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Hindi Stories हिंदी कहानी संग्रह का स्वरुप, Hindi Story के तत्व एवं विशेषताएँ

हिंदी गद्य साहित्य में कहानी का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है, कथा सुनने की प्रवृति मनुष्य की सहज प्रवृति है. संसार के सभी प्राचीन साहित्य में कहानियों की वृहत परम्परा मिलती है. मनुष्य ने जबसे बोलना सिखा तभी से यह किसी घटना की अभिव्यक्ति करने लगा और यहीं से Hindi Stories हिंदी कहानी का जन्म हुआ. कहानी में एक घटना चरित्र या समस्या को केंद्र में रखा जाता है.

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Hindi Stories List

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कहानी की परिभाषा

Hindi Stories हिंदी कहानियों को किसी निश्चित परिभाषा में नहीं बाधां जा सकता किन्तु फिर भी भारतीय एवं पाश्च्यात विद्वानों ने इसे स्पष्ट करने का प्रयास किया है.

प्रेमचन्द्र के शब्दों में कहानी में बहुत विश्लेषण की आवश्यकता या गुंजाइश नहीं होती, यहाँ हमारा उद्देश्य मनुष्य को चित्रित करना नहीं वरन उसके चरित्र का एक अंश दिखाना है.

श्री चन्द्रगुप्त विघालंकार के अनुसार घटनात्मक इकहरे चित्रण का नाम कहानी है.

विश्वकवि रविन्द्रनाथ टेगोर कहानी को व्यापक स्तर पर देखते हुए मानते थे कि जीवन का प्रतिक्षण एक सारगर्भित कहानी है.

इस प्रकार कहानी एक संवेदनापूर्ण विशिष्ट दृष्टीकोण या उद्देश्य को लेकर जीवन की किसी घटना या चरित्र का रोचक व प्रभावशाली चित्रण है. कहानी में छोटे संवाद, चरित्रों की संख्या सीमित एवं स्वरूप जिज्ञासापूर्ण होना चाहिए.

 

विविध उद्देश्य व कथा वस्तु के आधार पर कहानियों का वर्गीकरण निम्नलिखित रूप में किया जा सकता है.

  • कथानक प्रधान
  • चरित्र प्रधान
  • वातावरण प्रधान
  • विविध कहानियाँ

 

कथानक प्रधान कहानी में कथातत्व के साथ ही वर्णन, इतिवृत्त को भी महत्व मिला एवं कोतुहल और प्रवाह का प्रधान्य रहा. चरित्र प्रधान कहानी में चरित्र विश्लेषण को महत्व मिला. इस दृष्टी से प्रेमचन्द्र, चन्द्रधर शर्मा गुलेरी तथा अज्ञेय की कहानियाँ प्रसिद्ध है. जैसे उसने कहा था. कफ़न एवं नंबर दस आदि.

वातावरण प्रधान कहानी में एतिहासिक वातावरण या घटनाओं को महत्व मिला. जयशंकर प्रसाद की कहानियाँ पुरस्कार, आकाशदीप, ममता, प्रेमचन्द्र की शतरंज के खिलाड़ी, गोविदवल्लभ पंत की जूठा आम इस प्रकार की ही कहानियाँ है.

विविध कहानियों में हास्य व्यंग्य तथा प्रतीकात्मकता कहानियों का सम्मिलित किया जा सकता है. प्रेमचन्द्र की मोरे रामशास्त्री, यशपाल की “कुत्ते की पूछ”, अज्ञेय की शत्रु, या हरीशंकर परसाई की कहानियाँ इसमें रखी जा सकती है.

 

Hindi Stories कहानियों के तत्व

सामान्य कहानी के छ: तत्व स्वीकार किये जाते है.

  • कथानक
  • पात्र और चरित्र-चित्रण
  • सवांद या कथोपकथन
  • देशकाल या वातावरण
  • भाषा शैली
  • उदेश्य

 

कथानक

कथानक कहानी Hindi Story की नीव होता है. Hindi Stories कहानियों की कथावस्तु एतिहासिक, पौराणिक, राजनितिक, पारिवारिक, मनोवैज्ञानिक, काल्पनिक हो सकती है. कथानक के संगठन को तीन भागों में बाटा जा सकता है.

  • आरम्भ
  • मध्य
  • चरम सीमा या अंत

कथानक का आरम्भ आकर्षक और जिज्ञासापूर्ण होना चाहिए. शीर्षक कथानक के आरम्भ में पूर्ण होना चाहिए जो विषय के अनुकूल निश्चयबोधक एवं छोटा हो.

 

Hindi Stories पात्र और चरित्र चित्रण

पात्र और चरित्र चित्रण कहानी का सबसे महत्वपूर्ण भाग है. कहानी चरित्रों के आधार पर ही आगे बढती है. प्रेमचन्द्र लिखते है. जब हमारे चरित्र इतने सजीव और आकर्षक होते है कि पाठक अपने को उसके स्थान पर समझ लेता है. तभी उसे कहानी में आनंद प्राप्त होता है. अगर लेखक ने अपने पात्रों के प्रति पाठक में यह सहानुभूति नहीं उत्पन्न करदी तो वह अपने उद्देश्य में असफल है.

पात्र सजीव और कथानक या वातावरण के अनुकूल उनकी वेशभूषा एवं भाषा होनी चाहिए. कहानी छोटी होती है. अत: उसमें पात्रों की संख्या भी सीमित होनी चाहिए.

 

Hindi Stories कथोपकथन या संवाद

संवादों के माध्यम से ही पात्र जीवंत होते है. तथा कथानक सजीव होता है. कथोपकथन पात्रों के अनुकूल, स्वाभाविक होने चाहिए. संक्षिप्त, सरल, तर्क युक्त और कोतुहल पूर्ण संवाद कहानी को प्रभावशाली बनाते है.

 

Hindi Stories देशकाल या वातावरण

कहानी में देशकाल या वातावरण का विशिष्ट महत्व है. युग के अनुसार वेशभूषा, रीतिरिवाज, विचार, भाषाशैली आवश्यक है. विशेषरूप से एतिहासिक कहानियाँ या ग्रामीण परिवेश से जुड़ीं कहानियाँ या विदेशी वातावरण पर आधारित कहानियों में इनका ध्यान रखना आवश्यक है.

 

Hindi Stories भाषा शैली

कहानी को सजीवता प्रदान करने में भाषा का विशेष महत्व है. सहज एवं सुसंगठित वाक्यविन्यास युक्त भाषा वातावरण को चित्रित करने में सहयोगी होती है. बहुत विलष्ट, तत्सम शब्दावली भाषा को बोझिल करती है तथा पाठक से दूर करती है. इसलिए आवश्यक है कि कहानी जैसी लोकप्रिय विधा में उस भाषा का राजदरबार या विशेष काल से सम्बंधित है तो भाषा उसी के अनुकूल होनी चाहिए.

 

Hindi Stories कहानी की मुख्य चार शैलियाँ प्रचिलित है.

  • एतिहासिक शैली
  • आत्मचरित शैली
  • पत्रात्मक शैली
  • डायरी शैली

 

उद्देश्य या केन्द्रीय भाव

कथा साहित्य का साधारण उद्देश्य मनोरंजन माना जाता है, किन्तु यह उद्देश्य पूर्ण नहीं है क्योकि विशुद्ध मनोरंजन साहित्य की सार्थकता की नष्ट कर देता है. कहानी की रचना किसी उद्देश्य को आधार बनाकर की जाती है. उसमे एक ऐसी मूल संवेदना होती है. जिसका अनुभवकर पाठक उसके विषय में सोचने के लिए बाध्य हो जाता है. उसे कहानी का केन्द्रीय भाव कहा जाता है. मर्म या उदेश्य कहानी का प्राण तत्व होता है.

 

Hindi Stories और निबंध का स्वरुप और विशेषताएँ

निबंध का धात्वर्थ है., सुगठित अथवा कसा हुआ बंध जिसका अर्थ है. भली प्रकार बंधी हुई परिमार्जित और प्रोढ़ रचना. अंग्रेजी में निबंध को ऐसे (Essay) कहते है.

हिंदी के श्रेष्ठ निबंधकार आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार यदि गद्य कवियों या लेखकों की कसोटी है तो निबंध गद्य की कसोटी है. डॉ गुलाबराय के कथानुसार निबंध उस गद्य रचना को कहते है. जिसमे सीमित आकार के भीतरी किसी विषय का वर्णन या प्रतिपादन एक विशेष निजीपन, स्वछंदता, सोष्ठव, सजीवता तथा आवश्यक संगति सम्बधता के साथ किया गया हो.

 

निबंध लेखक के निजीपन व वेश्य्विक विचार अनुभूति से पूर्ण होते है.

निबन्ध के प्रमुख भेद है.

वर्णात्मक

इस प्रकार के निबंध प्राय: दर्शनीय स्थल मैले, तीर्थ स्थान, प्राकृतिक दृश्य से सम्बन्धित होते है. इनमे भाषा प्रसाद गुण सम्पन्न, सरस, सजीव होती है. इसमें चित्रात्मकता महत्वपूर्ण होती है.

 

कथात्मक

इन निबंधो में किसी काल्पनिक वृत्त, आत्म चरितात्मक प्रसंग, जीवनी, आत्मकथा पौराणिक कथा का उपयोग किया जाता है. कथा तत्व इसमें प्रमुख होता है. दिनकर का कबीर साहव से भेंट इसी प्रकार का निबंध है.

 

विचारात्मक

इस प्रकार के निबंधों में सुव्यवस्थित रूप से किसी विषय पर विचार व्यक्त होते है. इनमे तर्क चिंतन की प्रधानता होती है. आचार्य रामचंद्र शुक्ल का रसात्मक बोध के विविधरूप या कविता क्या है. निबंध इसी श्रेणी का है. इसमें बुद्धितत्व की प्रधानता है.

 

भावात्मक

इस प्रकार के निबंध आत्माभिव्यंजना तथा भाव प्रधान शैली में लिखे जाते है. इसमें कल्पना और काव्य तत्व का भी समावेश होता है. सरदार पूर्ण सिंह के निबंध मजदूरी और प्रेम, डॉ रघुवीर सिंह का फतहपुर सीकरी इस प्रकार के निबंधो के महत्वपूर्ण उदाहरण है.

निबंध के इन प्रमुख भेदों के अतिरिक्त हास्य व्यंग्य परक निबन्ध भी मिलते है. इनमे हरिशंकर परसाई एवं शरद जोशी के व्यंग्य निबंध प्रमुख है. भारतेंदु काल में लिखित शिव शम्भु का चिट्ठा यमलोक की यात्रा भी व्यंग्य विनोद भाषा में लिखे गए है.

निबंध शैली के आधार पर ही लेखकों में भिन्नता तथा उनकी विशेषताओं का आकलन किया जा सकता है. भाषा शैली में बाह्य और आंतरिक दौनों तत्व सम्मिलित होते है.

 

निबंधो के आवश्यक तत्व

निबंध लेखन के लिए कुछ आवश्यक तत्व है

एकान्विति

निबंध के लिए आवश्यक है कि उसमें एकसूत्रता हो. निबंध में किसी विषय का विश्लेषण करते समय बिखरे विचारों या खंड-खंड में बटें विचारों का विश्लेषण कर एक बिंदु से आरम्भ कर विकसित करना चाहिए तथा बिखराव से बचाना चाहिए.

 

आत्मतत्व की प्रधानता

निबंध में आत्मतत्व की प्रधानता होती है. निबंधकार के व्यक्तित्व और शैली का प्रभाव की पाठक से उसकी आत्मीयता स्थापित करता है. प्रसिद्ध निबंधकार लेम्ब ने एक स्थान पर लिखा है. मैं अपने पाठक से बातचीत करता हूँ.

 

कलात्मकता

निबंध कलात्मकता से पूर्ण होना चाहिए. उसमे ऐसी विशेषताए होनी चाहिए कि छोटे आकार में वह रस निर्मित कर पाठक को रसास्वाद दे. इसके लिए विषय की रोचकता के साथ भाषा शैली भी रोचक होनी चाहिए. रोचकता का यहाँ तात्पर्य यह नहीं कि इसमें स्तरहीनता हो. निबंध गठन में विषय के अनुरूप गंभीरता ओज, आवश्यक है. व्यंग्य निबंधों की भाषा व्यंग्यपूर्ण, तीखी मार्मिकता लिए होनी चाहिए. इस प्रकार निबंध विधा निरंतर विकासशील है.

 

लोक साहित्य

आदिम मनुष्य की सृजनात्मकता जिन विभिन्न माध्यमो में अभिव्यक्त होती रही है. उनमे भाषा एक सशक्त माध्यम रही है. भाषा को पा लेने के बाद मनुष्य ने अपने सुख दुःख अपने हर्ष उन्मर्ष को जिन गेय तथा आख्यानक रचनाओ में व्यक्त किया वे सभी रचनाये लोक साहित्य में परिगणित होती है. लोक के अनुभव और विचार जब भाषा के स्तर पर कलात्मक संरचना में अभिव्यक्त होते है. तब लोक साहित्य साकार होता है. लोक साहित्य के अंतर्गत लोकगीत, लोक कथाएँ, लोक कहावते और लोक मुहावरे आदि का समावेश होता है. लोक साहित्य का सीधा सम्बंध लोक जीवन से है. अत: लोक की परम्पराएँ और लोक जीवन के मूल्य लोक साहित्य में समाहित होते है. लोक साहित्य समूह जीवन की चित्तवृतियों का उद्घाटक है. अत: लोक साहित्य की रचना भी सामूहिक प्रयासों का परिणाम है.

 

सामजिक परिवर्तन के क्रम में लोक समाज विभिन्न जीवन आवश्यकताओं के कारण जिन अनेक स्तरों से गुजरता रहा है. उनमे यायावरी जीवन पद्धति से कृषि कर्म से जुड़ीं जीवन पद्धति तक लोक साहित्य निरंतर अपनी उपस्थिति प्रकट करता रहा है. और अपनी आंतरिक प्रयोगशीलता के कारण अपने समय और समाज को अभिव्यक्त करने में सक्षम सिद्ध होता रहता है. प्रारम्भिक लोक साहित्य प्रकृति प्रेरित संवेदनाओं से निष्पन्न है. जबकि ग्राम समूह के स्तर पर रचा जाने वाला लोक साहित्य लोक संस्कारों की कर्मकांडीय परम्पराओं में भी विकसित हुआ है. लोक साहित्य लोक के श्रम तथा उससे निष्पन्न फलान्विती के आनंद की अनुभूतियों से परिपूर्ण है. प्रकृति संस्कार और जीवनचर्चा के साथ साथ मनुष्य की संवेदनाओं की सहज भाव अभिव्यक्ति ही लोक साहित्य में केन्द्रित है.

 

जीवनगत विभिन्न व्यावसाहिक क्रिया पद्धतियों का समावेश लोक साहित्य में रहता है. अत: लोक साहित्य उन सभी तरह की जीवन चर्चाओं की संप्रेरणाओं से भी अपना उत्प्रेरण प्राप्त करता रहा है. अपनी इसी शक्ति के कारण लोक साहित्य सामाजिक परम्पराओं को अपने कलेवर में हुए है. समाज की अनेक प्रमाणिक अनुभूतियों और विचार प्रणालियों का लेखा जोखा लोक साहित्य में समावेशित है.

 

मध्यप्रदेश अपनी भोगोलिक स्थिति के कारण लोक साहित्य के प्रणयन में काफी उर्वर रहा है. मध्यप्रदेश वह भूमि है जहाँ जीवन ने अपनी आँखें सृष्टी रचना के प्रारम्भिक काल में खोली है. जंगलो, पहाड़ों, नदियों और समतली भू भोतिकी संरचना के कारण मध्यप्रदेश के विभिन्न अंचलों में जो लोक जीवन विकसित हुआ वह विभिन्न लोकांचलों को रूपायित करता है. इसी आधार पर मध्यप्रदेश में मालवा, निमाड़, बुंदेलखंड, बघेलखंड, और पहाड़ी क्षेत्रों में विभिन्न लोक संस्कृतियों का अभ्युदय हुआ. इन अंचलों की अपनी अपनी क्षेतीय बोलियाँ भी अस्तित्व में आई. इन बोलियों में मालवी, निमाड़ी, बुन्देली, बघेली बोलियाँ प्रमुख है. इन बोलियों में रचा गया साहित्य ही मध्यप्रदेश का लोक साहित्य माना जाता है.