शिक्षा स्मारक के बारे में जानिये

शिक्षा स्मारक

जिसका आकार (इ) हो, जिसका प्रकार शिक्षा हो, जिसके अन्तरंग एवं बहिरंग दोनों में समाहित हो सच्ची सर्वागिंक शिक्षा स्मारक ऐसा विद्या मंदिर तिलोकचन्द्र जैन उ.माँ.वि. इंदौर यथा नाम तथा गुण को आज भी सार्थक कर रहा है. इस विद्यालय की अपनी कुछ गौरवशाली एवं आदर्शमयी परम्परावादी मान्यताएं है. जिनके कारण यह आज उन्नति के शिखर पर आरूढ़ है.




शिक्षा स्मारक के बारे में जानिये

शिक्षा स्मारक के बारे में जानिये

विद्यालय की शताब्दी इस बात की घोतक है कि इसने शिक्षा के क्षेत्र में अप्रतिम उन्नति की है. इसका अनुशासन शिक्षा का ही पर्याय बनकर रहा है. यह शेक्षणिक परिणामों की दुनिया में अन्य विद्यालयों (शिक्षा स्मारक) से अग्रणी रहा है. उतार चढ़ाव के बीच कभी असमंजस की स्थिति में नहीं रहा दृढ़ता पूर्वक बढ़ते हुए आयामों की और ही अग्रसर रहा है.

 

हमें इस विद्यालय की विशेषताओं को समझना होगा, जिसके कारण यह शिक्षा स्मारक की सार्थकता को प्रकट करता है.

यह एक ऐसा विद्या का केंद्र है, जिसका प्रत्येक परमाणु चारित्र चक्रवर्ती आचार्य शान्तिसागर महाराज के चारित्रिक गुणों से निर्मित है. यहाँ पर किसी भी शिक्षक एवं विद्यार्थी को किसी भी प्रकार के व्यसन की लत नहीं है. न कोई पान तम्बाखू खाता है, न कोई बीड़ी सिगरेट पीता है. मैंने मेरे ४० वर्षों के जीवन काल में किसी को भी विद्यालय परिसर में व्यसन करते हुए नहीं देखा. इसका कारण है सदाचरण एवं नेतिकता की शिक्षा.

 

तिलोकचन्द्र जैन उ.माँ. विद्यालय में मात्र परीक्षोप्योगी शिक्षण नहीं दिया जाता है. यहाँ छात्रों के सम्पूर्ण मानसिक, बोद्धिक एवं शारीरिक विकास की और ध्यान दिया जाता है. तदनुसार पाठ्यकर्म निर्मित किया जाता है. यहाँ लोकिक शिक्षा के साथ-साथ नैतिक शिक्षा को अनिवार्य रूप से समाहित किया गया है. व्यावहारिक एवं तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में इस विद्यालय ने काफी ख्याति अर्जित की है. आज देश में ही नहीं, विदेशों में भी यहाँ से शिक्षा प्राप्त व्यवसायी, इंजीनियर्स, डॉक्टर्स, एडवोकेट्स, चार्टर्ड एकाउंटेंट फैले हुए है. इसका प्रत्यक्षीकरण भूतपूर्व छात्रसंघ के प्रतिवर्ष मिलन समारोह में किया जा सकता है.

 

पूर्ण अनुशासित शिक्षा स्मारक

वर्तमान में बढती हुई उच्छखलताओ, उद्न्द्ताओं, उन्मुक्ताओं के बीच इस विद्यालय ने कभी अपनी अनुशासनहीनता को व्यक्त नहीं किया. यहाँ के विधार्थियों ने कभी असामाजिक एवं विघटनकारी तत्वों का साथ नहीं दिया कभी भी अनेतिकता एवं साम्प्रदायिकता के पोषक तत्वों को प्रोत्साहन नहीं दिया. विद्यालय का सदैव सामजिक एवं राष्ट्रीय उत्थान में सहयोगात्मक रवैया रहा है. उसी का यह परिणाम निकला कि यहाँ के हो प्राचार्यो एवं एक भूतपूर्व शिक्षक को राष्ट्रपति सम्मान प्राप्त हुआ. शायद प्रदेश का ही नहीं, देश का यह अपने ढंग का एकमात्र विद्यालय है.

 

भारतीय संस्कृति का रक्षक शिक्षा स्मारक

विद्यालय में विभिन्न जाति, विभिन्न सम्प्रदाय, विभिन्न संस्कृतियों का पालन करने वाले छात्र अध्ययन करते है. सभी छात्र उसी प्रकार हिलमिलकर रहते है, जिस प्रकार दूध और पानी एक मेक होकर रहते है. कभी कोई जातीय विवाद नहीं, कभी कोई साम्प्रदायिकता भेदभाव नहीं. सभी भाईचारे समन्वय त्याग की भावना के साथ मिलकर “वसुधेव कुटुम्भ” की भावना से प्रेरित होकर अपने लक्ष्य की पूर्ति में अध्ययन में सलग्न रहते है.

 

मूलभूत सिधान्तो का संरक्षक शिक्षा स्मारक

अपनी स्थिति को अशुन्नं बनाये रखने के लिए कुछ महत्वपूर्ण सिधांत होते है. इस विद्यालय के भी अपने कुछ मूलभूत सिधांत है जिनका वह अक्षरश पालन करता चला आ रहा है. जैसे

छात्रो के प्रवेश में निर्धारित नियमों का पालन करना.

पाठ्य में नैतिक शिक्षा का समावेश.

अनुशासन (पालन-शिक्षक-विधार्थी) में लचीलापन नहीं.

परिस्थितियों के अनुसार सुधार करना.

पूर्वजों की धरोहर में परिवर्तन नहीं आदर्शों की सुरक्षा.

 

गुरु शिष्य की आत्मीयता शिक्षा स्मारक

यदि यह कहा जाये कि तिलोकचंद जैन उ.मा.वि एक प्राचीन गुरुकुल की भाति है, तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी. क्योकि इसका बाह्रा स्वरूप गुरुकुल जैसा ही है एवं आंतरिक भाव भी गुरुकुल जैसा ही है, यहाँ पर जितने भी शिक्षक (शताब्दी के दौरान) हुए है, वे सब सदाचारी गुणवान, निस्पृही, विचारशील, सुसंस्कारित हुए है. उन्होंने हमेशा छात्रों के साथ स्नेह एवं आत्मीयता का भाव रखा तथा उनकी उन्नति की कामना की. रविन्द्रनाथ टैगोर के शब्दों में सच्चा गुरु वही है, जो शिष्य के धरातल को समझे और उसे उठाने का प्रयास करे.

 

उपयुक्त सभी विशेषताओं एवं सिधान्तो के कारण ही यह विद्यालय अपने १०० वर्ष पूर्ण कर सका है. भविष्य में भी इसकी कीर्ति दिग-दिगंत में फैलती रहे, ऐसी मंगल कामना है.

 

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