History of Prose Information in Hindi


हिंदी गद्य का इतिहास History of Hindi Prose Information

Prose Information गद्य (Prose) आधुनिक काल की सबसे महत्वपूर्ण विधा मानी जाती है. संसार के प्रत्येक साहित्य में पहले पद्य का विकास हुआ है और फिर गद्य का. हिंदी साहित्य विकास में भी प्रारम्भिक रचनाये पद्य में है. गद्य का पूर्ण व पारिमार्जित विकास बाद में हुआ.

गद्य का सबसे प्रचीन रूप चौदहवी शताब्दी के गोरखपंथी गद्य ग्रंथो में मिलता है. जो ब्रजभाषा मिश्रित गद्य का उदाहरण है. खड़ीबोली गद्य का सर्वप्रथम ग्रन्थ गंगकवि का चंद छंद बरनन की महिमा माना जाता है. इसकी भाषा आधुनिक खड़ीबोली के आसपास की है.




History of Prose Information in Hindi

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उन्नीसवी शताब्दी के प्रारम्भिक वर्षो में हिंदी गद्य का सूत्रपात होता है (Hindi prose in the early years of the nineteenth century would herald)

इस काल में खड़ीबोली गद्य की प्रतिष्ठा मुंशी सदासुखलाल, इंशाअल्लाह खां, लल्लूजी लाल और सदल मिश्र ने की. विकसित परिवर्धित होते गद्यकाल को प्रमुख रूप से चार भागों में बाटा जा सकता है.

 

प्रथम उत्थान काल First Regeneration Period सन (१८५० से १९०० ई तक)

Prose Information हिंदी गद्य का निर्माण भारतेंदु हरिशचंद्र और उनके द्वारा प्रकाशित हरिशचंद्र मैगजीन के माध्यम से एक नई दिशा की और बढ़ता है. भारतेंदु हरिशचंद्र ने बोलचाल की भाषा के आधार पर हिंदी गद्य को व्यापारिक रूप प्रदान किया. भारतेंदु और उनके साथ के लेखकों ने नाटक, निबंध, आलोचना, उपन्यास, प्रहसन आदि विभिन्न विधाओ के साथ साहित्य में प्रवेश किया. इस काल में कविता की भाषा ब्रजभाषा थी, किन्तु गद्य की भाषा में खड़ीबोली का उपयोग किया गया.

इस युग में प्रकाशित पत्रिकाए कवि वचनसुधा “हिंदी प्रदीप” आंनद कादम्बिनी ने विविध विधाओ के प्रकाशन में योगदान दिया. निबंधो की दृष्टी से विषय में विवधता थी. समाज सुधार की भावना, राजनीतिक चेतना, हास्य व्यंग, सामाजिक कुरीतियों तथा राष्ट्र की समस्याओं को विषय बनाया गया था. नाटकों के क्षेत्र में भारतेन्दुजी ने स्वयं नाटक लिखे तथा रंगमंच की स्थापना की. उनके द्वारा लिखित “अंधेर नगरी” प्रेम योगनी आज भी प्रासंगिक है. उपन्यास, कहानी की तुलना में इस काल में निबंध, समालोचना तथा आत्मकथा विधा का प्रारम्भ हुआ.

भारतेंदु युग समाज सुधार, देशभक्ति, राष्ट्रीय चेतना, विदेशी शासन के प्रति आक्रोश तथा राष्ट्रीय एकता के शंखनाद से गुंजित था. इस काल के प्रमुख लेखक थे. बालकृष्ण भट्ट, प.प्रताप नारायण मिश्र, बद्रीनारायण चौधरी “प्रेमघन” आदि.

 

द्वितीय उत्थान काल Second Regeneration Period (द्विवेदी युग सन १९०० से १९२० ई तक)

इस युग की प्रेरक शक्ति प. महावीर प्रसाद द्विवेदी थे. सन १९०३ ई सरस्वती पत्रिका के सम्पादक बनने के बाद द्विवेदी जी ने प्रकाशन कर खड़ीबोली को विकसित और परिष्कृत करने में अभूतपूर्व योगदान दिया. भाषा को व्याकरण सम्मत बनाने तथा शब्दकोष में निरंतर वृद्धि की दृष्टी से यह युग महत्वपूर्ण था गद्य और पद्य दोनों की भाषा खड़ीबोली बन रही थी. अत: भाषा की शुद्धता तथा वर्तनी की एकरूपता पर बल दिया गया. द्विवेदी युग उदार राष्ट्रीयता, जागरण, समाज सुधार तथा उच्चादर्शो का युग है. इस काल को नवजागरण काल भी कहा गया.

 

निबंध की दृष्टि से श्रेष्ठतम निबंध In Terms of Best Essays

इस समय लिखे गए. वैचारिक व ललित दोनों प्रकार के निबंध लिखे गए. प्रमुख निबंधकारों में चंद्रधर शर्मा, गुलेरी, अध्यापक पूर्ण सिंह, बाबू श्याम सुन्दर दास, बालमुकुन्द गुप्त तथा उपन्यास कहानी की दृष्टि से प. किशोरीलाल गोस्वामी, गोपालराम गहमरी, बंगमहिला, श्री निवासदास, देवकीनंदन खत्री (तिलिस्मी उपन्यास) उल्लेखनीय है. आत्मकथा लेखन की दृष्टि से आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की स्फुट रूप से लिखी आत्मकथा तथा पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी की आत्मकथाए उपलब्ध होती है.

 

तृतीय उत्थान काल Third Regeneration Period (सन १९२० से १९४० तक)

गद्य का परिमार्जित रूप १९२० के बाद गंभीरता तथा विशिष्ट शैली के साथ प्रस्तुत हुआ रामचंद्र शुक्ल (निबंध) प्रेमचन्द्र (कहानी-उपन्यास) जयशंकर प्रसाद (नाटक) इस काल के महत्वपूर्ण रचनाकार थे. शुक्लजी ने विश्लेष्णात्मक निबंध तथा समास प्रधान शैली का प्रणयन किया. कहानी उपन्यास के क्षेत्र में प्रेमचन्द्र ने सामान्य जत की भाषा को प्रमुखता देते हुए महत्वपूर्ण कहानी, उपन्यास लिखे. पंच परमेश्वर, बूढी काकी, कफ़न जैसी कहानियों तथा गबन, गौदान, कर्मभूमि जैसी श्रेष्ठतम उपन्यासों के प्रणेता प्रेमचन्द्र के निबंध भी लिखे एवं साहित्य के उद्देश्य का गहरा विश्लेषण किया.

 

नाटक के क्षेत्र में (In the field of play)

जयशंकर प्रसाद ने एतिहासिक कथानकों के आधार पर वर्तमान की समस्याओं पर दृष्टिपात किया. अजातशत्रु, चन्द्रगुप्त, स्कंदगुप्त इसके महत्वपूर्ण नाटक है. प्रसाद के अतिरिक्त हरिकृष्ण प्रेमी, सेठ गोविन्ददास, पाण्डेय बेचन शर्मा, उग्र, उदयशंकर भट्ट आदि इस युग के अन्य नाटककार है.

समालोचन के क्षेत्र में बाबू गुलाबराय, आचार्य रामचद्र शुक्ल, नंद दुलारे वाजपेयी, आचार्य हजारीप्रसाद दिववेदी के नाम उल्लेखीयनीय है.

 

एकांकी विधा की दृष्टि से (In terms of one-act mode)

डॉ. रामकुमार वर्मा, उपेन्द्रनाथ अश्क सेठ गोविन्ददास का विशिष्ट स्थान है. भारतीय जननाट्य संघ (इप्टा) ने रंगमंच परम्परा को विकसित किया. इसके अतिरिक्त आत्मकथा, जीवनी रेखाचित्र विधाएँ भी इस काल में लिखी गई.

 

चतुर्थ उत्थान काल (सन १९४० से वर्तमानकाल तक) IV Regeneration Period Prose Information (year 1 to 9, 50 to present)

यह काल कई दृष्टियों से महत्वपूर्ण है. इस काल में स्वान्त्र्योत्तर पूर्व स्थितियाँ तथा स्वतंत्रता के बाद (१९४७ ई) का प्रभाव मौजूद है. राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के अहिंसा आन्दोलन की सक्रियता तथा स्वतंत्रता की प्राप्ति पश्चिमी ज्ञान विज्ञान से संपर्क का प्रभाव साहित्य पर भी दिखाई पड़ता है. सोवियत रूस की समाजवादी क्रांति तथा १९३६ ई प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना ने काव्य एवं गद्य दौनो को नई दिशा दी.

नाटक और एकांकी की दृष्टि से भुवनेश्वर प्रसाद, उपेन्द्रनाथ “अश्क” जगदीश चन्द्र “माथुर” डॉ धर्मवीर भारती (अंधायुग) मोहन राकेश (आषाढ़ का एक दिन, आधे अधूरे) नाट्य क्षेत्र के उल्लेखनीय नाम है.

इस काल में उपन्यास विधा की दृष्टि से जैनेद्रकुमार, अज्ञेय, यशपाल, सुनीता, त्यागपत्र, शेखर एक जीवनी, नदी के द्वीप, झूठा सच नामक उपन्यास महत्वपूर्ण है. इसी काल में उपन्यास एक नई प्रवृति आंचलिक उपन्यास के रूप में दिखाई पड़ता है. जिसका प्रतिनिधित्व फणीश्वरनाथ रेणु (मैला आँचल) उदयशंकर भट्ट (सागर, लहरें और मनुष्य) नागार्जुन (वरुण के बेटे) करते है.

कहानीकारों में यश्पालन, मार्कण्डेय, कमलेश्वर, भीष्मसाहनी, निर्मलवर्मा, श्रीलाल शुक्ल, कृष्णा सोबती, मैत्रेयी पुष्पा, अलका सरावगी, अमरकांत के नाम महत्वपूर्ण है.

आत्मकथा के क्षेत्र में डॉ, हरीशचन्द्र बच्चन लिखित “क्या भूलूँ क्या याद करूँ” नींद का निर्माण फिर-फिर सुप्रसिद्ध आत्मकथा है. लेखनशैली की आत्मियता और भाषा के प्रवाह की दृष्टी से यह उल्लेखनीय कृति है.

यात्रा साहित्य की दृष्टी से राहुल सांकृत्यायन, भगवत शरण उपाध्याय, अमृतराय के नाम विशेष प्रसिद्ध है. रिपोर्ताज नवीनतम विधा है जिसमे रांगेय राघव प्रभाकर माचवे, धर्मवीर भारती का नाम लिया जा सकता है.

संस्मरण साहित्य की दृष्टी से क्रांतिकारियों के संस्मरण भगवानदास माहौर लिखित शहीद भगतसिंह, राजगुरु चन्द्रशेखर आजाद के संस्मरण तथा शिवरानी जी को प्रेमचन्द्र घर में संस्मरण महत्वपूर्ण है.

रेखाचित्र के क्षेत्र श्रीमती महादेवी वर्मा, देवेन्द्र सत्यार्थी के अतीत के चल चित्र स्मृति की रेखाए और रेखाए बोल उठी तथा जीवनी क्षेत्र में राहुल सांकृत्यायन द्वारा लिखी जीवनी तथा अमृतराय की कमल का सिपाही प्रशंसनीय ग्रंथ है.

हिंदी (Prose Information) गद्य के संक्षिप्त विकास पर दृष्टीपात करने से यह ज्ञात होता है. कि हिंदी गद्य निरंतर विकासशील है और इसमें नये प्रयोग हो रहे है.

 

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