श्री कृष्ण गीता वचन


श्री कृष्ण गीता वचन

आपके लिए भगवान श्री कृष्ण के बारे में और उनके उपदेश से रिलेटेड सारी महत्वपूर्ण बातो को आपके लिए यहाँ पर उपलब्ध कराया गया है, श्री कृष्ण गीता वचन

तुम कल की इच्छा त्याग कर कर्तव्य का पालन करो, क्योकि फल की इच्छा त्याग कर कर्म करने वाला पुरुष मोक्ष को प्राप्त होता है.




 

श्री कृष्ण गीता वचन

श्री कृष्ण गीता वचन

अध्यात्म बुध्दि से तुम सब कर्मो को मुझमे अर्पण करके फलो की आसहा ममता को छोड़कर संग्राम करो, जो पुरुष क्षमा पूर्वक मेरे वचन पर दोष दृष्टी न करके मेरे इस मत के अनुसार आचरण करते है, वे लोग कर्म बंधन से अवश्य मुक्त हो जाते है.

 

है अर्जुन मनुष्य कैसे ब्रह्म को प्राप्त होता है, सो मुझसे सुनो शुद बुध्दि से होकर, धृति द्वारा इस मन को वश में लाकर शब्दादि विषयों को छोड़कर, राग द्वेष से रहित, एकांत में रहने वाली मिताहारी वाणी और मन को जितने वाला, नित्य ध्यान युक्त और वैराग्य वान, अहंकार, बल घमंड काम क्रोध तथा परिग्रह छोड़कर ममताहीन और शांत मनुष्य ब्रम्हांड के योग्य है.

 

है अर्जुन प्रत्येक प्राणी को उसके एक-एक कर्म का फल अवश्य ही किसी न किसी समय मिलता है.

 

है अर्जुन जो जिस भाव से मेरा पूजन करते है, मैं उनको वैसा ही फल देता हूँ

यदि सब प्राणियों से भी अधिक पाप करने वाले हो, तो ज्ञान रूपी नौका से पाप करने वाले हो, तो ज्ञान रूपी नौका से पाप रूपी समुद्र को पार कर जाओगे, क्योकि इस लौक में ज्ञान के समान पवित्र कुछ भी नहीं है.

 

है अर्जुन जो भक्त मेरे वाक्यों को दुसरो तक पहुंचाएगा, वह भक्त मेरा अत्यंत प्रिय है.

 

जो प्रिय प्रदार्थ पाकर प्रसन्न और अप्रिय प्रदार्थ को पाकर खिन्न नहीं होता है, ऐसी स्थिर बुध्दि वाले मोहरहित ब्र्हम्वेता को ब्रम्हा में स्थिर जानो.

 

आत्मा स्वयं ही अनन्त आनंद का महान समुद्र है.

 

जो मनुष्य सब प्रकार से मेरे मार्ग का अनुसरन करते है, अर्थात वह चाहे जिसकी सेवा करे, यह मेरी ही सेवा है.

 

है अर्जुन मनुष्य इस लोक में सकाम कर्मो के द्वारा किस शरीर के लिए भोग प्राप्त करना चाहता है, वह शरीर ही पराया, स्याल कुलों का भोजन और नाशवान है. कभी वह मिलता है तो कभी बिछुड़ जाता है. जब शरीर की यह दशा है, तब इससे अलग रहने वाले पुत्र, स्त्री, महल, धन, सम्पत्ति, राज्य – खजाने हाथी-घोड़े, मंत्री, नौकर चाकर, वृद्धजन और दूसरे अपने कहलाने वालों की बात ही क्या, ये तुच्छ विषय शरीर के साथ नष्ट हो जाते है.

 

है अर्जुन जो हर क्षण मुझमें ही मन लगाये रहते है, जिन मनुष्यों की वृद्धि स्थिर है, ज्ञान द्वारा जिनके समस्त पाप नष्ट हो गए है, वे इस संसार में पुन: जन्म नहीं लेते है और शीघ्र ही अल्प आयु से मुक्त हो जाते है.

 

इस संसार में या मनुष्य शरीर में जीव का सबसे बड़ा अर्थात एक मात्र परमर्श इतना ही है की वह भगवान श्री कृष्ण की अनन्य भक्ति प्राप्त करे, उस भक्ति का स्वरूप है, सर्वदा, सर्वत्र सब वस्तुओ में भगवान के दर्शन.

 

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1 Response

  1. santosh kumar says:

    Jai sri krishna

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