सद्भावो का कल्पवृक्ष


सित पुष्पित और फलित करती सद्भावना के अभाव में कोई भी परिवार, समाज या राष्ट्र संगठित सशक्त और उन्नत नहीं हों सकता.

नीतिशास्त्र हमें भले ही शठे शाठ्य समाचरेत का उपदेश दे, धर्मशास्त्र तो हमें हमेशा शठे शिष्ट समाचरेत कि ही शिक्षा देते है. महात्मा कबरिदास हमें इसी सिधान्त कि और इन्गीत करते हुए कहते है.




निंदक नियरे रखिये

आँगन कुटी छवाय |

बिन पानी साबुन बिना

निर्मल करे सुभाय.

वस्तुतः शिष्टता या शिष्टाचार मानव मन मस्तिस्क का परिमार्जन या विरेचन करने वाला एक कारगर तत्व है. यह मानव कि चित्व्र्तियो को कोमल निर्मल और विमल बनता है. अतः हमें दुष्टों के प्रति भी शिष्टता का व्यवहार करना चाहिए.

पाशचात्य महान नेता मार्टिन लूथर ने इसी सिद्धांत को जीवन में चरितार्थ करके अपने घोर विरोधियो एवं प्रबल शत्रुओ को भी अपने वश में कर लिया था. भगवान् महावीर, महात्मा बुध्द, ईसा मसीह, महात्मा गाँधी आदि महान आत्माओं ने हमें शिष्टता का ही उपदेश एवं सन्देश दिया है. समस्त मानव जाती के लिए इससे उत्तम सिध्धांत अन्य कोई हों ही नहीं सकता.

वस्तुत सद्भाव या शिस्ताचार कल्पवृक्ष के सामान है. इस तथ्य को दृष्टी में रखकर किसी अंग्रेज विद्वान ने ठीक ही कहा है – “Fance may kill of cure.”

आर्थात हमारी भावनाए ही किसी कि हत्या या उपचार कर सकती है. व्यवहार जगत में देखा गया है कि किसी मरीज के लिए दवा जितनी उपयोगी होती है, उतनी ही उपयोगी दुवा या सद्भाव होती है.

सद्भाव का जन्म हमारे द्रष्टिकोण व्यापक या विशाल रखना चाहिए. किसी विद्वान श्रीमती एनिबिसेंत से एक बार प्रशन किया था – “क्या कारण है कि भारत के पास इतना उत्कृष्ट चिंतन है, महान दर्शन है. फिर भी वह अन्य पाश्चात्य देशो कि तुलना में पिछड़ा हुआ है?”

इस सन्दर्भ में मेडम एनिबिसेंट ने स्पष्ट शब्दों में उत्तर दिया. भारत के पिछड़ेपन का मूल कारण यहाँ के लोगो की संकुचित व्रत्ति है, द्रष्टिकोण में व्यापकता का आभाव है, उदार द्रष्टि का न होना है.” हमारे प्रचीन भारतीय ऋषि मुनियों ने व्यापक द्रष्टिकोण को ध्यान में रखकर समस्त स्रष्टि के लिए मंगल भावना व्यक करते हुए कहा था.

सर्वे भवन्तु सुखिंन:

सर्वे सन्तु निरामया:

सर्वे भद्राणि पशियन्तु,

माँ कश्चिद दुःख भाग्भ्वेत.

अर्थात स्रष्टि के समस्त प्राणी सुखी रहे, सभी निरोग रहे, सभी भद्र या शिष्ट बने और किसी को किसी भी प्रकार का दुख या कष्ट का अनुभव न होवे.

हमारे प्राचीन ऋषियों ने यजुर्वेद में हमें उपदेश दिया है कि मित्रस्य चक्षुषा समीक्षामहे – अर्थात हम सभी प्राणियों को मित्र कि द्रष्टि से देखने का प्रयास करे. उक्त सन्दर्भ में पाश्चात दार्शनिक सिलेण्ड फास्टर ने कहा था.

दाम्पत्य जीवन कि सफलता केवल ठीक व्यक्ति ढूँढ़ने पर नहीं अपितु इससे भी बढकर आप स्वयं के ठीक व्यक्ति होने पर है.

यह कथन दर्शाता है कि यदि व्यक्ति स्वयं को सुधारने का प्रयास करेगा तो एक दिन सारा समाज, राष्ट्र एवं संसार स्वयं में सुधर जायेगा। अतः आवश्यकता इस बात की है कि व्यक्ति स्वयं सुधरे, तभी संसार में सुधर की कल्पना की जा सकती है संसार को सुधारने का दावा किया जा सकता है.

विश्व के उपवन में सद्भावो का कल्पवृक्ष

विश्व के उपवन में सद्भावो का कल्पवृक्ष

 

यदि हम चाहते है कि परिवार समाज और राष्ट्र और विश्व में सद्भावना का वातावरण निर्मित रहे, एक – दुसरे के प्रति सौहार्द्रभाव कायम रहे, तो हमें सद्भावना को बढ़ावा देना चाहिए. सम्प्रदायवाद के दानव के अंत के लिए सौहार्द्रभाव से बढकर अन्य कोई युक्ति सार्थक सिद्ध नहीं होगी. परिवार एवं समाज में भी हमें सौहार्द्रभाव को ही विकसित करना होगा.

 

यदि एक राष्ट्र के प्रतिनिधि सद्भावनापूर्वक दुसरे राष्ट्र में जाए, तो उन राष्ट्रों में आपसी संपर्क बढेगा, विश्वास उत्पन्न होगा, संबंधो में प्रगाढ़ता आएगी, तनाव कम होगा, मैत्री सम्बन्ध स्थापित होंगे और युध्द कि विभिशिकाओ से अपने आप को सुरक्षित रखा जा सकेगा.

वर्तमान में, जब कि विश्व में चारो और अविश्वास, अनास्था, शोषण, भ्रष्टाचार, लूटमार, हिंसा का तांडव बड गया है. हमारे संत श्री महात्मा, ऋषि, मुनि, आदि इसी सद्भावना के प्रचार और प्रसार के लिए ही तो देसाटन करते रहते है और जन जन को सद्भावना, मैत्री, अहिंसा का सन्देश देते रहते है. आपसी बैर विरोध एवं वैमनस्य से मानव जाती का कल्याण कदापि संभव नहीं है. किसी कवि ने इस सन्दर्भ में ठीक ही कहा है –

आरा भी नहीं हों सकती

दोस्त हमारी

उजाड़कर रख देती है यह,

जीवन फुलवारी

गर्त में जा रही सारी नेतिकता हमारी

अवरुध्ध हों रही

देश कि प्रगति सारी

यह सच है कि परस्पर वैरभाव या वेमंस्व कि अग्नि ने हमारे वर्तमान मानव जीवन कि फुलवारी को जलाकर वीरान कर डाला है. यही कारण है कि आज हमारी नेतिकता उन्नति अवरुध्ध हों गयी है. देश का अपेक्षित उत्थान नहीं हों पा रहा है.

भ्रष्टाचार के केंसर ने राष्ट्र के शरीर को खोखला कर दिया है. हमारी भोतिक उन्नति भी कुछ हदतक हमारे लिए घातक सिध्ध हों रही है. एक शायर ने इस सन्दर्भ में सही फरमाया है

हेरान फिर रहा है, इस एटम के दोर में

अपने कफ़न को काँधे पे हर आदमी लिए.”

प्रश्न यह उपस्थित होता है कि सद्भावना के बीज लाये कहा से? उत्तर आसान है – इस सद्भावना कि खेती मानव ह्रदय में ही होती है. इस खेती के लिए ह्रदय क्षेत्र में सदाचार का खाद डालना होगा. तभी सद्भावना कि खेती हरी भरी दिखाई देगी.

परन्तु वर्तमान में सबकुछ संभव नहीं है. कारण, हमारा देश चारित्रिक संकट के दौर से गुजर रहा है. भ्रष्टाचार आजका शिष्टाचार बन बेठा है. बागी और दागी लोग जनता के नेता बन बेठे है. इस भ्रष्टाचार रूपी रावण का अंत – सदाचार रूप राम के द्वारा ही संभव है. इस सदाचार पर बल देते हुए एक हिंदी कवि कहता है.

छोटी से जिन्दगी है

तकरार किस लिए

बनती है दिलो में

दीवार किस लिए

है साथ कुछ दिनों का

फिर सब जुदा जुदा राहो मे

हम बिछाए

फिर शूल किस लिए?”

कितना सार्थक कहा है कवि ने यदि हम सच्चे इन्सान है, मानव है, मनु पुत्र है, ऋषियों कि संतान है तो हम दुसरो के मार्ग में काटे न बिछाए, अपितु फुल बिछाये. जिस दिन मानव मेघा में यह तथ्य प्रविष्ट हों जायेगा, उस दिन यह सारा विश्व उपवन सुख शांति से हरा भरा हों जायेगा.

इस धरती पर ही स्वर्ग के दर्शन किये जा सकेंगे. आइये हम महात्मा ईसा मसीह के इस सन्देश पर अपन ध्यान आकर्षित करे.

“Agree with thine adversary quickly.”

अर्थात हम अपने विरोधी के साथ शीघ्र ही सहमत हों जाये. इसी में व्यक्ति समाज, राष्ट्र, एवं विश्व का कल्याण सम्भव है.

अंत में कविवर युगल किशोर मुख्त्यार के शब्दों में हम सदेव यही भावना रखे कि –

मैत्री भाव जगत में मेरा

सब जीवो से नित्य रहे.

दीन दुखी जीवो पर मेरे

उर से करुणा स्त्रोत बहे

दुर्जन क्रूर कुमार्ग रतो पर क्षेभ नहीं मुझको आवे

साम्यभाव रखु में उन पर

ऐसी परिणति हों जावे.

 

indiahindiblog

India Hindi Blog हिंदी भाषी लोगो के लिए बनाया गया है, ये भारत के उन सभी लोगो के लिए है जो खुद ऑनलाइन पढ़ना चाहते है, अपने ज्ञान को बढाना चाहते है. हर तरह की जानकारियों से अपने आपको अपडेट रखना चाहते है. इसलिए हमारे द्वारा इस ब्लॉग को आपके लिए तैयार किया गया. आप इस ब्लॉग में सभी तरह की जानकारियों का ज्ञान ले सकते है. इस ब्लॉग में आपको चिकित्सा, टेक्नोलॉजी, खेल, सामान्य ज्ञान, इतिहास, अनमोल विचार, इन सभी का संग्रह आपके लिए यहाँ पर उपलब्ध है.

You may also like...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *