हिंदी काव्य Hindi Poetry Information

हिंदी काव्य

हिंदी काव्य और भक्ति आन्दोलन में एकता भाव को प्रमुख रूप से स्वीकार किया गया. रामानंद की शिष्य परम्परा में तुलसीदास और कबीर को समान रूप से स्थान मिला. यहाँ तक कि मीरा के गुरु रेदास माने जाते है. तुलसीदास को रामचरित मानस में भील किरात, वन्य जातियाँ राम के साथ सम्मान पाती है.




ईश्वर के सक्षय सभी को एक माना गया. भक्ति आन्दोलन में वैचारिक आधार स्वरूप ऊँच नीच, जाति व वर्ण भेद के स्थान पर केवल मनुष्यता को स्वीकार किया गया है.

हिंदी काव्य Poetry Information in hindi

हिंदी काव्य Poetry Information in hindi

हिंदी काव्य और भक्ति आन्दोलन में जाति के स्थान पर केवल भक्ति और भक्त को स्वीकृति मिली. कबीर ने तो न हिन्दू न मुसलमान ईश्वर की प्राप्ति के लिए केवल मानवीय गुण सद्गुण, प्रेम, सहिष्णुता, पावन ह्रदय सादे जीवन को महत्त्व दिया.

हिंदी काव्य और भक्ति आन्दोलन में रुढियों, अंधविश्वासों का निषेध मिलता है. सभी संत कवियों ने धार्मिक आडम्बरों से मुक्त रहने को महत्व दिया तथा कर्मकाण्डो का विरोध किया.

भक्ति काल में विविधकलाओं जैसे वास्तुकला मूर्तिकला, चित्रकला संगीतकला को सांस्कृतिक स्तर पर महत्त्व मिला. कला क्षेत्र में भी समन्वय की प्रवृत्ति थी.

लोक चेतना को महत्त्व देने के कारण संत कवियों ने लोक भाषाओ को महत्त्व दिया. महाकाव्यों में शास्त्रीय शैली तथा भक्ति पदों में सादे शब्दों में तथा मिश्रित भाषा में अभिव्यक्ति मिलती है . अवधि और ब्रज भाषा में रामचरित मानस सूर सागर जैसे महाकाव्यों की रचना हुई. निष्कर्ष रूप में भक्तिकाल समन्वय परक, लोक चेतना तथा सदाशयता से पूर्ण काल था.

 

रीतिकाल संवत १७०० से १९००

हिंदी काव्य – हिंदी साहित्य के मध्यकाल का द्वितीय भाग रीतिकाल के नाम से जाना जाता है. इसका समय संवत १७०० से १९०० (१६४३ से १८४३) तक माना है. इस काल की प्रमुख प्रवृति श्रृंगार थी. अंत: इसे श्रृंगार काल भी नाम दिया गया किन्तु रीतिकाल नाम अधिकांश विद्वानों ने स्वीकार किया. रीतिकाल इसे लक्षण ग्रंथो के कारण कहा गया. रीतिकाल का युग सामंतो और राजाओ का युग था. रीतिकाल के अधिकांश कवि राजाओ के दरबार के आश्रित कवि थे. अत: राजाओं को प्रसन्न करने के लिए उन्होंने श्रृंगार प्रधान रचनाये लक्षण ग्रंथो के रूप में लिखी. प्रमुख प्रवृति रीती निरूपण और श्रृंगार थी किन्तु राजाओ की प्रशस्ति, भक्ति और नीति सम्बंधी काव्य रचनाये भी हुई. इस काल को तीन अंतर्भागो में बाटा जा सकता है.

 

रितिबंद्ध कवि, रीतिमुक्त कवि, रितिशिद्ध कवि

 

रीतिबद्ध कवि – इस धारा के कवियों ने अलंकार, नायिका भेद आदि के लक्षण व उदाहरण के साथ काव्य रचना की. इनमे प्रमुख कवि थे. केशव, पद्माकर, मतिराम आदि.

 

रीतिसिद्ध कवि – इस धारा में वे कवि है. जो लक्षण उदहारण की पद्धति प्रकट रूप में नहीं अपनाते किन्तु रचना करते समय उसका ध्यान रखते है. बिहारी का काव्य इस दृष्टी से उल्लेखनीय है.

 

रीतिमुक्त कवि – इस धारा के कवि स्वछंद अथवा स्वतंत्र प्रवृति को अपनाते है जैसे घनानंद, आलम, बोधा ठाकुर. इन कवियों के काव्य में रीतिबद्ध परम्परा से मुक्त काव्य आंतरिक अनुभूति से जुड़ा मिलता है. जिसमे कृत्रिमता नहीं है. प्रेम वर्णन व्यथा प्रधान है.

 

हिंदी साहित्य

रीतिकाल की प्रमुख प्रवृतियाँ

रीतिकाल की प्रमुख प्रवृतियाँ निम्नलिखित है – लक्षण ग्रंथो की रचना

लौकिक श्रृंगार की व्यंजना

कला पक्ष की प्रधानता श्रृंगार रस की प्रधानता तथा छंद, कवित्त सवैया, दोहा का प्रयोग किया गया.

प्रकृति का उद्दीपन रूप में चित्रण.

मुक्तक काव्य रचना.

वीर काव्य भी लिखे है. (भूषण वीर रस के श्रेष्ठ कवि थे)

ब्रज मिश्रित अवधि भाषा का प्रयोग, किन्तु काव्य की भाषा मुख्यतः ब्रजभाषा थी.

नीत्ति और भक्ति सम्बन्धी काव्य रचनाये भी की गई.

इस कवियों में वृन्द, बैताल, आलम, गुरु गोविन्द सिंह, गिरिधर, दीनदयाल गिरि का नाम महत्वपूर्ण है.

रीतिकाल में प्रमुख रूप से दो प्रकार के साहित्य का निर्माण हुआ. राजा श्रय प्राप्त साहित्य और लोक साहित्य राजा श्रय प्राप्त साहित्य दरबारी कवियों द्वारा लिखा गया था और लोक साहित्य भूषण लाल, सुदन द्वारा लिखा गया . प्रथम में विलास की गंध थी दुसरे में वीरत्व की सजन भावना.

इस काल में नीतिपरक, भक्तिपरक और वीर काव्य की भी रचना हुई. काव्य भाषा प्रमुख रूप से बृजभाषा थी. किन्तु परिवेश के कारण फारसी का भी प्रभाव था. काव्यांग व अलंकारों का बाहुल्य होने के कारण रीतिकाल का अभिव्यंजना पक्ष तथा शिल्प महत्वपूर्ण था.

हिंदी साहित्य के रीतिकाल में मध्यप्रदेश के कवियों का विशेष योगदान रहा. इस काल के श्रेष्ठ कवियों में केशव, बिहारी, रसनिधि, पद्माकर, भूषण, चिंतामणि, लालकवि, महाराज छत्रसाल और अक्षर अनन्य का नाम विशेष उल्लेखनीय है.

 

केशवदास – ओरछा नरेश इंद्रजीतसिंह के दरबारी कवि थे. इन्हें राजगुरु के रूप में भी सम्मानित किया गया था. ये रीतिकाल के प्रथम आचार्य और महाकवि थे. केशव की भाषा बुन्देली मिश्रित ब्रज भाषा है.

 

पद्माकर – पद्माकर ने सुगरा, दतिया, सागर, ग्वालियर में राजाश्रय पाया था. यहाँ सभी जगह उन्हें बहुत सम्मान मिला था. पद्माकर काव्य रीति के उत्कृष्ट ज्ञाता और रससिद्ध कवि थे. इसलिए उनका अलंकार निरूपण, रस निरूपण और नायिका भेद निरूपण सह्रदय समाज में सदेव आकर्षण का केंद्र रहा है.

 

भूषण – हिंदी साहित्य के रीतिकालीन श्रृंगार की चकाचौंध से परे भूषण की ख्याति वीर रस के कवि के रूप में है. भूषण की उपाधि ही इन्हें चित्रकूट के राजा रूद्र ने दी थी. बुंदेलखंड के महाराज छत्रसाल के यहाँ भूषण को बहुत सम्मान मिला था. उनकी कविता का प्रेरक तत्व धन लिप्सा और श्रृंगार मनोवृत्ति नहीं थी बल्कि एक देशभक्त और अपार सात्विक साहस सम्पन्न व्यक्ति के प्रति श्रध्दा का अतिरेक था.

 

बिहारी – बिहारी का जन्म ग्वालियर के पास बसुआ गोविंदपुर में हुआ था. इन्होने हिंदी साहित्य में बिहारी सतसई जैसी कृति देकर बहुत गौरव बढाया है. इसमें ७१९ दोहे है. एक – एक दोहे में बिहारी ने इतना चमत्कार भर दिया है कि उसमे कवियों की कल्पना शक्ति की बेजोड़ झलक दिखाई देती है.

 

चिंतामणि – चिंतामणि महाकवि भूषण के बड़े भाई थे. राजा महाराजाओ के यहाँ इनका बहुत सम्मान था.

 

लालकवि – इनका पूरा नाम गौरेलाल पुरोहित था. आप महाराज छत्रसाल के दरबारी कवि थे. ये कवि बुंदेलखंड के राजा हो गए थे.

 

रसनिधि – रसनिधि का असली नाम पृथ्वीसिंह था. ये दतिया राज्य के अंतर्गत जागीरदार थे. इनके द्वारा रचित रतन हजारा अद्भुत ग्रन्थ है.

 

पद्य खंड

आचार्य विश्वनाथ ने रसयुक्त वाक्य को कविता कहा है. और आचार्य रामचंद्र शुक्ल के मतानुसार जो उक्ति ह्रदय में कोई भाव जागृत कर दे या उसे प्रस्तुत वस्तु या तथ्य की मार्मिक भावना में लीन कर दे. किसी कविता को पढ़ते या सुनते समय आनंद की जो अनुभूति होती है, साहित्य में इसे रस कहा जाता है.

 

कविता के दो पक्ष होते है

भाव पक्ष – भाव पक्ष के अंतर्गत भाव सौन्दर्य, अप्रस्तुत योजना नाद सौन्दर्य संगीत तत्व, शब्द सौन्दर्य, चित्रात्मक, विचार सौन्दर्य आदि आते है. इनके द्वारा कविता की पूर्ण छवि हमारे समक्ष आती है.

 

पाश्चात्य विद्वानों ने कविता के चार तत्व माने है – भाव बुद्धि कल्पना और शैली

 

ख – कला पक्ष – कला पक्ष के अंतर्गत लय, तुक, शब्द योजना, भाषा गुण, अलंकार और छंद आदि आते है. कविता का विषय व्यापक और बहुआयामी होता है. पाश्च्यात विद्वानों ने काव्य के दो भेद माने है. शक्ति काव्य और कला काव्य.

 

काव्य के रूप – हिंदी साहित्य में काव्य के दो रूप मिलते है

 

प्रबंध काव्य

मुक्तक काव्य

 

हिंदी काव्य प्रबंध काव्य के अंतर्गत – महाकाव्य , खंड काव्य , आख्यानक गीत

 

हिंदी काव्य महाकाव्य – महाकाव्य की कथावस्तु संग्रबद्ध होती है. और एक सूत्र में बंधी रहती है. इसमें जीवन के समग्र रूप का वर्णन किया जाता है. और प्रमुख रूप से वीर, श्रृंगार और शांत रस पाए जाते है. और सर्ग के अंत में छंद बदल जाता है. रामचरित मानस, कामायनी, साकेत और कुरुक्षेत्र आदि हिंदी के प्रमुख महाकाव्य है.

 

हिंदी काव्य खंड काव्य – खंड काव्य में जीवन के एक पक्ष या रूप का वर्णन किया जाता है. कथा में एक सूत्रता रहती है. यह अपने आप में पूर्ण होता है. पंचवटी, जयदृथ वध सुदामा चरित, आदि हिंदी के प्रमुख खंडकाव्य है.

 

हिंदी काव्य आख्यानक गीत – महाकाव्य और खंड काव्य से भिन्न पद्यबदक कहानी को आख्यानक गीत कहते है. इसमें शोर्य, पराक्रम, त्याग, बलिदान, प्रेम, करुणा आदि मानवीय भावों के प्रेरक और उद्बोधक घटना चित्र प्रस्तुत किये जाते है. नाटकीयता और गीतात्मकता इसकी प्रमुख विधाए है. सुभद्रा कुमारी चौहान द्वारा लिखित झासी की रानी और मैथलीशरण गुप्त द्वारा लिखित रंग में भंग हिंदी के प्रमुख आख्यानक गीत है.

 

हिंदी काव्य मुक्तक काव्य – मुक्तक काव्य के भी दो भेद माने गए है.

 

हिंदी काव्य पाठ्य मुक्तक – पाठ्य मुक्तक में विभिन्न विषयों में लिखी गई छोटी – छोटी विचार प्रधान कविताये आती है. इनमे भावो की अपेक्षा विचारो की प्रधानता होती है. कबीर, तुलसी, रहीम, बिहारी, मतिरामके, नीतिपरक भक्तिपरक और श्रृंगार परक दोहे इसके उदाहरण है.

 

हिंदी काव्य गेय मुक्तक – इसको प्रगीत भी कहते है. इसमें भावना और रागात्मक और संगीतात्मकता की प्रधानता होती है. कबीर, तुलसी, सूर, मीरा के गेय पद तथा आधुनिक युग के प्रसाद निराला, पंत तथा महादेवी वर्मा आदि इसी की कविताये श्रेणी की है

 

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