शिक्षा में छात्रों का भाग

शिक्षा में छात्र केंद्र पर होना चाहिए, बाकी सब परिधि पर

जहाँ तक शिक्षा का प्रशन है, शिक्षा में विधार्थी केंद्र पर होगा चाहिए. बाकी सभी चीजे परिधि पर. विधार्थी केंद्र पर होना चाहिए, शिक्षक नहीं. बच्चो को केंद्र पर रखना होगा तथा माता पिता को परिधि पर. वर्तमान में सबसे बड़ा प्रशन यह है कि बच्चो को शिक्षित कैसे किया जाए? यह कोई साधारण प्रशन नही है. इस प्रश्न से ही यह सुनिश्चित होता है कि भारत का भविष्य कैसा होगा या फिर हम भारत का कैसा भविष्य चाहते है? इसके लिए बच्चो के प्रति मन में घर कर चुकी विकृत भावनाओं को निकलना होगा.




शिक्षा में

शिक्षा में

बच्चो को हम प्यार देते है, आनदं देते है, पर आदर नहीं देते, उनसे आदर हम मांगते है, उन्हें आदर देते नहीं और हम कही न कही अपने अंतर में यह भाव पैदा करते है कि वह हमसे हीन है और बच्चो के प्रति यह हीनभावना बच्चो को मानसिक रूप से विकृत कर देती है और फिर बड़ा होकर वह इस हीन भावना को प्रतिशोध लेता है.

तब हम सोचते है कि अरे यह क्या हो गया. फिर भी हम इस बीमारी का कारण हम खुद ही है. इस बीमारी का बीज बचपन में ही बो दिया जाता है. मेरी दृष्टि में बच्चा यदि बिगड़ता है, कुमार्गी, कुसंस्कृत या असभ्य हो जाता है तो यह निश्चित है कि उसके माता पिता या गुरु से कही कोई त्रुटी हुई है. यह विषय इतना संगीन इतना गम्भीर है कि बच्चे के गर्भ से ही उसको संस्कारित करना शुरु कर देना चाहिए.

 

बच्चो के प्रति किया गया अनादर और अपमान अंत: वृध्दों के प्रति किये जाने वाले अपमान और अनादर का कारण बनता है. यह बात छोटी सी है, पर बहुत गहरी है. पुरानी शिक्षा और नई शिक्षा में इतनी क्रांतियाँ हुई. पर इतनी सी बात किसी को समझ में नहीं आती. सम्मान सही अर्थो में प्रतिध्वनी है और सम्मान वही दे सकता है, जिसे सम्मान मिला हो. इसलिए पिता आदर योग्य है. माता तथा गुरु पूजा आदर योग्य नहीं है, पर जिससे यह तीनो आदर माँग रहे है? जो व्यक्ति एक बार हीनता की भावना से भर जाता है, ग्रसित हो जात्ता है, उसके पास दो ही रास्ते रह जाते है  एक या तो दूसरों को हीन बनाने में लग जाना. दूसरा या तो वह अपने आपको हीन मान लेना.

 

दोनों ही परिस्थितियाँ कष्टदायक है, इसलिए बच्चो को शिक्षित करने की पहली बात है कि हमने जो धारणा बना रखी है कि वह हमारा सम्मान करे, हम उससे पाएँ, इस धारणा को त्यागना होगा तथा इस प्रिपातिको बदलना होगा कि हमें बचपन में सम्मान नहीं मिला तो हम क्यों दे? बच्चा तो खाली हाथ आया था. उसे जो  कुछ भी आपने दिया वह आपका दिया हुआ ही लौटाएगा, अत: आपने उसे जो दिया है, उससे वही माँग सकते है, उससे ज्यादा माँगने का अधिकार नहीं है.

 

जहाँ तक शिक्षा का प्रश्न है, शिक्षा जगत में विद्यार्थी केंद्र पर होना चाहिए. बाकी सभी चीजे परिधि पर, विद्यार्थी केंद्र पर होना चाहिए, शिक्षक नहीं, बच्चो को केंद्र पर रखना होगा तथा माता पिता को परिधि पर. जीवन की वास्तविकता भी यही है कि उगता हुआ सूर्य केंद्र पर होता है, डूबता हुआ सूरज नहीं, पर हमने उगते सूर्य को महत्वपूर्ण नहीं समझा. हम उसे महत्वपूर्ण मानते है, जो डूब रहा है या डूब गया है. हम वृद्धो को केंद्र पर रखते है, मृतात्माओं को केंद्र पर रखते है, बच्चो को नहीं. पर समय बदल गया है राष्ट्र को विकसित बनाने के लिए छात्र केंद्र पर हो, यही आशा है.

 

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