति दुसरो की भावनाओ का आदर करना सीखता है.

 

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1 Response

  1. Saras says:

    Very nice very nice programs

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