हिंदी लोकोक्तियाँ | हिंदी मुहावरे | मुहावरों का संग्रह

हिंदी लोकोक्तियाँ

हिंदी लोकोक्तियाँ में अंधे के हाथ बटेर लगना (अयोग्य व्यक्ति को बिना मेहनत के लाभ प्राप्त होना) – मोहन बिलकुल नहीं पढ़ता था, कक्षा में भी कमजोर था. परन्तु प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हो गया, सचमुच अंधे के हाथ बटेर लग गई.




अन्धो में काना राजा (मूर्खों के मध्य अल्पग्य ही ज्ञानी) – रामू ही इस गाँव में दर्जा आठ पास है. गाँव के लोग उससे ही समसामयिक बाते पूछते है. ऐसा क्यों न हो, अन्धों में काना राजा.

आग लगने पर कुआ खोदना अथवा आग लगे खोदे कुआ आग बुझाय (पहले से व्यवस्था न करना) – कल परीक्षा है तो आज किताबे खरीदने निकले हो, इसी को कहते है आग लगने पर कुआ खोदना.

आम के आम गुठलियों के दाम (दोहरा लाभ उठाना) – मैं अखबार पढता हूँ और फिर उसे रद्दी में बेच भी लेता हूँ. आम के आम गुठलियों के दाम.

आये थे हरी भजन को ओटन लगे कपास (उच्च लक्ष्य लेकर आना परन्तु किसी साधारण काम ले लग जाना) – रमेश इलाहाबाद आया था विद्याअध्यन के लिए और करने लगा विद्यालय के लिए और करने लगा विद्यालय की चौकीदारी. ठीक ही कहा है. आये थे हरी भजन को ओटन लगे कपास.

एक पंथ दो काज (एक साथ दो लाभ प्राप्त करना) – प्रयाग में गंगा स्नान करूँगा और रास्ते में अपने मित्र से मिल भी लूँगा. एक पंथ दो काज.

चौर की दाढ़ी में तिनका (अपराधी स्वयं शंकित रहता है) – मैंने तुम पर तो दोष लगाया नहीं तुम क्यों सफाई देने लगे. मालूम होता है कि तुम्ही ने उसे मारा है. चोर की दाढ़ी में तिनका.

छोटे मुँह बड़ी बात (बहुत बढ़-बढ़ कर बाते करना) – परशुराम ने लक्ष्मण से कहा. है राजकुमार, संभलकर बात कर. छोटे मुँह बड़ी बात शोभा नही देती.

अंधे के आगे रोना अपना दीदा खोना (जिसको अपने से सहानुभूति नही है उसके सामने अपना दुखड़ा रोना व्यर्थ है) – उसे तुमसे कोई सहानुभूति नहीं है, उससे फरियाद करना बेकार है. अंधे के आगे रोना अपना दीदा खोना.

आँख के अंधे नाम नैनसुख (गुण के विपरीत नाम) – घर में छदाम नहीं है, नाम है करोड़ी मॉल. आँख के अंधे नाम नैनसुख.

अपनी-अपनी डफली, अपना-अपना राग (भिन्न लोगो के भिन्न मत) – सब एक साथ मिल कर काम करो. अपनी अपनी डफली अपना-अपना राग अलापना छोड़ों तभी देश का कल्याण हो सकता है.

आगे नाथ न पीछे पगहा (किसी प्रकार का अंकुश न होना) – रमेश के माँ बाप तो है नहीं उसकी इच्छा होती है तो स्कूल जाता है, जब चाहता है बाजार में घूमता है. ऐसा क्यों न हो आगे नाथ पीछे न पगहा.

उखली में सर दिया तो मूसल का डर क्या (किसी कठिन काम के प्रारम्भ कर देने पर विघ्न बाधाओं की चिंता न होना) – लड़ाई में जाने का आदेश प्राप्त कर मुझे कोई घबराहट नहीं है. यह चिंता तो मैंने उसी दिन छौड़ दी थी, जिस दिन सेना की नौकरी स्वीकार की. उखली में सर दिया तो मसूल से क्या डरना.

एक थाली के चट्टे बट्टे (एक ही जैसे दुर्गुण वाले) – इन दोनों में से एक चोर है, दूसरा जुआरी. दोनों एक ही थाली के चट्टे बट्टे है.

गरीबी में आटा गीला (विपत्ति पर विपत्ति आना) – दो माह से वेतन नहीं मिला. आज साइकल चोरी चली गई. गरीबी में आटा गीला.

हिंदी लोकोक्तियाँ – कभी गाड़ी नाव पर कभी नाव गाड़ी पर (स्थिति कभी कभी बिलकुल बदल जाती है) – बचपन में आनंद रमेश के घर नौकर था, आज रमेश आनंद का नौकर है. कभी गाड़ी नाव पर, कभी नाव गाडी पर.

कहाँ राजा भोज कहाँ गंगू तेली (दो व्यक्तियों की स्थिति में बहुत अंतर होना) – श्यामजी हिंदी साहित्य के जाने माने लेखक और कवि है, प्रकाश जैसे कल के छोकरे से उनका क्या मुकाबला. कहाँ राजा भोज कहा गंगू तेली.

काटों तो खून नहीं (भय से सन्न रह जाना) – मालिक का सौ रूपये का नोट नौकर के हाथ से छुटकर अंगीठी में गिर गया और जलकर राख हो गया. भय से उसकी दशा ऐसी थी जैसे काटों तो खून नही.

काबुल में क्या गधे नहीं होते (अच्छी जगह पर साधारण तथा तुच्छ वस्तुए भी मिलती है) – तुम तो कहते थे कि कलेक्टर साहब के यहाँ सभी बड़े अफसर है, लेकिन उनका एक लड़का कचहरी में क्लर्क है. इस पर राम ने कहा अरे तो उसमे आश्चर्य की कौन सी बात है? क्या काबुल में गधे नहीं होते?

खोदा पहाड़ निकली चुहिया (अत्यधिक परिश्रम से नगण्य लाभ) – ट्यूटर से पढने और रात दिन परिश्रम करने के बाद तुम्हे तृतीय श्रेणी ही मिली. खोदा पहाड़ निकली चुहिया.

मुद्दई सुस्त गवाह चुस्त (जिसका कार्य हो वह प्रयास न करे और दूसरे उसके लिए अधिक परिश्रम करे) – कमिश्नर साहब के यहाँ तुम्हे नौकरी नहीं मिली तो मैं क्या करूँ. मैं ही तुम्हारे लिए उनसे मिन्नत करता रहा और तुम एक बार न बोले, मुद्दई सुस्त गवाह चुस्त.

जल में रहे मगर से बैर (जिसके आश्रय में रहना है उससे बिगाड़ कर निर्वाह नहीं हो सकता) – सुनो भाई मैं मानता हूँ तुम्हारा अफसर तुम्हे सता रहा है. लेकिन सब और उसकी बुराई तुम्हारे हित में नही होगा. इससे जल में रहे मगर से बैर की कहावत चरितार्थ होगी.

दबी बिल्ली चूहे से कान हटाये (पल्ला कमजोर होने पर बलवान व्यक्ति भी कमजोरो की खरी खोटी सुन लेता है) – दरोगाजी के भय से कोई उनके सामने बोलता भी न था. जब से वे रिश्वत लेते हुए पकडे गए है. जिसके मन में आता है, उनके सामने बकता रहता है. बेचारे वे भी आँखे नीचे किये हुए सुन लेते है. करे ही क्या, दबी बिल्ली चूहे से कान कटाए.

दीवारों के भी कान होते है (गुप्त बात छिपी नहीं रहती) – मैं यह बात यहाँ नहीं कहूँगा. एकांत में चलों. जानते नहीं दीवारों के भी कान होते है.

हिंदी लोकोक्तियाँ – दूध का दूध पानी का पानी (न्याय करना) – बिरजू पर हत्या का आरोप था, पर था वह बेकसूर. लोग समझते थे कि फांसी हो जाएगी, लेकिन जज ने दूध का दूध पानी का पानी करते हुए उसे छोड़ दिया.

निर्बल के बल राम (जिसका कोई सहारा नही, उसकी ईश्वर सहायता करता है) – सभी के पास कोई न कोई सिफारिश थी लेकिन चुनाव हुआ तो विजय का, जिस बेचारे के पास कोई सिफारिश न थी. ठीक ही है निर्बल के बल राम.

भागते भूत की लंगोटी भली (कुछ न मिलने से जो भी मिल जाए वही अच्छा) – सेठ हरीराम का तो दिवाला निकल गया. मेरे दस हजार रुपये में से उसने तीन हजार लौटा दिए. मुझे तो संतोष है. भागते भूत की लंगोटी भली.

मन चंगा तो कठोती में गंगा (यदि व्यक्ति का मन शुद्ध है तो तीर्थस्थान को जाने की जरुरत नहीं) – शरीर अस्वस्थ है तो अमावस्या पर प्रयाग जाने की क्यों सोच रहे हो. घर पर ही स्नान कर लेगा. ह्रदय शुद्ध होना चाहिए. मन चंगा तो कठौती में गंगा.

होनहार बिरवान के होत चीकने पात (होनहार पुरुष के लक्षण बचपन में ही प्रकट हो जाते है)गांधीजी बचपन से ही माता पिता के भक्त, सत्यनिष्ठ और अहिंसा के मानने वाले थे. आगे चलकर विश्व की महान विभूतियों में उनकी गणना होने लगी. ठीक ही है, होनहार बिरवान के होत चीकने पात.

हिंदी लोकोक्तियाँ – आकाश से गिरा खजूर पर अटका (अत्यधिक कठिनाई से काम पूर्ण होने पर बीच में बाधा पड़ जाना) – हीरालाल का स्कूटर चौरों से प्राप्त हो गया, लेकिन अब पुलिस के संरक्षण में है, न जाने कब मिलेगा. आकाश में गिरा खजूर पर अटका.

एक और एक ग्यारह होते है (मेल से शक्ति में वृद्धि होती है) – प्रत्येक मनुष्य को देश के हित में स्वयं लगना चाहिए, क्योकि एक और एक ग्यारह होते है.

का वर्षा जब कृषि सुखाने (अवसर समाप्त होने पर प्रयास करना बेकार है) – पुलिस जब तक आई, तब तक बदमाश भाग चुके थे. पुलिस को देखकर मुहल्लेवालों ने कहा, “का वर्षा जब कृषि सुखाने”

हिंदी लोकोक्तियाँ – थोथा चना बाजे घना (गुणहीन व्यक्ति अधिक प्रदर्शन करता है) – अशिक्षित होने पर भी मोहन बहुत ज्ञानी बनता है. सच है थोथा चना बाजे घना.

डूबते तो तिनके का सहारा (विपत्ति काल में थोड़ी सी मदद बहुत होती है) – भाई तुम्हारे इस थोड़े से धन ने मुझ डूबते तो तिनके का सहारा दिया है.

सीधी ऊँगली से घी नही निकलता है (सीधेपन से काम नही चलता) – पिता की बार – बार चेतावनी का पुत्र पर कोई प्रभाव नही पडा, तब पिता बोले “मैं समझ गया, सीधी ऊँगली से घी नही निकलेगा”

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दूर के ढोल सुहावने होते है (दूर की वस्तु अच्छी लगती है) – इस विद्यालय की अच्छी पढाई की प्रशंसा सुनकर मैंने दाखिला लिया था. परन्तु यहाँ पर पढाई पर तो कोई ध्यान ही नही जाता. यह तो दूर के ढोल सुहावने वाली बात हुई.

नक्कारखाने में तूती की आवाज कौन सुनता है (बड़ों के समक्ष छोटों को कोई नही पूछता है) – आजकल धनवान पैसे के बल पर सब कार्य करा लेते है, जबकि निर्धन असफल रहते है. सच है, नक्कारखाने में तूती की आवाज कौन सुनता है.

हिंदी लोकोक्तियाँ – नाच न जाने आँगन टेढा (स्वयं की अनुभवहीनता का दूसरों पर दोष मढना) – कमजोर विद्यार्थी परीक्षा में प्रशन के हल न होने पर यही कहते है कि प्रश्न पाठ्यक्रम के बाहर से दिए है. यह तो वही बात हुई नाच न जाने आँगन टेढा.

बन्दर क्या जाने अदरक का स्वाद (वस्तु विशेष का महत्व मुर्ख नही समझता) – तेल साबुन बेचने वाला दुकानदार संगीत के महत्व को क्या समझे? बन्दर क्या जाने अदरक का स्वाद.

साँप छछुन्दर की गति होना (मुसीबत में पड़ जाना) – मैं नौकरी करने का इच्छुक नही हूँ तथा घर पर भी खाली बैठना नही चाहता. इस समय मेरी साँप छछुन्दर जैसी दशा है.

सौ सुनार की एक लुहार की (बलवान की चोट कमजोर की सैकड़ों चोटों के बराबर होती है) – मोहन ने राकेश से अत्यंत दुखी मन से कहा. तुम मुझे अधिक परेशान मत करों. याद रखो सौ सुनार की एक लुहार की होती है.

हाथ कंगन को आरसी क्या (प्रत्यक्ष को प्रमाण की जरुरत नहीं) – प्रस्तुत हाई स्कूल हिंदी पराग अन्य पुस्तकों की अपेक्षा उत्तम है हाथ कंगन को आरसी क्या स्वयं पढ़कर देख लीजिये.

हिंदी लोकोक्तियाँ – अब पछताए होत क्या चिड़ियाँ चुग गई खेत (अवसर निकल जाने के बाद पश्याताप व्यर्थ होता है)

जब आवे संतोष धन, सब धन धुरि समान – संतोष ही सबसे बड़ा सुख है.

जब नीके दिन आइहें बनत न लगिहे देर – अनुकूल समय आने पर सब कुछ ठीक हो जाता है.

जाके पैर न फटी बिवाई, सो क्या जाने पीर पराई – स्वयं अनुभव न होने पर दूसरे के कष्ट का अनुमान नही होता.

जिन ढूंढा तिन पाइयाँ, गहरे पानी पैठ – अधिक प्रयास करने पर निश्चय ही सफलता मिलती है.

दिन दस के व्योहार में, झूठे रंग न भूल – क्षण भंगुर जीवन की चमक दमक में पड़ना ठीक नही.

दुविधा में दोउ गए, माया मिली न राम – दुविधा में पड़ा रहने वाला व्यक्ति सफलता प्राप्त नही कर सकता.

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