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Ideas विचारों की उत्तमता ही उन्नति का मूलमंत्र

मनुष्य जैसे विचार Ideas करता है, उसकी सूक्ष्म तरंगे विश्वाकाश में फेल जाती है. सम स्वभाव के पदार्थ एक दूसरे की और आकर्षित होते है. इस नियम के अनुसार उन विचारों के अनुकूल दूसरे विचार आकर्षित होते है. और व्यक्ति को वैसे ही करने की प्रेरणा देते है.




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मेडम गणित में पी.ई.टी परीक्षा के उपयोगार्थ कोई भी बुक दीजिये.

 

देखिये जो आप चाह रहे है. वह तो फिलहाल उपलब्ध नहीं है. परन्तु हाँ ये आई.आई.टी, की गणित जरुर है. चाहो तो पढ़कर देखों.

 

रहने दीजिये मेडम, इन किताबो को तो मैं दूर से ही नमस्कार करता हूँ इन्हें पढना मेरे बस का नहीं.

 

अरे आपने बुक खोलकर बी नहीं देखी, फिर कैसे कह सकते है कि मैं ये किताब पढ़ नहीं सकता. आप उच्चांक प्राप्त विद्यार्थी है. प्रयत्न तो कर सकते है.

 

आये दिन ऐसी बाते सुनने में आती है. और महसूस होता है. कि आज विचारों को प्रारम्भ से ही नकारात्मक रूप दे दिया जाता है. वास्तव में, विद्यार्थी का जीवन उसके विचारों का ही प्रतिबिम्ब है. सफलता, असफलता, उन्नति-अवनति-महानता, सुख दुःख आदि सभी पहलु उसके अपने विचारो पर ही निर्भर करते है.

उसके विचार जानकार उसके जीवन के बारे में सहज ही मालुम किया जा सकता है. स्वामी विविकानंद जी कहा था. स्वर्ग और नस्क कहीं अन्यत्र नहीं. इनका निवास हमारे विचारों में ही है. जीवन की विभिन्न गतिविधियों का संचालन हमारे विचारों के फलस्वरूप ही होता है. हम जो भी कुछ कर्म करते है. वह विचारों की प्रेरणा से ही करते है, विचारों में अपार शक्ति है.

यदि संकल्प शक्ति इसके साथ हो तो हमारी प्राण उर्जा शक्तिशाली होकर, मनोबल बढाकर सकारात्मक सोच का निर्माण कर अच्छे कार्यों की और हमें प्रवृत करती है. शेक्सपियर ने ठीक ही लिखा है कि कोई भी वस्तु अच्छी या बुरी नहीं होती है. अच्छाई बुराई का आधार हमारे विचार ही है.

 

संसार में दिखाई देने वाली विभिन्नताए, विचितत्रताये भी हमारे विचारों का प्रतिबिम्ब ही है. एक सी परिस्थतियों में एक सी सुख सुविधाओं में अपने विचारों की भिन्नता के कारण असाधारण अंतर पड़ जाता है. एक जीवन में प्रशिक्षण सुख सुविधा, प्रसन्नता, ख़ुशी, शांति, संतोष का अनुभव करता है, तो दूसरा पीड़ा, शोक, क्लेशमय जीवन बिताता है, कोई अभावग्रस्त जीवन बिताते हुए भी प्रसन्न है तो कोई समृद्ध होकर भी जीवन को नारकीय यन्त्रणा समझते है.

यहाँ हम यह भी कह सकते है कि विचारों की विकृति ही दुर्भाग्य एवं विचारों संकृति ही सोभाग्य है. ऐसा क्यों होता है? क्या यह मनुष्य के विचार चिंतन का परिणाम नहीं? सच है नेपोलियन बोनापार्ट ने अंतिम दिनों में कहा था. अफ़सोस है कि मैंने जीवन का एक सप्ताह भी सुख शांति पूर्वक नहीं बिताया, जबकि मुझे समृधि, ऐश्वर्य सम्पत्ति, यश आदि की कोई कमी नहीं है.

 

मनुष्य जैसे विचार करता है, उसकी सूक्ष्म तरंगे विश्वाकाश में फेल जाती है.

सम स्वभाव के पदार्थ एक दुसरे की और आकर्षित होते है. इस नियम के अनुसार उन विचारों के अनुकूल दुसरे विकाह्र आकर्षित होते है और व्यक्ति को वैसे ही करने की प्रेरणा देते है. एक ही तरह के इन सजीव विचारों का जब केन्द्रीयकरण होता है, तो एक प्रचण्ड विचार शक्ति का उद्भव होता है. महापुरुषों ने इस दिव्य विचारशक्ति का उल्लेख कुछ इस तरह किया है कि कोई व्यक्ति भले ही किसी गुफा में जाकर विचार करे और विचार करते-करते ही वह मर भी जाए तो वे विचार कुछ समय उपरान्त गुफा की दीवारों का विच्छेद कर बाहर निकल पड़ेंगे और सर्वत्र फेल जायेंगे. ये विचार Ideas इतने शक्तिशाली होंगे कि सबको प्रभावित करेंगे. वास्तव में जो अपने आपको सद्विचारों से भरे रखते है. वे पग-पग पर जीवन के महान वरदानो में विभूषित होते है. सफलता, महानता, प्रसन्नता आड़ के परितोषिक उन्हें मिलते है. सफलता एवं श्रेय के महत्वाकांक्षी व्यक्ति अपने पास प्रतिकूल विचारों को एक क्षण भी नहीं ठहरने देते वे मानते है कि आने वाला संकट उनकी शक्ति की तुलना में तुच्छ है.

वे अपनी बुद्धि, विवेक से उसका सफलतापुर्वक सामना कर उस समस्या को सहज सुलझा सकते है. ऐसा दृढ विश्वास कर, उच्च विचार शक्ति रख कर कई महापुरुषों ने यश एवं सफलता का अर्जुन किया है. आज के इस प्रतिस्पर्धात्मक युग में अनेतिकता के माहौल में बाल्यकाल से ही निषेधात्मक चिंतन की प्रवृति मानस पटल पर अपना प्रभाव ज़माने लगती है.

परन्तु इसे दूर कर मन मस्तिष्क को सकारात्मक विचारों से भयकर देखें. वह चिंतन, संकल्प, साहस एवं पुरुषार्थ को जागृत करके साधक को सफलता के सौपानो के प्राते उन्मुख कर देगी. अपने विचारों को आशान्वित रख आज की परिस्थितियों को समझना और उसी आधार पर आगे बढ़ने की बात सोचना ही व्यवहारिक बुद्धिमता है.

जो आपत्तियों और असफलता की बात ही सोचेगा. उसे कभी अवसर प्राप्त नहीं हो सकते. सद्विचार की जाग्रतावस्था में व्यक्ति न निष्क्रिय बनता है और न निराश होता है. सकारात्मक चिंतन, सार्थक चिंतन एवं सदाचरण की त्रिवेणी के मध्य सफलता रूपी सरस्वती का साक्षात्कार आचार्य ने विचारों का महत्व उत्कृष्ट रूप से प्रतिपादित किया है.

जिनके विचार IDEAS और कार्य उदारतापूर्वक है, जो दुसरे लोगों की सुविधा का अधिक ध्यान रखते है.

वास्तव में वे ही इस भूलोक के देवता है. हमारे मन मस्तिष्क में उठने वाली वैचारिक तरंगे, भावनाएँ एवं कल्पनाए हमारे व्यक्तिव एवं कृतित्व को प्रकाशित करती है. संकल्प व दृढ इच्छाशक्ति का धनी विद्यार्थी जब अपनी धुन का पक्का होता है, वह अपने को कर्मठता की सान पर चढ़ाता हुआ, श्रम और पुरुषार्थ की अग्नि में तपता हुआ जब कर्म पथ पर अग्रसर होता है तो उसकी आंतरिक प्रसुप्त महानता बैचेन होकर प्रकट होने के लिए छटपटाने लगती है और वह डॉक्टर, इंजीनियर, प्रशासक, कलाकार, वैज्ञानिक के रूप में हमारे सामने खड़ी हो जाती है.

 

विचारों में बड़ा जादू है. वे हमें उठा सकते है और गिरा भी सकते है. आवश्कता इस बात की है कि हमें आशावादी, उदार, दिव्य, पुरोगामी, उत्कृष्ट विचारों से अपने मन को सराबोर रखना चाहिए. यही सफलता का मार्ग भी है और सफलता भी है.

 

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