संयुक्त परिवार एक हिंदी कहानी Hindi Story


संयुक्त परिवार हिंदी कहानी के पात्रो का परिचय

संयुक्त परिवार  के इस पारिवारिक हिंदी कहानी के पात्र जगदीश – परिवार का मुखिया बड़ा भाई

इस पारिवारिक हिंदी कहानी की पात्र मालती – जगदीश की पत्नी

इस पारिवारिक हिंदी कहानी के पात्र प्रदीप – सबसे छोटा भाई




इस पारिवारिक हिंदी कहानी की पात्र सुमन – प्रदीप की बेटी

इस पारिवारिक हिंदी कहानी की पात्र रीता – मझले भाई विनय की पत्नी

संयुक्त परिवार Hindi Story

संयुक्त परिवार Hindi Story

संयुक्त परिवार  में प्रारम्भिक संगीत के बाद प्रभात का सूचना सूचक संगीत, उसी में से पहरुए की आवाज उठती है, दूर से पास आती हुई.

 

संयुक्त परिवार के पहरुआ – बाबूजी – जो दूर द्वार पर खड़े हुए है.

संयुक्त परिवार  के बाबूजी – पाच बज गए दूर जाता स्वर – बाबूजी स्वर मिटते ही विद्रोह के स्वर उठते है. वे स्वप्न के स्वर है, जैसे दूर देश से उठ रहे हो.

 

संयुक्त परिवार  का पहला स्वर – मैं अब किसी भी शर्त पर साथ नहीं रह सकता. नहीं-नहीं मैं गुलाम नहीं बन सकता. मुझे अपनी इच्छाओ का दमन करना पड़ता है, मुझे अपने मन को मारना पड़ता है.

 

संयुक्त परिवार का दूसरा स्वर – मेरे पति सबसे अधिक कमाते है. मेरे परिवार पर सबसे कम खर्च होता है. दुसरे मजे करते है. नहीं-नहीं मैं अब एक क्षण भी यहाँ नहीं रहूँगी.

 

संयुक्त परिवार का तीसरा स्वर – मैं भी न रहूँगा अधिक कमाने से क्या होता है, घर का सारा प्रबंध तो मैं ही करता हूँ, मैं न हूँ, तो सब तीन तेरह हो जाय. सम्भालो मैं चला.

 

संयुक्त परिवार का चौथा स्वर – वाह-वाह एक को कमाने का घमंड है, दुसरे को परिश्रम का, तीसरे को डाक्टरी का, पर यह कोई जानता कि यह घर मेरी सूझ बुझ मेरे प्रभाव के कारण चल रहा है. दूर-दूर तक मेरी पहुँच है. बड़े से बड़ा काम मैं देखते-देखते कर लेता हूँ.  ये स्वर तीव्र होते है तथा शीघ्रता से बोलते है.)

 

कि मैं इस संयुक्त परिवार मैं एक डॉक्टर हूँ मेरे पति बड़े बकील है, मैं प्रबंध करता हूँ, मैं प्रभावशाली हूँ, नहीं मैं साथ नहीं रहूँगा, नहीं, अभी, अभी नहीं, मैं के स्वर तीव्रता से उठते है..

 

संयुक्त परिवार के पारिवारिक हिंदी कहानी में जगदीश और मालती के बोल

जगदीश बहुत तीव्रता से बोला – बंद करो चुप हो जाओ, मैं एक को भी नहीं जाने दूँगा अभी नहीं जाने दूँगा, देखूँगा कैसे कोई घर से दूर जाता है. आखिर कैसे ?

 

मालती बोली – दूर से घबराये हुए आती है क्या बात है, क्या हुआ? पास आकर मालती बोली, क्या है जी, क्या हुआ?

 

जगदीश ने कहाँ – जागकर हैरानी से कौन मालो तुम

 

मालती – हाँ शायद आप सपना देख रहे थे. यह आपको क्या हुआ है रोज-रोज सपने क्यों देखते है? निश्वास कई महीने बीत गए अब उनके बारे में सोचने से क्या लाभ?

 

जगदीश – कुछ लाभ नहीं, सोचना भी नहीं चाहता. सोचता भी नहीं, पर कभी – कभी सपने आ ही जाते है.

 

मालती ने हंसकर कहाँ – यूँ ही आ जाते है. मैं कहती हूँ कब तक ठगते रहोगे अपने आप को? सपने का, सोचने से जैसे कोई सम्बंध ही नहीं है. जैसे बिना सोचे ही अपने आ जाते है, मैं पूछती हूँ….

 

जगदीश – क्रोध से मालती से बोला.

 

मालती – कितना भी कठोर बनने की कौशिश करो, कितना ही निर्मम बनो, पर मैं जानती हूँ.

 

जगदीश ने गुस्से में कहा – तुम क्या जानती हो ?

 

मालती – यही कि आपका दिल रोता है.

 

मालती – क्यों चुप हो गए?

 

जगदीश – इसलिए की दिल सचमुच रोता है, आज तो खास तौर पर रौता है.

 

मालती – आज खासतौर पर क्यों?

 

जगदीश ने धीरे से कहा – मालो, आज सपने में मैंने अपनी आवाज सुल ली. वह आवाज बड़ी डरावनी थी.

 

मालती अचम्भे से – अपनी आवाज डरावनी आवाज. मैं समझी नहीं कि आप क्या कहना चाहते है?

 

जगदीश – कहना चाहता हूँ कि अब तक मैं समझता था कि मेरे सब भाई अलग होना चाहते थे, परन्तु मैं नहीं चाहता था.

 

मालती – तो इसमें गलत क्या है?

 

जगदीश – नहीं-नहीं यह गलत है, झूठ है.

 

मालती – झूठ कैसे?

संयुक्त परिवार की नाते जगदीश ने कहा  – हाँ झूठ है बिलकुल झूठ अभी अभी सपने में मैंने अपनी आवाज सुनी – स्वप्न वाला आवाज वाह वाह एक को कमाने का घमंड है, दूसरे को परिश्रम करने का, तीसरे को डॉक्टरी का, पर यह कोई नहीं जानता कि यह घर मेरी सूझ-बुझ मेरे प्रभाव के कारण ही चल रहा है. दूर-दूर तक मेरी पहुँच है. बड़े से बड़ा काम मैं देखते-देखते करा लेता हूँ. नहीं, नहीं मैं भी साथ नही रहूँगा, मैं यह आवाज सुनी, यह आवाज मेरी है.

 

मालती – है तो इसमें झूठ क्या है? मैं बराबर कहती रही हूँ कि घर न कोरे धन से चलता है, न कोरे परिश्रम से घर चलता है, सूझ-बुझ से अक्ल से.

 

जगदीश – और वह सब  मुझ में है. और जोर से हँसता है, स्वार्थी सब स्वार्थी है, सब अपने गुण देखते है. सब अपना भला सोचते है. लेकिन एकदम जाने दो, जो हुआ अच्छा हुआ यही होना चाहिए था. आज के युग में कौन किसको बाँध कर रख सकता है? वह जमाने लद गए. जब एक का हुक्म चलता था. जब सब अपने मन को मारते थे.

 

मालती – अपना मन मारते नहीं थे, दूसरों का मन रखते थे. वे अपने लिए नहीं दूसरों के लिए, कुटुंब के लिए जीते थे. कुटुंब उनके लिए सब कुछ था. कुटुंब की आन उनकी आन थी.

 

जगदीश – आन वान जाने दो, बातों को जाने दो, जाकर अपनी रामायण पढो.

 

मालती – वह तो पढ़ चुकी.

 

जगदीश – कहाँ पढ़ी तुमने, आज तो आवाज ही नहीं आई.

 

मालती – आवाज अब किसे सुनाती? अपने लिए पढनी थी, मन में पढ़ ली, खाना भी बना लिया है.

 

जगदीश – क्या बात है, तुमने खाना भी बना दिया, और हंसकर कहा आज तुम्हारी तबियत तो ठीक है. देख लो कितना शोर रहता था, अब कितनी जल्दी काम निपट जाता है. कितना अच्छा है. सुमन का पुकारते हुए आना..

 

सुमन – ताउजी कहाँ हो आप?

 

जगदीश – हा बोलो सुमन क्या हुआ इतने सुबह

 

सुमन – ताउजी, मैं रामायण सुनूँगी.

 

मालती – अरे तू रामायण सुनने आई, इतनी दूर से? वाह री मेरी भक्तिन.

 

जगदीश – पगली, अरे आज तुझे क्या सूझी? सवेरे इतनी दूर भाग कर आई. एक रामायण मँगवा लेती.

 

सुमन – मैं तो रोज कहती थी, पर पापा ने लाकर नहीं दी, कहते थे, तू पढेगी रामायण, भाग यहाँ से….

 

जगदीश – और तुम वहां से भाग आई.

 

सुमन – मुझे भगा दिया. पापा बहुत बुरे है हमें कुछ नही लाकर देते. ताउजी मैं अब वहां नहीं जाउंगी.

 

जगदीश ने कहा – क्या तुम अब नहीं जाओगी?

 

सुमन – हाँ अब नहीं जाऊँगी.

 

मालती – पगली, चल तुझे रामायण सुनाऊ. नहीं जाएगी तो कहाँ रहेगी?

 

सुमन – यही रहूँगी. वहाँ नहीं जाऊँगी. तुमने मुझे क्यों निकला?

 

जगदीश ने कहा – अरे सुमन क्यों रोती हो, बेटी चुप होजा.

 

मातली ने भी कहा – चुप होजा बेटी…

 

सुमन – आपने मुझे क्यों निकाला? आखिर क्यों – मैं नहीं जाऊँगी. मैं पापा मम्मी के पास नहीं जाऊँगी?

 

जगदीश – अच्छा जा बेटी तू रामायण सुन, मैं तेरे बाप के पास जाता हूँ. वाह बच्चे को इस तरह डालते है. क्या समझा है उसने. समझ लिया कि अलग हो गए तो जैसे मैं मर गया. कोई बात है, अच्छा बेटी ये बताओ कोई बात है ?

 

प्रदीप ने कहा – भाई साहब कहाँ है आप?

 

जगदीश ने कहाँ – कौन है, अरे प्रदीप तुम यहाँ, मैं तो तुम्हारे ही पास आ रहा था.

 

प्रदीप ने पूछा – क्यों? आप क्यों जा रहे थे? क्या आप के पास भी चिट्ठी आई है.

 

जगदीश – मेरे पास किसी भी चिट्ठी नहीं आई. मेरे पास सुमन आई है, मैं कहता हूँ कि तुम लोगो ने समझा क्या है? तुम लोगो ने अलग होना चाहा, मैंने कोई आपत्ति नहीं की. तुम बच्चो को भी एक दूसरे का दुश्मन बना दो. मैं पूछता हूँ कि तुमने सुमन को क्यों मारा? यहाँ क्यों नहीं आने दिया?

 

इस पारिवारिक संयुक्त परिवार के अन्दर इतने में रामायण के पाठ की ध्वनि सुनाई देती है.

|| सरल सुभाय माय हित लाए,

अति हित मनहु राम हिरी आए.

भेटेउ बहुरि लखन लघु भाई.

सोकु सनेहु न हृदय समाई ||

 

प्रदीप – भाई साहब मैं क्या बताऊँ, आप उसे यही रख लीजिये वह आपके बिना नहीं रह सकती.

 

जगदीश ने कहा – और तुम्हे इस बात से दुःख होता है. तुम उसे लेने आये तो, तुमने समझा क्या है? ले जाओ अपनी बेटी को. अभी ले जाओ. सुमन इधर आओ.

 

प्रदीप – भाई साहब

 

मालती – क्या है, क्या कहते हो सुमन को, ओ प्रदीप है?  तुम सुमन को लेने आये हो शायद?

 

सुमन – मैं नही जाऊँगी मैं बिलकुल नहीं जाऊँगी. और वो अन्दर भाग जाती है.

 

प्रदीप – भाई साहब मेरी तो सुनते नहीं मैं सुमन को लेने नहीं आया. उसे आप ही रखे, मुझे ख़ुशी होगी. इन बच्चो की मांगो से तंग आ गया हूँ. मेरे पास पैसे कहाँ से है? पेट भरने लायक भी तो नहीं कमाता हूँ.

 

जगदीश – अच्छा जी, और जैसे मेरे यहाँ कुबेर का खजाना इकट्ठा है. मैं तो अपने आप ही रवि की पढाई का खर्च नहीं दे पाता. वाह, अशोक और विनय डॉक्टर और वकील क्या थे, समझाते थे, कि जैसे वे कमाते है, और हम खर्च करते है. अब जौड़ ले वे कारूँ का खजाना? मैं माँगने नहीं जाऊँगा.

 

प्रदीप – माँगना तो मैं भी नहीं चाहता भाई साहब, माँग भी तो किस मुँह से? अकड़कर गया था, पर खैर जाने दो उन बातो को. डॉक्टर भईया का पत्र आया है.

 

जगदीश – किसका विनय का पत्र आया है, तुम्हारे पास?

 

प्रदीप – जी हाँ मेरे पास आया है, पर है आपके लिए?

 

मालती – क्यों उन्हें सीधे लिखते शर्म आती थी, या अब ये इतने छोटे हो गए.

 

जगदीश – मालती तुम मत बोलो.

 

मालती – मैं क्यों न बोलू? सबसे पहले यही तो घर छौड़कर गया था डाक्टरी के जोश में इसी ने तो मेरी बगिया को उजाड़ा.

 

जगदीश – मालती तू मेरी दुखती रग को और न दुखा. उसका कोई अपराध नहीं है. आज के जमाने में लोग भेड़ बकरी नहीं है, उनके दिमाग है, वे सोचते है, समझते है. वे अपने पर निर्भर रहना चाहते है. दूसरों का सहारा लेना नहीं चाहते. हाँ प्रदीप, क्या लिखा है, विनय ने?

 

प्रदीप – उन्हें वजीफा मिल गया है.

 

जगदीश – वह तो मुझे मालूम है. तीन वर्ष के लिए वह अमेरिका जा रहा है.

 

मालती – हाँ, जरुरत पड़ी तो वह दो वर्ष और भी रह सकता है.

 

प्रदीप – भईया आप तो कहते है कि डॉक्टर भईया ने आपको कोई पत्र नहीं लिखा.

 

जगदीश – क्या तुम समझते ही कि वह लिखेगा, तभी मुझे पता लगेगा, वाह तुमने समझा क्या है? बता सकता हूँ उसने तुम्हे क्या लिखा है? उसने लिखा है कि वह अपनी बहु और बच्चों को यहाँ छोड़कर जाना चाहता है. नहीं लिखा.

 

प्रदीप – लिखा तो यही है.

 

जगदीश – लिखा तो यही है, उसे लिख दो कि वह निश्चिन्त होकर अमेरिका जाए. उसकी बहु और बच्चे मेरे पास रहेंगे.

 

प्रदीप – भईया

 

मालती – क्या कहते हो? विनय के बहु और बच्चे यहाँ रहेंगे?

 

जगदीश – और कहाँ रहेंगे तुम सोच में क्यों पड़ गए प्रदीप?

 

प्रदीप – जी नहीं लिख दूँगा.

 

जगदीश – पर तुम कहना चाहते हो कि तुम्हारा गुजारा भी नही चलता.

 

प्रदीप – भईया मैं क्या कहूँ, शर्म आती है.

 

जगदीश ने कहा – शर्म आती है, वाह शर्म भी क्या पुरुषो का आभूषण है? अरे पागल, यह बड़ा अच्छा अवसर है तीन वर्ष के लिए तू भी यहाँ आ जा. आखिर उनकी देखभाल तो कोई करेगा ही.

 

प्रदीप – भईया आप तो हँसी करते है.

 

जगदीश – सभी बड़े काम हँसी से आरम्भ होते है. लेकिन खैर, तू नहीं आना चाहता तो न आ, पर सुमन अब मेरे पास रहेगी. चाहता है तो प्रकाश को भी भेज दो. क्यों सुमन रहेगी न? अरे कहाँ गई, ओह रामायण सुन रही है.

 

तभी इस संयुक्त परिवार में रामायण का स्वर स्पष्ट होता है.

|| मालती – कहत सप्रेम नाइ महि माथा. भरत प्रनाम करत रघुनाथा.

उठे राम सुनी प्रेम अधीरा, कहूँ पट कहूँ निषंग धनुतीरा.

बरबस लिए उठाय उर, लाय कृपा निधान.

भरत राम की मिलनि लखि, बिसरे सबही अपान.

मिलन प्रीति किमि जाय बखानी, कवि कुल अगम करम मन बानी.

परम प्रेम पुरन दोउ भाई, मन बुधि चित्त अहमिति बिसराई. ||

 

जगदीश – रामायण मनुष्य की मर्यादाओ की मंजूषा. लेकिन आज रामायण का युग नहीं है. आज महाभारत का युग भी नहीं है. जब जड़ मर्यादाये तौडी गई थी. आज तो मर्यादाओ को फिर से पहचानना है.

 

इतने में संयुक्त परिवार की एक और सदस्य रीता का बहुत तेजी से प्रवेश होता है.

रीता – भाभीजी – भाभीजी

 

जगदीश – कौन?

 

प्रदीप – यह तो अशोक की बहू की आवाज है.

 

रीता – भाभीजी कहाँ है?

 

जगदीश – क्यों क्या बात है बहू? कैसे आई? तुम घबरा क्यों रही हो?

 

मालती – कौन, कौन घबरा रही है? रीता तुम क्या बात है?

 

रीता – भाभी परसों अनिल छत से गिर पड़ा था.

 

प्रदीप जगदीश – अनिल छत से गिर पड़ा? क्या कहती हो? अब तक बताया भी नहीं?

 

जगदीश – अरे बताओ न? अब उसका क्या हाल है?

 

रीता – हाल अच्छा नहीं है. भाई साहब, पैर की हड्डी टूट गई है. ढाई महीने प्लास्टर में रहेगा.

 

जगदीश – अनिल का पैर टूट गया. मुझे पता तक नहीं. तुमने समझा क्या है. मुझे जीते जी मार दिया.

 

रीता – भाई साहब वह परसों से आपको और अपने ताउजी को पुकार रहा है. किसी की नही सुनता.

 

प्रदीप – और तुम उसे भुलाना चाहते हो. तुमने कहलवाया तक नही मैं अभी जाता हूँ.

 

जगदीश – कहाँ जाता है इधर बैठा. लेकिन नहीं मैं भूल गया था. मैं किसी को रोकने वाला कौन? जा भाई. मैं तो जीते जी मर गया.

 

मालती – मरे तुम्हारे दुश्मन ऐसा क्यों बोलते हो ?

 

जगदीश – बोलने के सिवा और मेरे पास रहा है क्या है? अनिल मुझे पुकारता रहा, और उसकी आवाज मुझ तक पहुचने ही नहीं दी गई, यह सब क्या हो गया? अलग होते ही हम सब दुश्मन हो गए.

 

रीता – भाई साहब बात यह नही है, हम उसे अस्पताल ले गए थे. उन्हें तो आप जानते ही है कि एक क्षण की भी फुरसत नहीं मिलती. मुझे तो सभा सोसाईटियों का काम रहता है. बाप को पैसा कमाने से फुरसत नहीं. तब औलाद की कौन देखभाल करे? भला, चार वर्ष का बच्चा बिना अपनों के अस्पताल में कैसे रह सकता है?

 

रीता – यही तो बात है, रो रोकर परेशान कर रहा है.

 

जगदीश – तो मैं क्या करू?

 

रीता – कैसे कहूँ आप उसके पास चले.

 

जगदीश – और अस्पताल में रहे.

 

रीता – नहीं – नहीं आप उसे.

 

जगदीश – यहाँ ले आये. नहीं यह नहीं हो सकता. कुछ नहीं हो सकता मैं कुछ नहीं कर सकता. तुम जानो तुम्हारा काम जाने, तुम स्वतंत्र हो. आत्म निर्भर हो, दूसरों का सहारा क्यों लेते हो? दुर्लभ हो जाओगे. जाओ.

 

रीता – भाई साहब

 

जगदीश – भाई साहब कौन भाई साहब? किसका भाई साहब – भाई साहब होता तो परसों ही मैं अनिल के पास होता. तुम तो सबसे अधिक कमाते हो, जाओ बच्चों को घर लाओ, एक नर्स रखो. एक नौकर रखो.

 

रीता – नर्स भी है, और नौकर भी है पर

 

जगदीश – पर माँ बाप को फुरसत नहीं है कि बेटे के पास बैठे. आज के युग में जरुरत भी क्या है?

 

मालती – अब बस भी करो, प्रदीप, चल मैं चल रही हूँ. इन्हें बहकने दे. मैं अनिल को यहाँ लेकर आती हूँ. देखती हूँ मुझे कौन रोकता है.

 

जगदीश – मैं रोक सकता हूँ, घर मेरा है.

 

मालती – घर तो तब भी तुम्हारा था, जब बाँट बखेरा हुआ था. किसी को रोक सके.

 

जगदीश ने कहाँ – मालो रुको

 

मालती – चलो प्रदीप

 

प्रदीप – चलो बहू भाई साहब स्वयं उसे यहाँ लाना चाहते है. यह तो बनावटी क्रोध है.

 

रीता – जानती हूँ इन तीनो दिनों में बहुत कुछ जान गई हूँ, जान गई हूँ कि पैसा सब कुछ नही है.

 

प्रदीप – ठीक कहती हो, बहू कोई भी वास्तु अपने आप में सब कुछ नहीं है.

 

जगदीश – हंसते है, वे भी समझते है.

 

सुमन – ताउजी क्या अनिल यहाँ आयेगा ?

 

जगदीश  – हाँ क्यों नहीं आयेगा!

 

सुमन – उसके चौट लग गई है.

जगदीश – अच्छा तू उसे प्यार करेगी न?

 

सुमन – मैं उसे बहुत प्यार करुँगी, वह बहुत अच्छा है.

 

जगदीश – और प्रकाश, मीना, मंजू, किशोर और इलाहाबाद वाली ताई और सुबीर, पप्पू, कुणाल, ये सब अच्छे नहीं है? इन्हें तू प्यार नही करेगी?

 

सुमन – क्या ये सब भी आयेंगे यहाँ?

 

जगदीश – हाँ यही.

 

सुमन – फिर कभी नहीं जायेंगे?

 

जगदीश – नहीं

 

सुमन – अच्छा जी, तब तो बहुत अच्छा होगा. हम पहले की तरह खेलेंगे.

 

जगदीश – और बहुत खुश होंगे. इसलिए और भी खुश होंगे कि अब वे सब अपनी इच्छा से आएँगे यह सोचकर अपनी इच्छा से अपनी आवश्यकता के कारण, इच्छा आवश्यकता के कारण वो खूब हंसता है, बेचारा भोला इंसान.

 

सुमन – ताउजी, आप इतने क्यों हँसते है?

 

जगदीश – क्यों हँसता हूँ? तू भी हँस सुमन तू भी हँस. दौनो हँसते है खूब हँस, अब हम किसी एक के नहीं होंगे. एक दूसरे के होंगे.

 

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