हजारी प्रसाद द्विवेदी Story


आचार्य  हजारी प्रसाद द्विवेदी STORY

हजारी प्रसाद द्विवेदी Story – आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जन्म १९ अगस्त सन १९०७ ई में बलिया जिले के आरत दुबे के छपरा नामक गाँव में हुआ. साहित्य और ज्योतिष पर समान अधिकार रखने वाले द्विवेदी जी बचपन से ही अध्ययनशील रहे. लखनऊ विश्वविद्यालय ने आपको डी, लिट की उपाधि से विभूषित किया. इन्होने ललित निबंधो की रचना की है.




हजारी प्रसाद द्विवेदी Story - Hindi Blog

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अशोक के फूल, कुटज, विचार और वितर्क, विचार-प्रवाह, सूर-साहित्य, कबीर, हिंदी साहित्य का आदिकाल, बाणभट्ट की आत्मकथा, पुनर्वा आदि इनकी प्रमुख रचनाये है.

 

द्विवेदी जी ने अपनी रचनाओं के अनुरूप भाषा का प्रयोग किया है. उनकी भाषा के तीन रूप है. तत्सम प्रधान, सरल तद्भव प्रधान और उर्दू अंग्रेजी शब्द युक्त व्यवहारिक भाषा को गतिशील एवं प्रवाहपूर्ण बनाने के लिए अपने लोकोक्तियों और मुहावरों का आवश्यकतानुसार प्रयोग किया है. आपकी भाषा प्रांजलता, भावप्रवणता, सुबोधता, अलंकारिता, चित्रोंपमता और सजीवता के गुणों से परिपूर्ण है. आपके लेखन में व्यास, गवेष्णात्मक, विवेचनात्मक, भावात्मक, आत्म व्यंजक, लालित्यपूर्ण, आलोचनात्मक, व्यंग्यात्मक, प्रवाहमय और भावव्यंजक शैली के सभी रूप आकर्षक तथा मधुर है.

 

द्विवेदी जी आधुनिक युग के अत्यंत सम्मानित साहित्यकार है. ललित निबंध लेखन को नई परम्परा का सूत्रपात करने का श्रेय आपको दिया जाता है. द्विवेदी जी हिंदी साहित्त्य के अमर रचनाकार है. इनमे शास्त्रीयता और सहजता का अद्भुत संगम है.

 

द्विवेदी जी की कहानी के भाव

शिरीष के फूल  एक उत्कृष्ट कोटि का निबंध है. लेखक ने इसमें शिरीष का विभिन्न रूपों में वर्णन किया है. शिरीष गर्मियों में फूलता है. यह छायादार होने के साथ साथ अत्यंत सुन्दर भी होता है. इसका कारण यह है कि शिरीष ऐसा कालजयी अवधूत (जिसने कालरुपी समय को जीत लिया) है. जो जीवन की अजेयता का प्रचार करता है. प्रचीनकाल में इसका श्रृंगारिक वर्णन कालिदास ने किया है. कहीं-कहीं पर उन व्यक्तियों पर तीखा व्यंग्य किया है. जो सत्ता की अधिकार लिप्सा के कारण आने वाली पीढ़ी की उपेक्षा भी सहन कर लेते है.  जय और मृत्यु ये दौनो जगत के चिर परिचित प्रमाणिक सत्य है. इस सत्य को तुलसीदास ने भी स्वीकारा है.

 

शिरीष को अद्भुत अवधूत की संज्ञा भी इसलिए दी है कि दुःख हो या सुख वह कभी हार नहीं मानता.

कबीर भी शिरीष के समान मस्त, बेपरवाह पर सरस थे. कालिदास स्थिर प्रज्ञता और विद्न्ध प्रेमी का ह्रदय पाने के कारण अनासक्त योगी बनकर संस्कृत के कवि सम्राट बन गए. आधुनिक काल में यही अनासक्ति सुमित्रानंदन पंत व  रवीन्द्रनाथ टेगोर में है. शिरीष पक्के अवधूत की भाति है जो चिलकती धुप में सरस बना रहता है. चाहे कैसा ही आंधी तूफान, धूप वर्षा या विषम परिस्थितियाँ हो, इनमे कोई स्थिर नहीं रह सकता. किन्तु शिरीष रहता है. वैसे ही जैसे दंगा फसाद, मार-काट, अग्निदाह, लूट-पाट आदि परिस्थितियों में गांधीजी ने अपना धेर्य, साहस व निर्णय नहीं खोया इसलिए लेखक ने महात्मा गांधी को अवधूत कहा है.

 

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