हिंदी भाषा उपेक्षित क्यों


आज की राष्ट्र भाषा हिंदी भाषा उपेक्षित क्यों ?

फैशन के इस दौर में हर भारतीय अंग्रेजी बोलकर स्वयं को गौरवांवित महसूस कर रहा है. आजकल विभिन्न चेनलों पर प्रसारित कार्यकर्मो में आधी बातें हिंदी भाषा में तथा आधी बातें अंग्रेजी भाषा में की जाती है. जिसके कारण हिंदी भाषा की शुद्धता समाप्त होती जा रही है.




हिंदी भाषा उपेक्षित क्यों

हिंदी भाषा उपेक्षित क्यों

भारत जैसे सांस्कृतिक देश से संस्कृत भाषा का लगभग उन्मूलन को चूका है. संस्कृत भाषा के बाद अब हिंदी का नंबर है. कुछ लोगो की ऐसी धारणा है, परन्तु हमारी धारणा इसके विपरीत है. पाश्चात्य विद्वान फादर कामिल बुएके का मानना है. हिंदी भाषा इतनी समृद्ध और सक्षम है कि सारा कामकाज सुचारू रूप से हिंदी में किया जा सकता है.

 

आज दुनिया के १५० विश्व विद्यालयों में हिंदी भाषा का अध्यापन होता है.

हिंदी का अपना विशाल साहित्य है. फिर भी आज तक उसे राष्ट्रभाषा का पद नही मिल सका है. भारतीय संविधान के अनुच्छेद ३४३ में स्पष्ट उल्लेख है कि हिंदी हमारी राष्ट्रीय भाषा होगी. संघ की राजभाषा, देवनागरी लिपि में हिंदी होती. अंग्रेजी सहायक रहेगीं. फेशन के इस दौर में हर भारतीय अंग्रेजी बोलकर स्वयं को गौरवांवित महसूस कर रहा है. आजकल विभिन्न चेनलों पर प्रसारित कार्यकर्मो में आधी बातें हिंदी में तथा आधी बाते अंग्रेजी भाषा में की जाती है. जिसके कारण हिंदी की शुद्धता समाप्त होती जा रही है. स्वशासी शिक्षण संस्थाओं द्वारा अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा दी जाती है जिसके कारन बच्चो का हिंदी का ज्ञान निन्म स्तर का होता जा रहा है. उनके सोचने समझाने की शक्ति पर अंग्रेजी का प्रभाव पड़ता जा रहा है . वे अपने मोभावों जी हिंदी  में सहजता एवं शुद्धता से व्यक्त नहीं कर पाते है. यही ऐसा चलता रहा तो एक दिन भारत अपनी हिंदी भाषा को भूलकर अपनी संस्कृति को ही भूल जायेगा. राजश्री पुरुषोत्तम दास ने इस सम्बंध में स्पष्ट रूप से कहा है कि यदि हमें मात्रभाषा का ज्ञान नहीं रहेगा तो पुरानी मान मरियादाओं को जानने का अवसर भी हमें प्राप्त नहीं होगा.

 

गांधीजी ने तो स्पष्ट शब्दों में कहा था देशी भाषा का अनादर राष्ट्रीय आत्महत्या है.

  • किसी कवि का इस सम्बन्ध में बड़ा सुन्दर कथन है.
  • अंग्रेजी का हो रहा है, ऐसा भूत सवार
  • संडे संडे सब रटें, भूल गए रविवार
  • माना अच्छी बात है, हर भाषा का ज्ञान
  • किन्तु कहाँ तक उचित है, हिंदी का अपमान?

 

हिंदी के उपयोग में क्यों इतना संकोच

  • हिज भाषा में पाओगे, इसके जैसा लोच?
  • भारतेंदु हरिश्चंद्र ने राष्ट्रभाषा की उन्नति के सम्बंध में बहुत समय पहले ही कहा था
  • निज भाषा उन्नति हुये, सब उन्नति को मूल पे निज भाषा ज्ञान बिन, मितन न हिय को सूल

 

महापंडित राहुल सांकृत्यायन का इस सम्बन्ध में दृढ संकल्प था कि वे अंग्रेजी भाषा भाषी लोगो को छोड़कर प्रत्येक विदेशी से हिंदी भाषा में ही वार्तालाप करेंगे. महाकवि निराला ने आकाशवाणी की कार्यकर्मों में भाग लेने से साफ़ इंकार कर दिया था. प्रेमचन्द्र ने हिंदी में कहानियाँ एवं उपन्यास लिखे. मैथिलीशरण गुप्त ने हिंदी भाषा में लिखा. पटाभिसीतारमैया अपने सभी पत्रों पर हिंदी में ही लिखते थे.

 

भाषा के बिना तीनों लोकों में अंधकार छा जाता.

राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूंगा है  – महात्मा गाँधी

 

विश्व में २७९२ भाषाएँ बोली जाती है इनमे भारत का तीसरा नंबर है. चीन का प्रथम और रूस का द्वितीय स्थान है. भारत में १८ से अधिक राजभाषाएँ और ३०० से अधिक बोलियाँ बोली जाती है.

 

आज हमारे ही देश में उर्दूं, फ़ारसी, बंगला, मराठी, कन्नड़, तमिल, तेलगु, उड़िया आदि भाषाएँ हिंदी के विकास में बाधक है. महाकवि रविन्द्र नाथ टेगोर ने कहा था. हिंदी देश के ज्यादा हिस्सों में बोली जाती है. अत: इसे ही राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार करना चाहिए.

 

स्वामी दयानंद सरस्वती, सेठ गोविन्ददास, राजर्षि, पुरुषोत्तमदास टंडन, महापंडित राहुल सांकृत्यायन, महाकवि निराला, मुंशी प्रेमचन्द्र, मैथलीशरण गुप्त, महावीर प्रसाद द्विवेदी आदि महान लेखकों ने हिंदी भाषा का भारी समर्थन किया. आचार्य विनोबा भावे ने कहा था. अंग्रेजी भाषा सीखने में जितना समय बर्बाद करते है, उतने समय में तो हम भारत की चार छह भाषाएँ सिख सकते है.

 

खान अब्दुल गफ्फार खान ने कहा था जो जाती अपनी भाषा भुला देती है. वह दुनिया से शीघ्र समाप्त हो जाती है. भारतीय संसद में राष्ट्रभाषा हिंदी के लिए लिपि निर्धारित करने के लिए चल रही बहस के अवसर पर राजर्षि पुरुषोत्तमदास टंडन रुग्णता के कारण उपस्थित नहीं हो पाए थे. संसद में हिंदी के लिए देवनागरी लिपि की स्वीकृति की सुचना जब उन्हें मिली तो उन्होंने रुंधे गले से कहा था मुझे ख़ुशी है की हिंदी के लिए देवनागरी लिपि को संसद ने स्वीकृति प्रदान की है, किन्तु अंकों के लिए अंग्रेजी अंकों को मान्यता दिए जाने का मुझे मृत्यु प्रयत्न दुःख रहेगा.

 

राजर्षि पुरुषोत्तमदास टंडन की मान्यता है, नव युवको के मन में विदेशी भाषा वह भाव कदापि उत्पन्न नहीं कर सकती, जो उनका मात्रभाषा करती है.

फ़्रांस में अंग्रेजी के उक्त शब्दों पर पाबंदी लगी दी गई है. जिनका अब तक उपभोग होता रहा है. वहाँ फ़्रांस में अंग्रेजी भाषा बोलना कानूनन अपराध है. इस कानून का उलंघन करने पर छह माह का कारावास और ५० हजार फ्रेंक का जुर्माना किया जाता है. चीन में एक आदेश के अनुसार बारह वर्ष तक के बच्चो को केवल मातृभाषा के माध्यम से शिक्षा दी जाती है, नेपाली लोगों का कहना है हमारी भाषा, हमारे वेश, प्राण पियारो लागे छे.

 

बिना राष्ट्रभाषा के भारत की स्वतंत्रता किसी काम की नहीं है. मैं भारत को पूर्ण स्वाधीन नहीं कह सकता, क्योकि राष्ट्रभाषा के सम्बन्ध में तो भारत ज्यों का त्यों गुलाम बना हुआ है, महात्मा गांधी

 

हिंदी दुनिया की महान भाषाओँ में से एक है. भारत को समझने के लिए हिंदी का ज्ञान अनिवार्य है. हिंदी का महत्व आज और भी बढ़ गया है, क्योकि भारत आज शिक्षा उद्योग और तकनीक के हिसाब से दुनिया के अग्रणी देशो में है.

 

डॉ, आर, एस. मेकग्रेगर, केम्ब्रिज विश्वविद्यालय में हिंदी के प्रोफेसर लिखते है.

  • हिंदी है इस स्वतंत्र राष्ट्र की भाषा
  • नवयुग के नव निर्माणों की अभिलाषा
  • कबीर, सुर, तुलसी, मीरा की जो आराध्य रही,
  • पंत निराला महादेवी की, जो साध्य रही.
  • उस राष्ट्र भाषा हिंदी को, आओ गले लगायें
  • मोह छोड़ अंग्रेजी का, हिंदी को अपनाएं.

 

भारत में संस्कृत माँ है, हिंदी ग्रहणी और अंग्रेजी नौकरानी है – फादर कामिल बुल्के

 

प्रांतवाद, भाषावाद, तुच्छ स्वार्थो आदि को छोड़कर हिंदी भाषा की प्रतिष्ठा को बढ़ाना चाहिए. उसे राष्ट्रभाषा के पद पर  आसीन किया जाना चाहिए, सरकार के साथ हम भी हिंदी को उच्च स्थान दें, तभी हम अपनी संस्कृति और हिंदी की रक्षा कर सकते है, इस सन्दर्भ में किसी कवि ने कितने मार्मिक शब्दों में कहा है.

 

करने को उत्थान देश का, हम अपनाएं हिंदी

रचने को राष्ट्रीय एकता, घर घर बोले हिंदी

बने ज्ञान विज्ञानं और वाणिज्य की भाषा हिंदी

राजनीति, विज्ञानं सभी की, हो परिभाषा हिंदी

 

बोलचाल व्यवहार सभी में, हम हिंदी अपनाये

अंग्रेजी से हिंदी को ज्यादा सम्मान दिलवाएं

अपनी माँ आखिर अपनी है क्यों हिदी को ठुकराएँ?

शिरोधार्य करके हिंदी हो, क्यों न धन्य हो जाएँ.

 

वह हिंदी ही भी जिसने, आजादी दिलवाई

जंजीरे भारत माता की हिंदी ने ही तुडवाई

भारत छोडो मुझे खून दो जितने भी नारे थे

गांधी और सुभाष बौस ने हिंदी पर वारे थे.

 

गर्व करे नल्हिंदी पर हम सब, यही देशभक्ति है

एक राष्ट्र बोले एक भाषा, यही देश भक्ति है.

सबकी भाषाएँ समृद्ध हों, हिंदी मेरी भाषा

पूरी हो मेरे भारत की, उससे आशा अभिलाषा.

 

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