India Ancient Medieval History Information


Ancient Medieval History of India

प्राचीन मध्यकालीन भारत का इतिहास (Ancient Medieval History)

भारत पर अरबों का आक्रमण

मुहम्मद बिन कासिम के नेतृत्व ने अरबों ने भारत पर पहला सफल आक्रमण किया.

अरबों ने सिंध पर ७१२ ई में विजय पायी थी.

अरब आक्रमण के समय सिंध पर दाहिर का शासन था.

भारत पर अरबवासियो के आक्रमण का मुख्य उद्देश्य धन दौलत लूटना तथा इस्लाम धर्म का प्रचार प्रसार करना था.

महमूद गजनी २७ वर्ष की अवस्था में ९९८ ई में गद्दी पर बैठा.

बग़दाद का खलीफा अल-आदिर बिल्लाह ने महमूद गजनी के पद को मान्यता प्रदान करते हुए यमीन उद्द दौला तथा यमीन-उल-मिल्लाह की उपाधि दी.

महमूद गजनी ने भारत पर पहला आक्रमण १००१ ई में किया था. यह आक्रमण शाही राजा जयपाल के विरुद्ध था. इसमें जयपाल की पराजय हुई थी.

महमूद गजनी का १००८ ई में नगरकोट के विरुद्ध हमले को मुर्तिवाद के विरुद्ध पहली महत्वपूर्ण जीत बतायी जाती है.

महमूद गजनी का सबसे चर्चित आक्रमण १०२५ ई में सोमनाथ मंदिर सौराष्ट्र पर हुआ जिसमे सोमनाथ मंदिर का लूटा गया था.

सोमनाथ मंदिर की लूट में उसे करीब २० लाख दीनार की सम्पत्ति हाथ लगी.

सोमनाथ मंदिर लूट कर ले जाने के क्रम में महमूद पर जाटों ने आक्रमण किया था और कुछ सम्पत्ति लूट ली थी.

महमूद गजनी का अंतिम भारतीय आक्रमण १०२७ ई में जाटों के विरुद्ध था.

महमूद गजनी की मृत्यु १०३० ई में हो गई.

अलबरूनी, फिरदौसी, उत्बी तथा फरुखी महमूद गजनी के दरबार में रहते थे.

Ancient Medieval History के बारे में जानकारी

Ancient Medieval History के बारे में जानकारी

 

Ancient Medieval History में मुहम्मद गौरी का इतिहास

गौर महमूद गजनी के अधीन एक छोटा सा राज्य था. ११७३ ई में शहाबुद्दीन मुहम्मद गौरी गौर का शासक बना.

मुहम्मद गौरी ने भारत पर पहला आक्रमण ११७५ ई पाटन गुजरात पर हुआ. यहाँ का शासक भीम-II ने गौरी को बुरी तरह परास्त किया.

तराईन का प्रथम युद्ध ११९१ ई गौरी और पृथ्वीराज चौहान के बीच हुआ, जिसमे पृथ्वीराज चौहान विजयी हुआ.

तारईन का द्वितीय युद्ध ११९२ ई में गौरी और चौहान के बीच ही हुआ, इसमें गौरी को विजय प्राप्त हुई.

चन्दावर का युद्ध ११९४ ई गौरी और जयचन्द के बीच हुआ. इस युद्ध में भी गौरी को विजय प्राप्त हुई.

मुहम्मद गौरी भारत के विजित प्रदेशो पर शासन का भार अपने गुलाम सेनापत्तियों को सौपते हुए गजनी लौट गया.

मुहम्मद गौरी की हत्या १५ मार्च १२०६ को कर दी गई.

 

Ancient Medieval History में सल्तनत काल का इतिहास

गुलाम वंश

गुलाम वंश की स्थापना १२०६ ई में कुतुबुद्दीन ऐबक ने किया था. वह गौरी का गुलाम था.

कुतुबुद्दीन ऐबक ने अपना राज्याभिषेक २४ जून १२०६ को किया था.

कुतुबुद्दीन ऐबक ने अपनी राजधानी लाहौर में बनायीं थी.

क़ुतुब मीनार की नीवं कुतबुद्दीन ऐबक ने डाली थी.

दिल्ली का कुवत उल इस्लाम मस्जिद और अजमेर का ढाई दिन का झोपड़ा नामक मस्जिद का निर्माण ऐबक ने करवाया था.

कुतुबुद्दीन ऐबक को लाख बख्श लाखो का दान देनेवाला भी कहा जाता था.

प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय को धवस्त करने वाला ऐबक का सहायक सेनानायक बख्तियार खिलजी था.

ऐबक की मृत्यु १२१० ई में चौगान खेलते समय घोड़े से गिरकर हो गई, इसे लौहार में दफनाया गया.

ऐबक का उत्तराधिकारी आरामशाह हुआ जिसने सिर्फ आठ महीनों तक शासन किया.

आरामशाह की हत्या करके इल्तुतमिश १२११ ई में दिल्ली की गद्दी पर बैठा.

इल्तुतमिश तुर्किस्तान का इल्बरी तुर्क था, जो ऐबक का गुलाम और दामाद था. ऐबक की मृत्यु के समय वह बदायूँ का गवर्नर था.

इल्तुतमिश लाहौर से राजधानी को स्थानांतरित करके दिल्ली लाया.

इल्तुतमिश द्वारा किये गए महत्वपूर्ण कार्य निम्न है.

(1) क़ुतुबमीनार के निर्माण को पूर्ण करवाया.

(2) सबसे पहले शुद्ध अरबी सिक्के जारी किये. (चाँदी का टंका और तांबा का जीतल)

(3) इक्का प्रणाली चलाई

(4) चालीस गुलाम सरदारों का संगठन बनाया, जो तुर्कान-ए-चिहलगानी के नाम से जाना गया.

(5) सर्वप्रथम दिल्ली के अमीरों का दमन किया.

इल्तुतमिश पहला शासक था, जिसने १२२९ ई में बग़दाद के खलीफा से सुलतान पद की वैधानिक स्वीकृति प्राप्त की.

इल्तुतमिश की मृत्यु अप्रैल १२३६ ई में हो गई.

इल्तुतमिश के बाद उसका पुत्र रुकनुद्दीन फिरोज गद्दी पर बैठा, वह एक अयोग्य शासक था, इसके अल्पकालीन शासन पर उसकी माँ शाह तुरकान छाई रही.

शाह तुरकान के अवांछित प्रभाव से परेशान होकर तुर्की अमीरों ने रुकनुद्दीन को हटाकर रजिया को सिंहासन पर आसीन किया. इस प्रकार रजिया बेगम प्रथम मुस्लिम महिला थी जिसें शासन की बागडोर सम्भाली.

रजिया ने पर्दाप्रथा का त्यागकर तथा पुरुषों की तरह चोगा (काबा) और कुलाह टोपी पहनकर राजदरबार में खुले मुँह से जाने लगी.

रजिया ने मालिक जमालुद्दीन याकूत को अमीर-ए-अखूर (घोड़े का सरदार) नियुक्त किया.

गैर तुर्कों को सामंत बनाने के रजिया के प्रयासों से तुर्की अमीर विरुद्ध हो गए और उसे बंदी बनाकर दिल्ली की गद्दी पर मुइजुद्दीन बहरामशाह को बैठा दिया.

रजिया की शादी अल्तुनिया के साथ हुई. इससे शादी करने के बाद रजिया ने पुन: गद्दी प्राप्त करने का प्रयास किया. लेकिन वह असफल रही.

रजिया की हत्या १३ अक्टूम्बर, १२४० ई को डाकुओं के द्वारा कैथल के पास कर दी गई.

बहराम शाह को बंदी बनाकर उसकी हत्या मई १२४२ ई में कर दी गई.

बहराम शाह के बाद दिल्ली का सुल्तान अलाउद्दीन मसूद शाह १२४२ ई में बना.

बलबन ने षड्यंत्र के द्वारा १२४६ ई में अलाउद्दीन मसूद शाह को सुल्तान के पद से हटाकर नासिरुद्दीन महमुद  को सुल्तान बना दिया.

नसीरुद्दीन महसूद ऐसा सुल्तान था जो टोपी सीकर अपना जीवन निर्वाह करता था.

बलबन ने अपनी पुत्री का विवाह नासिरुद्दीन महसूद के साथ किया था.

बलबन का वास्तविक नाम बहाउद्दीन था. वह इल्तुतमिश का गुलाम था.

तुर्कान-ए-चिह्लगानी का विनाश बलबन ने किया था.

बलबन १२६६ ई में गियासुद्दीन बलबन के नाम से दिल्ली की गद्दी पर बैठा. यह मंगोलों के आक्रमण से दिल्ली की रक्षा करने में सफल रहा.

राजदरबार में सिजदा और पैबोस प्रथा की शुरुआत बलबन ने की थी.

बलबन ने फारसी रीति रिवाज पर आधारित नवरोत उत्सब को प्रारम्भ करवाया.

अपने विरोधियों के प्रति बलबन ने कठोर लौह और रक्त की नीति का पालन किया.

नासिरुद्दीन महमूद ने बलबन को उलूग खा की उपाधि प्रदान की.

बलबन के दरबार में फारसी के प्रसिद्ध कवि अमीर खुसरों और अमीर हसन रहते थे.

गुलाम वंश का अंतिम शासक शम्मुद्दीन केमुर्स था.

प्राचीन मध्यकालीन भारत का इतिहास Ancient Medieval History

प्राचीन मध्यकालीन भारत का इतिहास Ancient Medieval History

 

Ancient Medieval History में खिलजी वंश से १२९० से १३२० ई का इतिहास

गुलाम वंश के शासन को समाप्त कर १३ जून १२९० ई को जलालुद्दीन फिरोज खिलजी ने खिलजी वंश की स्थापना की.

इसने किलोखरी को अपनी राजधानी बनाया.

जलालुद्दीन की हत्या १२९६ ई में उसके भतीजा और दामाद अलाउद्दीन खिलजी ने कड़ामानिकपुर इलाहाबाद में कर दी.

२२ अक्टूबर, १२९६ ई में अलाउद्दीन दिल्ली का सुल्तान बना.

अलाउद्दीन के बचपन का नाम अली तथा गुरशास्प था.

अलाउद्दीन खिलजी ने सेना को नकद वेतन देने और स्थायी सेना की नीव रखी.

घोड़ा दागने और सैनिकों का हुलिया लिखने की प्रथा की शुरुआत अलाउद्दीन खिलजी ने की.

अलाउद्दीन ने भूराजस्व की दर को बढाकर उपज का ½ भाग कर दिया.

इसने खम्स (लूट का धन) में सुल्तान का हिस्सा 1/४ भाग के स्थान पर 3/४ भाग कर दिया.

इसने व्यापारियों में बईमानी रोकने के लिए कम तौलने वाले व्यक्ति के शरीर से मांस काट लेने का आदेश दिया.

दक्षिण भारत की विजय के लिए अलाउद्दीन ने मलिक काफूर को भेजा.

जमैयत खाना मस्जिद. अलाई दरवाजा, सीरी का किला तथा हजार खम्भा महल का निर्माण अलाउद्दीन खिलजी ने करवाया था.

दैवी अधिकार के सिधांत को अलाउद्दीन ने चलाया था.

सिकंदर-ए-सानी की उपाधि से स्वयं को अलाउद्दीन खिलजी ने विभूषित किया.

अलाउद्दीन ने अपने शासनकाल में मूल्य नियंत्रण प्रणाली को दृढ़ता से लागू किया.

अमीर खुसरों अलाउद्दीन के दरबारी कवि थे. इन्हें सितार और तबले के आविष्कार का श्रेय दिया जाता है.

अमीर खुसरों का जन्म इटावा ने हुआ था. इसे तुतिए हिन्द (भारत का तोता) के नाम से भी जाना जाता है.

 

बाजार नियंत्रण करने के लिए अलाउद्दीन खिलजी द्वारा बनाए जाने वाले नवीन पद थे.

दीवान-ए-रियायत – यह व्यापारियों पर नियंत्रण रखता था. यह बाजार नियंत्रण की पूरी व्यवस्था का संचालन करता था.

शहना-ए-मंडी – प्रत्येक बाजार में बाजार का अधीक्षक.

बरीद – बाजार के अन्दर घूमकर बाजार का निरिक्षण करता था.

मुनहियान व गुप्तचर – गुप्त सूचना प्राप्त करता था.

इन अधिकारियों का क्रम इस प्रकार था – दीवान-ए-रियायत, शहना-ए-मंडी, बरीद, मुनहियान.

 

अलाउद्दीन ने मलिक याकूब को दीवान-ए-रियायत नियुक्त किया था.

अलाउद्दीन द्वारा नियुक्त परवाना नवीस नामक अधिकारी वस्तुओं की परमिट जारी करता था.

शहना-ए-मंडी – यहाँ खाद्यानो हेतु लाया जाता था.

सराए-ए-अदल – यहाँ वस्त्र, शक्कर, जड़ी-बूटी, मेवा दीपक का तेल और अन्य निर्मित वस्तुए बिकने के लिए आती थी.

अलाउद्दीन खिलजी की आर्थिक नीति की व्यापक जानकारी जियाउद्दीन बरनी की कृति तारीखे फिरोजशाही से मिलती है.

ख़जाइनुल-फतूह-अमीर खुसरों, रिहला-इब्न बतूता और फुतूहस्सलातीन इसामी की कृति है.

मूल्य नियन्त्रण को सफल बनाने में मुहतसिब सेंसर और नाजिर (नाप-तौल अधिकारी) की महत्वपूर्ण भूमिका थी.

राजस्व सुधारों के अंतर्गत अलाउद्दीन ने सर्वप्रथम मिल्क, ईनाम और वक्फ के अंतर्गत दी गयी भूमि को वापस लेकर उसे खालसा भूमि मे बदल दिया.

अलाउद्दीन खिलजी के द्वारा लगाये जाने वाले दो नवीन कर थे. पहला – चराई कर, दुधारू पशुओं पर लगाया जाता, दूसरा गढ़ी कर घरों और झोपडी पर लगाया जाता था.

जजिया कर – गैर मुसलमानों से लिया जाता था.

जकात कर – मुसलमानों से लिया जाता था, जो एक धार्मिक कर था. यह सम्पत्ति का 40वा हिस्सा होता था.

अलाउद्दीन खिलजी की मृत्यु ५ जनवरी १३१६ ई को हो गई.

कुतुबुद्दीन मुबारक खिलजी १३१६ ई को दिल्ली के सिंहासन पर बैठा. इसे नग्न स्त्री, पुरुष की संगत पसंद थी.

मुबारक खिलजी कभी-कभी राजदरबार में स्त्रियों का वस्त्र पहनकर आ जाता था.

बरनी के अनुसार मुबारक कभी-कभी नग्न होकर दरबारियों के बीच दौड़ा करता था.

मुबारक खा ने खलीफा की उपाधि धारण की थी.

मुबारक के वजीर खुशरो खा ने १५ अप्रैल १३२० ई को इसकी हत्या कर दी और स्वयं दिल्ली के सिंहासन पर बैठा.

खुशरों खा ने पैगम्बर के सेनापति की उपाधि धारण की.

 

Ancient Medieval History में तुगलक वंश १३२०-१३९८ ई का इतिहास

५ सितम्बर १३२० ई को खुशरों खा को पराजित करके गाजी मलिक या तुगलक गाजी गयासुद्दीन तुगलक के नाम से ८ सितम्बर, १३२० ई को दिल्ली के सिंहासन पर बैठा.

गयासुद्दीन तुगलक ने करीब २९ बार मंगोल आक्रमण को विफल किया.

गयासुद्दीन ने अलाउद्दीन के समय में लिए गए अमीरों की भूमि को पुन: लौटा दिया.

इसने सिंचाई के लिए कुएँ और नहरों का निर्माण करवाया. सम्भवत: नहरों का निर्माण करने वाला गयासुद्दीन प्रथम शासक था.

गयासुद्दीन तुगलक ने दिल्ली के समीप स्थित पहाड़ियों पर तुगलकाबाद नाम का एक नया नगर स्थापित किया. रोमन शैली में निर्मित इस नगर में एक दुर्ग का निर्माण भी हुआ. इस दुर्ग को छप्पनकोट के नाम से भी जाना जाता है.

गयासुद्दीन तुगलक की मृत्यु १३२५ ई में बंगाल के अभियान से लौटते समय जूना खा द्वारा निर्मित लकड़ी के महल में दबकर हो गई.

गयासुद्दीन के बाद जूना खा मुहम्मद बिन तुगलक के नाम से दिल्ली के सिंहासन पर बैठा.

मध्यकालीन सभी सुल्तानों ने मुहम्मद तुगलक सर्वाधिक शिक्षित, विद्वान और योग्य व्यक्ति था.

मुहम्मद बिन तुगलक को अपनी सनक भरी योजनाओं, क्रूर कृत्यों और दूसरे के सुख – दुःख के प्रति उपेक्षा भाव रखने के कारण स्वप्नशील, पागल और रक्तपिपासु कहा गया.

मुहम्मद बिन तुगलक द्वारा क्रियान्वित चार योजनाए क्रमश: निम्न थी.

दोआब क्षेत्र में कर वृद्धि (१३२६-१३२७ई)

राजधानी परिवर्तन (१३२६-२७ई)

सांकेतिक मुद्रा का प्रचलन (१३२९-30ई)

खुरासन और कराचिल का अभियान

मुहम्मद बिन तुगलक ने अपनी राजधानी दिल्ली से देवगिरि में स्थानांतरित की और इसका नाम दौलताबाद रखा.

सांकेतिक मुद्रा के अंतर्गत मुहम्मद बिन तुगलक ने पीपल (फरिश्ता के अनुसार), तांबा बरनी के अनुसार धातुओं के सिक्के चलवाए, जिनका मूल्य चाँदी के रुपए टंका के बराबर होता था.

अफ़्रीकी यात्री इब्नबतूता लगभग १३३३ई में भारत आया. सुल्तान ने इसे दिल्ली का काजी नियुक्त किया गया. १३४२ ई में सुल्तान ने इसे अपने राजदूत के रूप में चीन भेजा.

इब्नबतूता की पुस्तक रेहला में मुहम्मद तुगलक के समय के घटनाओ का वर्णन है.

मुहम्मद बिन तुगलक की मृत्यु २० मार्च १३५१ ई को सिंध जाते समय थट्टा के निकट गौडार ने हो गयी.

मुहम्मद बिन तुगलक के शासनकाल में दक्षिण में हरिहर और बुक्का नामक दो भाइयों ने १३३६ ई में स्वतंत्र राज्य विजयनगर की स्थापना की.

महाराष्ट्र में अलाउद्दीन बहमन शाह ने १३४७ ई में स्वतंत्र बहमनी राज्य की स्थापना की.

मुहम्मद बिन तुगलक की मृत्यु पर इतिहासकार बरनी लिखता है. अंततः लोगों को उससे मुक्ति मिली और उसे लोगो से.

मुहम्मद बिन तुगलक शेख अलाउद्दीन का शिष्य था. वह सल्तनत का पहला शासक था, जो अजमेर में शेष मुइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह और बहराइच में सालार मसूद गाजी के मकबरे में गया.

मुहम्मद बिन तुगलक ने बदायू में मीरन मुलहीम, दिल्ली में शेख निजामुद्दीन औलिया, मुल्तान में शेख रुकनुद्दीन, अजुधन में शेख मुल्तान आदि संतों की कब्र पर मकबरे बनवाये.

फिरोज तुगलक का राज्याभिषेक थट्टा के नजदीक २० मार्च १३५१ ई को हुआ. पुन: फिरोज का राज्याभिषेक दिल्ली में अगस्त १३५१ ई को हुआ. खलीफा द्वारा इसे कासिम अमीर उल मोममीन की उपाधि दी गई.

राजस्ब व्यवस्था के अंतर्गत फिरोज ने अपने शासनकाल में २४ कष्टदायक करों को समाप्त कर केवल चार कर खराज (लगान), ख़ुम्स (युद्ध में लूट का माल), जजिया और जकात को वसूल करने का आदेश दिया.

फिरोज तुगलक ब्राह्मणों पर जजिया लागू करने वाला पहला मुसलमान शासक था.

उलेमाओं के आदेश पर फिरोज तुगलक ने एक नया कर सिंचाई कर भी लगाया, जो उपज का 1/10 भाग था.

फिरोज तुगलक ने ५ बड़ी नहरों का निर्माण करवाया.

फिरोज तुगलक ने 300 नए नगरो की स्थापना की. इनमे हिसार, फिरोजाबाद (दिल्ली फतेहाबाद, जौनपुर, फिरोजपुर प्रमुख है)

इसमें शासनकाल में खिज्राबाद (टोपरा गाँव) और मेरठ के अशोक के दो स्तम्भों को लाकर दिल्ली में स्थापित किया गया.

सुल्तान फिरोज तुगलक ने अनाथ मुस्लिम महिलाओं, विधवाओं और लड़कियों की सहायता के लिए एक नए विभाग दीवान-ए-खेरात की स्थापना की.

सल्तनतकालीन सुल्तानों के शासनकाल में सबसे अधिक दासों की संख्या (करीब – १८००००) फिरोज तुगलक के समय थी.

दासों की देखभाल के लिए फिरोज ने एक नए विभाग दीवान-ए-बंद्गान की स्थापना की.

इसने सेन्य पदों को वंशानुगत बना दिया.

इसने अपनी आत्मकथा फतूहात-ए-फिरोजशाही अफीफ को अपना संरक्षण प्रदान किया.

इसने ज्वालामुखी मंदिर के पुस्तकालय से लुटे हुए १३०० ग्रन्थों में से कुछ को फारसी में विद्वान अपाउद्दीन द्वारा द्लायते-फिरोजशाही नाम से अनुवाद करवाया.

इसने चाँदी और तांबे के मिश्रण से निर्मित सिक्के भारी संख्या में जारी करवाए, जिसे अध्दा और विख कहा जाता था.

फिरोज तुगलक की मृत्यु सितम्बर १३८८ ई में हो गई.

फिरोज काल में निर्मित खान-ए-जहाँ तेलंगानी के मकबरा की तुलना जेरुसलम में निर्मित उमर के मस्जिद से की जाती है.

सुल्तान फिरोज तुगलक ने दिल्ली में कोटला फिरोजशाह दुर्ग का निर्माण करवाया.

तुगलक वंश का अंतिम शासक नासिरुद्दीन महमूद तुगलक था. इसका शासन दिल्ली से पालम तक ही रह गया था.

तेमूरलंग ने सुल्तान नासिरुद्दीन महमूद तुगलक के समय में दिल्ली पर आक्रमण किया १३९८ ई में.

नसीरुद्दीन के समय में ही मलिककुशशर्क (पूर्वाधिपति) की उपाधि धारण कर एक हिजड़ा मलिक सरवर ने जौनपुर में एक स्वतंत्र राज्य की स्थापना की.

 

 

Ancient Medieval History में सैय्यद वंश १४१४ से १४५१ ई का इतिहास

सैय्यद वंश का संस्थापक था – खिज्र खां.

इसने सुल्तान की उपाधि न धारण कर अपने को रैयत-ए-आला की उपाधि से ही खुश रखा.

खिज्र खा तैमुरलंग का सेनापति था. भारत से लौटते समय तैमुरलंग ने खिज्र खा को मुल्तान लाहौर और दिपालपुर का शासक नियुक्त किया.

खिज्र खा नियमित रूप से तैमूर के पुत्र शाहरुख़ को कर भेजा करता था.

खिज्र खा की मृत्यु २० मई १४२१ ई में हो गई.

खिज्र खा के पुत्र मुबारक खा ने शाह की उपाधि धारण की थी.

याहिया बिन अहमद सरहिन्दी को मुबारक शाह का संरक्षण प्राप्त था. इसकी पुस्तक तारीख-ए-मुबारक शाही में सैय्यद वंश के विषय में जानकारी मिलती है.

यमुना के किनारे मुबारकाबाद की स्थापना मुबारक शाह ने की थी.

सैय्यद वंश का अंतिम सुल्तान अलाउद्दीन आलम शाह था.

सैय्यद वंश का शासन करीब ३७ वर्षो तक रहा.

 

 

Ancient Medieval History में लोदी वंश १४५१ से १५२६ ई का इतिहास

लोदी वंश का संस्थापक बहलोल लोदी था.

१९ अप्रैल १४५१ ई को बहलोल “बहलोल शाह्गाजी” की उपाधि से दिल्ली के सिंहासन पर बैठा.

दिल्ली पर प्रथम अफगान राज्य की स्थापना का श्रेय बहलोल लोदी को दिया जाता है.

बहलोल लोदी ने बहलोल सिक्के का प्रचलन करवाया.

वह अपने सरदारों को मकसद-ए-अली कहकर पुकारता था.

वह अपने सरदारों के खड़े रहने पर स्वयं भी खड़ा रहता था.

बहलोल लोदी का पुत्र निजाम खा १७ जुलाई १४८९ ई में सुल्तान सिकंदर शाह की उपाधि से दिल्ली के सिंहासन पर बैठा.

१५०४ ई में सिकंदर लोदी ने आगरा शहर की स्थापना की.

भूमि के लिए मापन के प्रमाणिक पैमाना गजे सिकन्दरी का प्रचलन सिकन्दर लोदी ने किया.

गुलमुखी शीर्षक से फारसी कविताएँ लिखने वाला सुल्तान सिकन्दर लोदी था.

सिकन्दर लोदी ने आगरा को अपनी नई राजधानी बनाया.

इसके आदेश पर संस्कृत के एक आयुर्वेद ग्रन्थ का फारसी में फरहंगे सिकन्दरी के नाम से अनुवाद हुआ.

इसने नगर कोट के ज्वालामुखी मदिर की मूर्ति को तौड़कर उसके टुकड़ों को कसाईयो को मांस तौलने के लिए दे दिया था.

इससे मुसलमानों को ताजिया निकालने और मुसलमान स्त्रियों के पीरों तथा संतों के मजार पर जाने पर प्रतिबंध लगा दिया.

गले की बीमारी के कारण सिकंदर लोदी की मृत्यु 21 नवम्बर १५१७ को हो गई. इसी दी इसका पुत्र इब्राहिम शाह की उपाधि से आगरा के सिंहासन पर बैठा.

21 अप्रैल १५२६ ई को पानीपत के प्रथम युद्ध में इब्राहिम लोदी बाबर से हार गया. इस युद्ध में वह मारा गया.

बाबर को भारत पर आक्रमण के लिए नियंत्रण पंजाब के शासक दौलत खा लोदी और इब्राहिम लोदी के चाचा आलम खा ने दिया था.

मोठ की मस्जिद का निर्माण सिकन्दर लोदी के वजीर द्वारा करवाया गया था.

 

 

Ancient Medieval History में सल्तनतकालीन शासन व्यवस्था का इतिहास

केन्द्रीय प्रशासन का मुखिया – सुल्तान

बलबन और अलाउद्दीन के समय अमीर प्रभावहीन हो गए.

अमीरों का महत्व चरमोत्कर्ष पर था. लोदी वंश के शासनकाल में.

सल्तनतकाल में मंत्रिपरिषद को मजलिस-ए-खलवत कहा गया.

मजलिस-ए-खास में मजलिस-ए-खलवस की बैठक होती थी.

बार-ए-खास इसमें सुल्तान सभी दरबारियों, खानों, अमीरों, मालिको और अन्य रईसों को बुलाता था.

बार-ए-आजम सुल्तान राजकीय कार्यों का अधिकांश भाग पूरा करता था.

 

Ancient Medieval History में मंत्री और उससे सम्बंधित विभाग का इतिहास

वजीर (प्रधानमन्त्री) – राजस्व विभाग का प्रमुख.

Ancient Medieval History in Hindi

Ancient Medieval History in Hindi

मुशरिफ-ए-मुमालिक (महालेखाकार) – प्रान्तों और अन्य विभागों से प्राप्त आय और व्यय का लेखा जोखा.

मजमुआदर – उधार दिए गए धन का हिसाब रखना.

खजीन – कोषाध्यक्ष

आरिज-ए-मुमालिक – सेन्य विभाग का प्रमुख अधिकारी. इसके विभाग को दीवान-ए-अर्ज कहा जाता था.

सद्र-उस-सुदूर – धर्म विभाग और दान विभाग का प्रमुख.

काजी-उल-कजात – सुल्तान के बाद न्याय का सर्वोच्च अधिकारी

बरीद-ए-मुमालिक – गुप्तचर विभाग का प्रमुख अधिकारी

वकील-ए-दर – सुल्तान की व्यक्तिगत सेवाओ की देखभाल करता था.

Ancient Medieval History में दीवान-ए-दर – सुल्तान की व्यक्तिगत सेवाओ की देखभाल करता था.

दीवान-ए-खैरात- दान विभाग

दीवान-ए-बंद्गान – दास विभाग

दीवान-ए-इस्तिफाफ – पेंशन विभाग

दिल्ली सल्तनत अनेक प्रान्तों में बटा हुआ था, जिसे इत्ता कहा जाता था. यहाँ का शासन नायबवली या मुक्ति द्वारा संचालित होता था.

इत्ता को शिको (जिलो) में विभाजित किया गया था. यहाँ का शासन अमील/नजीम अपने अन्य सहयोगियों के साथ करता था.

एक शहर या 100 गाँवों के शासन की देख रेख अमीर-ए-सदा नामक अधिकारी करता था.

प्रशासन की सबसे छोटी इकाई ग्राम होता था.

सुल्तान की स्थायी सेना को खासखेल नाम दिया गया था.

मंगोल सेना के वर्गीकरण की दशमलव प्रणाली को सल्तनतकालीन सेन्य व्यवस्था का आधार बनाया गया था.

सल्तनत काल में बारूद की सहायता से गोला फेकने वाली मशीन को मंगलीक तथा अर्राद कहा जाता था.

अलाउद्दीन खिलजी ने इत्ता प्रथा को समाप्त किया था.

Ancient Medieval History में इत्ता प्रथा की दुबारा शुरुआत फिरोज तुगलक ने की थी.

 

विभाग – दीवान-ए-मुस्तखराज (वित्त विभाग)

बनाने वाला सुल्तान – अलाउद्दीन खिलजी

 

विभाग – दीवान-ए-कोही (कृषि विभाग)

बनाने वाला सुल्तान – मुहम्मद बिनतुगलक

 

विभाग – आरिज-ए-मुमालिक (सेन्य विभाग)

बनाने वाला सुल्तान – बलबन

 

विभाग – दीवान-ए-बंदगान

बनाने वाला सुल्तान – फिरोजशाह तुगलक

 

विभाग – दीवान-ए-खैरात

बनाने वाला सुल्तान – फिरोजशाह तुगलक

 

विभाग – दीवान-ए-इस्तिफाक

बनाने वाला सुल्तान – फिरोजशाह तुगलक

 

सल्तनत काल में अच्छी नस्ल के घोड़े तुर्की, अरब और रूस से मँगाए जाते थे. हाथी मुख्यतः बंगाल से मगाए जाते थे.

सल्तनत कालीन कानून शरीयत, कुरान और हदीस पर आधारित था.

मुस्लिम कानून के चार महत्वपूर्ण स्त्रोत थे – कुरान, हदीस, इजमा और कयास.

सुल्तान सप्ताह में दो बार

दरबार में न्याय करने के लिए उपस्थित होता था.

सल्तनत काल में लगान निर्धारित करने की मिश्रित प्रणाली को मुक्ताई कहा गया है.

भूमि की नाप जोख करने के बाद क्षेत्रफल के आधार पर लगान का निर्धारण मसाहत कहलाता था इसकी शुरुआत अलाउद्दीन ने की.

पूर्णत: केंद्र के नियंत्रण के रहने वाली भूमि खालसा भूमि कहलाती थी.

अलाउद्दीन ने दान दी गई अधिकांश भूमि को छीनकर खालसा भूमि में परिवर्तित कर दिया था.

देवल सल्तनत काल में अंतरराष्ट्रीय बंदरगाह के रूप में प्रसिद्ध था.

 

Ancient Medieval History में प्राचीन इतिहास और प्रसिद्धि के कारण

स्थान – सरसुती

प्रसिद्धि के कारण – अच्छी किस्म के चावल के लिए.

 

स्थान – अहिन्वाडा

प्रसिद्धि के कारण – व्यापारियों का तीर्थ स्थल के रूप में

 

स्थान – सतगाँव

प्रसिद्धि के कारण – रेशमी रजाइयों के लिए

 

स्थान – आगरा

प्रसिद्धि के कारण – नील उत्पादन के लिए

 

स्थान – बनारस

प्रसिद्धि के कारण – सोने चाँदी और जड़ी काम के लिए

indiahindiblog

India Hindi Blog हिंदी भाषी लोगो के लिए बनाया गया है, ये भारत के उन सभी लोगो के लिए है जो खुद ऑनलाइन पढ़ना चाहते है, अपने ज्ञान को बढाना चाहते है. हर तरह की जानकारियों से अपने आपको अपडेट रखना चाहते है. इसलिए हमारे द्वारा इस ब्लॉग को आपके लिए तैयार किया गया. आप इस ब्लॉग में सभी तरह की जानकारियों का ज्ञान ले सकते है. इस ब्लॉग में आपको चिकित्सा, टेक्नोलॉजी, खेल, सामान्य ज्ञान, इतिहास, अनमोल विचार, इन सभी का संग्रह आपके लिए यहाँ पर उपलब्ध है.

You may also like...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *