Earth Changing पृथ्वी क्यों बदल रही है


Earth Changing पृथ्वी का बदलता स्वरुप और प्रक्रिया Changing Face of The Earth

पृथ्वी की सतह पर निरंतर परिवर्तन होते रहते है. ये परिवर्तन आतंरिक और बाह्रा शक्तियों के कारण होते है. ज्वालामुखी तथा भूकंप आदि अनेक ऐसी आंतरिक शक्तियां है जो पृथ्वी के धरातल के निचे क्रियाशील रहती है. इसके फलस्वरूप Earth Changing पृथ्वी के धरातल पर अनेक परिवर्तन होते है.




जैसे – कहीं पर धरातल धँस जाता है तो कहीं पर ऊपर को उठ जाता है. कहीं पर वलय मोंड पड़ जाते है. तो कहीं दरारें उत्पन्न हो जाती है. इन सब शक्तियों और प्रक्रियाओं को निर्माणकारी प्रक्रम के नाम से जाना जाता है. इसके विपरीत कुछ बाह्रा शक्तियां होती है जो धरातल के ऊपर या बाहर क्रिया करती है और शनै:- शनै: स्थलरूपों को तौड फौड़ कर अथवा घिसकर कमजोर बना देती है. इसके अतिरिक्त मनुष्य भी वर्तमान स्थलरूपों में अजीबोगरीब परिवर्तन कर देता है.

Earth Changing पृथ्वी का बदलता स्वरुप और प्रक्रिया Changing Face of The Earth

Earth Changing पृथ्वी का बदलता स्वरुप और प्रक्रिया Changing Face of The Earth

इस अध्याय में पृथ्वी के धरातल पर बाह्रा शक्तियों के प्रभाव का वर्णन है. अपक्षय, अपरदन तथा निक्षेपण बाह्रा शक्तियां है. पृथ्वी के ऊपर होने वाले परिवर्तनों के लिए ये उत्तरदायी है. ये बाह्रा प्रक्रियाए कहलाती है.

 

बाह्रा प्रक्रम

बाह्रा प्रक्रम से अभिप्राय पृथ्वी की धरातल Interior Structure पर परिवर्तन करने वाली बाह्रा शक्तियों से है. इस बाह्रा शक्तियों को अपरदन का कारण भी माना जाता है. बहता हुआ पानी या नदी, वायु, हिमानी, लहरे, आदि इन बाह्रा शक्तियों के अंतर्गत आते है.

पृथ्वी के धरातल को कमजोर क्षीण बंनाने या नीचा करने का कार्य अनाच्छादन कहलाता है. अनाच्छादन शब्द का अर्थ है. अनावरण को हटाना. अनाच्छादन दो प्रकार के होते है.

 

निम्नीकरण या नीचा करना

पूंजीकरण या निक्षेपण. इसके द्वारा धरातल के निचले भागों में पदार्थ एकत्रित किये जाते है.

अनाच्छादन के अंतर्गत अपक्षय अपरदन की दो प्रक्रियाए सम्मिलित होती है.

 

अपक्षय के कारण

अपक्षय के कारण ही धरातल के शैलों में भौतिक और रासायनिक परिवर्तन होते है. इन परिवर्तनों के फलस्वरुप शैलों में वघटन होता है या भोतिक रूप से टूट फुट और रासायनिक रूप से विखंडन होता है. विघटन की भौतिक प्रक्रिया के फलस्वरुप शैलों की टूट-फूट होती है और रासायनिक क्रिया के कारण नए खनिजों का निर्माण होता है.

 

अपक्षय की क्रिया

क्षय की क्रिया के निरंतर होने से शैलें ढीली पड़ जाती है जो मिटटी के निर्माण में बहुत सहायक होती है. ये ढीले शैल पदार्थ रेंग्रोलिथ कहलाते है. अपक्षय की क्रिया पर तापमान, वायु वर्षा और आद्रता आदि जलवायु, चट्टानों की संरचना और गठन, जीव-जंतु, पेड-पौधों बेक्टीरिया और सबसे अधिक मनुष्यों का प्रभाव पड़ता है.

 

अपक्षय की जलवायु

अपक्षय को जलवायु बहुत अधिक प्रभावित करती है. क्योकि जलवायु के तापमान और वर्षा को दो प्रमुख तत्व होते है. तापमान के देनिक परिवर्तनों के कारण चट्टानें बार-बार फैलती और सिकुड़ती है जिसके परिणामस्वरूप उनका बार-बार विघटन होता है. इसमें चट्टानों का कणों के रूप में बिखरना तथा पिंड विघटन होता है.

यह प्रक्रिया मरुस्थलों और अर्धमरुस्थलों में अधिक होती है. इनको भौतिक या यांत्रिक अपक्षय के नाम से जाना जाता है. जहाँ पाला अधिक पड़ता है. वहाँ यह क्रिया उच्च अक्षांशों में होती है. पाले की क्रिया में जल बर्फ में बदलता है और फिर बर्फ जल में बदल जाता है. यह क्रिया पुन: पुन: होती रहती है जिससे चट्टानों के टुकड़े टूट जाते है. इसके ठीक विपरीत आर्द्र क्षेत्रों में रासायनिक अपक्षय अधिक होता है. वर्षा का जल आक्सीजन और कार्बनडाई आक्साइड गैसों के साथ मिलकर एक विशिष्ट घोलक बन जाता है. इनमें शैलों का विघटन बहुत अधिक होता है. लोहे पर जंग आक्सीकरण के कारण ही लगती है.

पौधों तथा जीव जंतुओं की रासायनिक प्रक्रम का भी धरातलीय शैलों का अपक्षय करने में बहुत योगदान है. पौधों की जड़ें, जैविक अम्ल, कैचुए, चूहे, खरगोश आदि शैलों को विघटित कर देते है  कुछ नखदंती जंतु शैलों को खोदकर ढीला कर देते है. जीवों और पौधों द्वारा होने वाली अपक्षय क्रिया का जैविक अपक्षय कहते है.

शैल संरचना भी अपक्षय को प्रभावित करने वाला कारक है. शैलों का गठन उन्हें भौतिक और रासायनिक अपक्षय के प्रति संवेदनापूर्ण बना देता है. जैसे क्वाटरज शैल अपक्षय के प्रतिरोधी होते है, जबकि चूना पत्थर सरलता  से विघटित तथा अपघटित नहीं होता है.

अपक्षय एक ऐसी भौतिक प्रक्रिया है जो शैलों को उनके स्थान पर प्रभावित करती है, परन्तु क्रिया में अपक्ष्यित शैल पदार्थ का स्थानांतरण नहीं होता है.

 

अपरदन के बारे में

अपरदन शब्द का अर्थ है – घिसना जब शैल अपक्षय द्वारा कई बार टूट जाते है, तब जल गतिशील हिम, पवन या गुरुत्वाकर्षण इन छोटे छोटे कणों को एक स्थान से दुसरे स्थान पर एकत्रित कर देते है. इस प्रक्रिया को ही अपरदन कहते है.

अपक्षय और अपरदन की क्रियाये निरंतर होती रहती है. ये क्रियाए लगभग एक साथ ही होती है. अपरदन की प्रक्रिया एक गतिशील प्रक्रिया है. इसमें गतिशील साधनों द्वारा अपरदित पदार्थों को स्थान्तरित कर दिया जाता है. अपक्षय क्रिया द्वारा अपरदन क्रिया के कार्य सरल हो जाते है.

अनाच्छादन के मुख्य कारक है बहता हुआ जल, हिमनदी (हिमानी) भूमिगत जल, पवन और सागरीय जल इन साधनों के द्वारा पदार्थ का परिवहन तथा निक्षेपण होता है.

 

बहता हुवा पानी (जल)

बहता हुवा जल या प्रवाही जल अनाच्छादन का सबसे प्रभावी कारक है. बहता हुआ जल या नदियाँ शैलों को शीघ्रता से तोडती है. उन्हें अपने साथ बहाकर ले जाती है. नदियाँ प्रायः पर्वतीय क्षेत्रो या पठारों से निकलती है. वे मैदानों से बहती हुई अंत: सागरों या महासागरों में गिरती है. पर्वतीय क्षेत्रों में तेज ढलान के कारण नदियों की गति तेज होती है. इसलिए अनाच्छादन की क्रिया भी अधिक होती है. जब ये मैदानों में पहुचती है तो इनका ढाल कम हो जाता है. ये नदियाँ अपनी तलहटी में या घाटी के किनारों पर अपरदित पदार्थ को एकत्र करने लगती है.

 

इस प्रकार नदियां दो प्रकार के स्थलस्वरूप बनाती है.

पहला – अपरदनात्मक

दूसरा – निक्षेपात्मक

 

समुद्र के समीप एक आने तक नदियों की ढाल बहुत ही कम रह जाता है. अत: नदियाँ अपने साथ अपरदित पदार्थों या अवसादो को आगे नहीं ले जाती है और उन्हें वही जमा कर देती है. नदियों के मुहाने के पास जलोढ़ मिट्टी के इकठ्ठा होने से यहाँ डेल्टा बन जाते है.

डेल्टा वास्तव में जलोदक द्वारा बना एक त्रिभुजाकार भू-भाग होता है. इसकी आकृति त्रिभुजाकार होती है. विश्व का सबसे बड़ा डेल्टा गंगा तथा ब्रह्मपुत्र नदियों के मुहाने पर स्थित है जो सुदर वन के नाम से प्रसिध्द है. यह बांग्लादेश में स्थित है. इसके विपरीत संयुक्त राज्य की मिसिसिपी नदी का डेल्टा पंजाकार है.

यह एक उल्लेखनीय तथ्य है कि सभी नदियाँ डेल्टा नहीं बनाती है. जो नदियाँ पहाड़ी या पठारी क्षेत्रों में संकरी घाटी से होकर बहती है. वे ज्वारनदमुख का निर्माण करती है. भारत के पूरब की और से बहने वाली मुख्य नदियाँ मथनदी, गौदावारी, कृष्णा और काबेरी अपने मुहानों पर उपजाऊ डेल्टा बनाती है.

 

भूमिगत जल Earth Changing Fact

पृथ्वी के धरातल के निचे शैल संस्तरों में एकत्रित जल को भूमिगत जल कहते है. यह जल धरातल पर वर्षा होने पर शैलों के सूक्ष्म छिद्रों या दरारों से रिसकर भूमि के निचे इकठ्ठा हो जाता है. भूमिगत जल की प्राप्ति हमें कुओं, नल कूपों स्त्रोतों तथा पातालतोड़ कुँओं के माध्यम से होती है. इसकी ऊपरी सतह को ही जल स्तर कहते है. जल स्तर की गहराई विभिन्न स्थानों पर भिन्न भिन्न होती है.

भूमिगत जल की चल अति मंद (धीमी) होती है, लेकिन यह जल पत्थर, चूना, शैल-लवण, खड़िया आदि घुलनशील शैलों को अतिशीघ्र घोल देता है. ये टूटे शैलों का अपरदित नहीं कर सकता.

 

जल के प्रकार Earth Changing Fact

भूमिगत जल विभिन्न प्रकार की स्थलाकृतियों का निर्माण करता है. उन आकृतियों को ही सामूहिक रूप से कास्ट स्थलाकृति कहा जाता है. इसका नामकरण कास्टयगोस्लोविया के कास्ट क्षेत्र पर हुआ है. यहाँ भूमिगत जल द्वारा विकसित स्थ्लाकृतियाँ बहुत अधिक है. ये कास्ट आकृतियाँ मुख्य रूप से चूना पत्थर शैलों पर विकसित होती है.

 

इन स्थालाकृतियों को दो भागों में विभाजित किया गया है.

पहला – निक्षेपात्मक आकृतियों के अंतर्गत अनेक प्रकार की स्त्म्भुमा आकृतियाँ सम्मिलित है. इनमे प्रमुख आकृतियाँ आकाशीय स्तम्भ एवं पातालीय स्तम्भ है. कदराओं की छत तथा चूने द्वारा बनाई गई ये आकृतियाँ बहुत ही सुन्दर प्रतीत होती है.

दूसरा – अपरदनात्मक आकृतियों में कन्दरा (गुफा), घोल रन्ध्र, कास्ट खिड़की, टेरा रोसा, अंध घाटी, पोलिए, युबाला प्राकृतिक पुल आदि सम्मिलित है.

 

हिमानी या हिमनदी Earth Changing Fact

हिमनदी का निर्माण हिम रेखा के ऊपर हिम (बर्फ) के इकट्ठा होने पर होता है. हिम रेखा से आशय उस काल्पनिक रेखा से है जिस पर हमेशा हिम जमी रहती है. हिमानी की निचली सीमा का निर्धारण हिम रेखा द्वारा ही होता है. हिमानियाँ मुख्यत: निन्म अक्षांशों में स्थित उच्च पर्वतीय क्षेत्रों और उच्च अक्षांशों पर पाई जाती है.

यह सदेव बर्फ से ढकी रहती है साथ ही यहाँ पर बर्फ की मोटी परतें बनती रहती है. सबसे अधिक हिमानियाँ हिमाचल आल्पस पर्वतों तथा ग्रीनलैंड और अन्टार्कटिका में प्राप्त होती है.

९६% से भी अधिक हिमानियाँ मोटी परत के रूप में ग्रीनलैंड और अन्टार्कटिका में विद्यमान है. अन्टार्कटिका के हिम की मौटाई लगभग ४२७० मीटर है. हिमानियों की निचली सतह समुद्र तल से २४९० मीटर से भी अधिक गहराई पर स्थित है.

वर्तमान समय में पृथ्वी के लगभग १०% क्षेत्र पर हिमानियों का विस्तार हुआ है. हिमानियों की गति धीमी है. अधिकाशं हिमानियों की गति १ मीटर प्रतिदिन से भी कम है. इतनी धीमी गति होने के बावजूद हिमानियाँ विशाल शिलाखंडों को भी बहाने तथा स्थानांतरित करने में समर्थ है.

हिमानी के प्रमुख कार्य अपरदन, परिवहन व निक्षेप है. हिमानियों द्वारा निर्मित अपरदनात्मक आकृतियाँ, हिमानी घाटी, लटकती घाटी, सर्क, श्रंग, अरेत तथा फियोर्ड है. हिमानी घाटी अंग्रेजी भाषा के वर्ण “U” के आकार की होती है.

 

वायु या पवन Earth Changing Fact

मरुस्थलो में पवन हिमाच्छादित आद्रत क्षेत्रों की अपेक्षा अधिक सक्रिय होती है. पवन शैलों का अपरदन, ढीले असंठित पदार्थों का परिवहन करती है लेकिन इसमें कठोर शैलों का अपरदन करने की दक्षता कम होती है.

पवन के अपघर्षण, संनिघर्षण तथा अपवाहन ये तीन अपरदन होते है. अपघर्षण का अर्थ घिसना, संनिघर्षण का अर्थ टूट-फूट होना एवं अपवाहन का अर्थ उड़ाना है. पवन द्वारा निक्षेपात्मक कार्य से अनेक आकृतियाँ बनती है जिसमे बालुका स्तूप मुख्य है. ये विभिन्न प्रकार के होते है.

जैसे – बरखान, अनुदेधर्य, उर्मिका, रेतीली चादर और व्हेल बैक. बालुका स्तूप अस्थिर होते है इन्हें पवन उड़ाकर ले जाती है, अत: ये सदेव स्थान्नातरित होते रहते है.

निक्षेपात्मक आकृतियों में लोयस भी एक महत्वपूर्ण आकृति है. चीन में लोयस के विशाल निक्षेप पाए जाते है. ये लोयस गोबी मरुस्थल से उड़ाई गई धुल और रेत के निक्षेप है. चीन में इस लोयस निक्षेपों में मकान का निर्माण कर लिया गया है.

 

सागरीय लहरें Earth Changing Fact

सागरों तथा महासागरों में वायु द्वारा ही लहरों का विकास होता है. सागरों के तट पर लहरों द्वारा अनेक आकृतियाँ बनती रहती है.

महासागरों में उत्पन्न होने वाली लहरों को सुनामिस कहते है. भूकंप, भूस्खलन तथा ज्वालामुखियों के कारण ये उत्पन्न होती है. इन्हीं लहरों को ज्वारीय तरंग कहा जाता है. ये तरंगे बहुत ही ऊँचीं-ऊँचीं होती है. ये तरंगे सामान्यतया १६० किमी तक लम्बी तथा ६५० किमी प्रति घंटा की गति से चलती है.

महासागरीय लहरों की अपरदन की क्रिया के फलस्वरूप अनेक प्रकार की आकृतियाँ बनती है जिनमे सागरीय कगार, अपरदित चबूतरे, कन्दराए, मेहराब और वृत मुख्य है. इसके अतिरिक्त समुद्री पुलिन, भुजीह्रा, टोम्बालो, भित्तियाँ और द्वीप आदि निक्षेपात्मक आकृतियाँ बनती है. ये सभी प्रकार की आक्रतियाँ सागर तट के सहारे बनती है.

सागरीय पुलिन लहरों द्वारा घर्षित चबूतरों पर कंकड़, पत्थर और रेत आदि के निक्षेप बन जाते है. कालान्तर में उन पर ताड़ अथवा कोई अन्य वृक्ष उग आता है. इन पुलिनों पर पर्यटन स्थान (केंद्र) बन जाते है. भारत में मेरीन (चेन्नई) कोवालम बीच (केरल) तथा जुहू बीच (मुंबई) ऐसे ही पर्यटन केंद्र है.

 

अनाच्छादन के प्रभाव Earth Changing Fact

अनाच्छादन की क्रिया के परिणामस्वरूप पर्यावरण पर अनेक दुष्परिणाम हुए है. वन विनाश, दोषपूर्ण कृषि पध्दति, पर्वतों पर सड़क बनाना, अत्यधिक पशुचारण, इमारतें तथा कारखाने बनाने से पर्यावरण दूषित होता है. साथ ही जैविक विविधता का भी ह्रास होता है और जीवो के अस्तिव को भी खतरा हो जाता है.

 

मृदा या मिट्टी Earth Changing Fact

धरातल की ऊपरी सतह जो छोटे और असंगठित कणों वाली एक परत से ढकी है, मृदा या मिट्टी कहलाती है. मिट्टी की यह परत वनस्पति को उगाने का माध्यम है. मिट्टी के निर्माण की प्रक्रिया बहुत ही धीमी है. जैसे ही कोई शैल जल या वायु के सम्पर्क में आती है तो यह प्रक्रिया आरम्भ होती है. मिट्टी के निर्माण की इस प्रक्रिया को मृदा जनन कहते है. यह प्रकृति में होने वाली सतत प्रक्रिया है.

 

मिट्टी की उत्पत्ति को अनेक कारक  Earth Changing Fact प्रभावित करते है. जैसे जलवायु, पैतृक शैलें, स्थलाकृति, भौतिक, रासायनिक तथा जैविक प्रक्रम.

मिट्टी के तत्व

मिट्टी का निर्माण चार तत्वों से मिलकर हुआ है.

अजेविक या खनिज तत्व

जैविक तत्व

जल

वायु

इनमे से प्रत्येक के तत्व की प्रचुरता अथवा क्रिया मिट्टी में किसी न किसी रूप में उपस्थित रहती है. जीवधारियों के मरने, सड़ने या गलने से ह्रामस नामक गहरे रंग का पदार्थ करता है. दलदली और आद्र प्रदेशों की मिटटी में ह्रामस की मात्रा अधिक होने के कारण यहाँ की मिट्टी अधिक उपजाऊ होती है.

 

मिट्टी की उत्त्पत्ति

मिट्टी के निर्माण की प्रक्रिया इतनी धीमी है कि धरातल पर एक इंच की परत बनने में कई हजार वर्ष लग जाते है. शैलों के बड़े भाग अपक्षीण या अपक्षयित होते है. यह प्रक्रिया तब तक चलती रहती है जब तक कि शैलों का महीन चुरा नहीं हो जाता है.

 

मृदा पाशविका या परिच्छेदिका Earth Changing Fact

मिट्टी की वह उध्वार्धर काट जिसमे सभी संस्तर दिखाई देते है, मृदा परिच्छेदिका कहलाती है. अधिकतर मृदा परिच्छेदिकाओ में (O) संस्तर और खनिज संस्तर ये दो प्रकार के संस्तर होते है. जैविक संस्तर का निर्माण पौधों और जीवों के मृत पदार्थ के एकत्रण से होता है.

उत्त्पत्ति के स्थान के अनुसार मिट्टियाँ वाहित तथा अवशिष्ट हो सकती है. प्रवाहित मिट्टियों का निर्माण अपरदन के विभिन्न साधनों द्वारा होता है. जलौढ़ और काँप मिट्टियाँ प्रवाहित और स्थान्तरित मिट्टियों का उदहारण होती है अवशिष्ट मिट्टियाँ अपने ही स्थान पर विकसित होती रहती है. काली लाल तथा लेटेराईट मिट्टी अवशिष्ट मिट्टियाँ है.

 

मिट्टी के प्रकार भारत के मुख्य रूप से छह प्रकार की मिट्टी पाई जाती है –

  1. जलोढ़ या कॉप मिट्टी
  2. काली मिट्टी
  3. लाल मिट्टी
  4. लेतेराईट मिट्टी
  5. मरुस्थलीय मिट्टी
  6. पर्वतीय मिट्टी

 

जलोढ़ मिट्टी

यह मिट्टी नदियों द्वारा भूमि पर बिछाई गई बारीक कणों वाली मिट्टी है, यह मिट्टी नदियों के किनारे पर समुद्र तटीय मैदानों में पाई जाती है. यह सर्वाधिक उपजाऊ मिट्टी होती है. अत्यधिक उपजाऊ होने से यह रबी और खरीफ की फसलों के लिए बहुत अच्छी है. नई जलोढ़ मिट्टी को खादर तथा पुराणी जलोढ़ मिट्टी को बाँगर कहते है. खादर मिट्टी, बाँगर मिट्टी से अधिक उपजाऊ होती है

काली मिट्टी

यह मिट्टी ज्वालामुखी विस्फोट तथा लावा निकलने से बनती है. यह मिट्टी भी बहुत उपजाऊ होती है. काली मिट्टी को कपास मिट्टी या रेगड़ मिट्टी भी कहते है. यह नमी को सोख सकती है. यह मिट्टी कपास के लिए उपयुक्त है. यह मिट्टी दक्कन के पठारी क्षेत्र के महाराष्ट्र तथा गुजरात में पाई जाती है.

 

लाल मिट्टी

लाल मिट्टी पुराने रवेदार कायांतरित चट्टानों के टूटने से बनती है. यह चिकनी मिट्टी तथा रेतीली मिट्टी से मिलकर बनती है. यह लाल रंग की होती है क्योकि इसमें लोहे तत्व के कण होते है. यह मिट्टी कम उपजाऊ होती है. इस मिट्टी में उर्वरकों को मिलाकर खेती की जाती है. लाल मिट्टी तमिलनाडु के कुछ भागों, कर्नाटक, दक्षिण-पूर्वी महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के कुछ भागो में पाई जाती है.

 

लेटेराईट मिट्टी

लेटेराईट मिट्टी अधिक वर्षा वाले भागों में पाई जाती है. यह मिट्टी चट्टानों के कटाव से बनती है. इस मिट्टी में अम्लता पाई जाती है क्योकि यह अधिक वर्षा के कारण चट्टानों के टूटने से बनती है. यह खेती के लिए बहुत उपयुक्त नहीं होती. यह मिट्टी अधिक वर्षा वाले पश्चिमी घाट के क्षेत्रों में और उत्तर पूर्व के पहाड़ी राज्यों में पाई जाती है.

 

मरुस्थलीय मिट्टी

यह मिट्टी पश्चिमी राजस्थान में पाई जाती है इस मिट्टी में ह्रामस की मात्रा कम होती है तथा यह कृषि के लिए उपयुक्त नहीं होती. हालाँकि सिचाई की व्यवस्था होने पर इस मिट्टी में कृषि भी अच्छी की जाती है.

 

पर्वतीय मिट्टी

ये मिट्टी हिमालय जैसे ऊँचें क्षेत्रों में पाई जाती है. इसमें लौह तत्व की अधिकता तथा चूने की कमी होती है. अत्यधिक वर्षा वाले पर्वतीय क्षेत्रों में चाय की खेती की जाती है.

 

मिट्टी का अपरदन के कारण और पृथ्वी में होने वाला परिवर्तन Earth Changing Fact

मिट्टी का अपरदन एक गंभीर विश्व्यापी समस्या है. अत्यधिक वर्षा होने से आने वाली बाढ़ और वायु द्वारा इसका अपरदन होता है. वर्षा ऋतू  में होने वाली वर्षा से नदियों में बाढ़ आने से अवनालिका अपरदन होता है. इसके परिणामस्वरूप धरातल पर अनेक बीहड़ एक उदाहरण है. मरुस्थल में पवन द्वारा रेत उड़ाकर समीपवर्ती मैदानों में एकत्रित हो जाती है.

फलस्वरूप वे क्षेत्र वायु द्वारा अपरदन के कारण अनुपजाऊ हो जाते है. राजस्थान की रेत हरियाणा, पंजाब, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मैदानी भागों में बिछाई गई है जिससे ये क्षेत्र अनुपजाऊ हो जाते है.

वनों की अंधाधुंध कटाई, अत्यधिक पशुचारण, कृषि की अवैज्ञानिक पद्धतियां, स्थानांतरीय कृषि तथा खनन क्रियाए इसके लिए उत्तरदायी है. इससे भूमि अनुपजाऊ तथा कृषि के लिए अयोग्य हो जाती है.

भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए मिट्टी का अपरदन एक विकट समस्या है. साथ ही भारत में अपरदन की दर भी बहुत अधिक है.

 

मृदा संरक्षण और पृथ्वी में परिवर्तन Earth Changing

मृदा सबसे महत्वूर्ण प्राकृतिक संसाधन है क्योकि पृथ्वी पर सभी प्रकार के जीव मृदा पर निर्भर करते है. अत: मृदा का संरक्षण करना अति आवश्यक है. भूमि के कटाव को रोकने तथा मृदा संरक्षण के निन्लिखित उपाय है.

वनीकरण और वृक्षारोपण कार्यक्रम के अंतर्गत मृदा अपरदन क्षेत्रों में बड़ी संख्या में वृक्षारोपण किया जाना चाहिए.

वृक्षों को अंधाधुंध काटने तथा चरागाहो में पशुओं की अधिक चराई की प्रवृत्ति पर नियंत्रण लगाने के कदम उठाये जाने चाहिए.

जल प्रवाह को नियंत्रित या नियमित करने के लिए ढलान वाली भूमि और तीव्र प्रवाहित नदियों पर तटबंध तथा अवरोध बनाये जाने चाहिए.

नदियों पर बाँध बनाकर बाढ़ को रोका जाना चाहिए.

फसलों के चक्रानुक्रम द्वारा तथा खाद या रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग करके मृदा की उर्वरता को बढ़ाया जाना चाहियें.

 

महत्वपूर्ण तथ्य Earth Changing Fact

  1. धरातल पर आंतरिक और बाह्रा दो शक्तियों द्वारा परिवर्तन होता है.
  2. अपक्षय, अपरदन एवं निक्षेपित बाह्रा क्रियाए होती है.
  3. अनाच्छादन की अपक्षय और अपरदन दो क्रियाए होती है.
  4. मृदा का निर्माण अपक्षय के कारण होता है.
  5. अपक्षय और अपरदन की क्रियाएँ मुख्य रूप से जल, पवन, हिमनदी तथा समुद्र की तरंगो के द्वारा होती है.
  6. मिट्टी के निर्माण की प्रक्रिया बहुत ही धीमी है.
  7. मृत जीवों के सड़ने गलने से ह्रामूस का निर्माण होता है. यह मिट्टी को उर्वर बनाता है.
  8. निर्माण के आधार पर मिट्टी विविध प्रकार की होती है.
  9. पृथ्वी पर सभी प्रकार के जीव मृदा पर निर्भर करते है. मृदा का संरक्षण करना अति आवश्यक है.

 

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