Jhaad Unche Or Niche Chup Khade Hai Aankh Miche


Jhaad Unche Or Niche Chup Khade Hai Aankh Miche

झाड़ ऊँचे और नीचे चुप खड़े है आँख मीचे

घास चुप है कास चुप है, मूक शाल पलाश चुप है.

बन सके तो धसों इनमे सतपुड़ा के घने जंगल,

ऊँघते अनमने जंगल.

सन्दर्भ व प्रसंग – प्रस्तुत पंक्तियाँ भवानीप्रसाद मिश्र द्वारा रचित कविता सतपुड़ा के घने जंगल से अवतरित है. यहाँ पर कवि ने इन जंगलो में पाए जाने वाले वृक्षों का वर्णन किया है.




 

व्याख्या – सतपुड़ा के इन घने जंगलों के अन्दर जो छोटे बड़े ऊँचे नीचे वृक्ष है, वे चुपचाप आँखे बंद किये हुए खड़े है. चारो और शांति तथा मौन छाया हुआ है. घास और कांस के साथ शाल तथा पलाश आदि सभी वृक्ष मौन है. इन जंगलो में प्रवेश की चुनोटी देते हुए कवि कहता है कि यदि ऐसे घने जंगलों में तुम प्रवेश कर सकते हो तो तुम प्रवेश करो क्योंकि सतपुड़ा के घने जंगल नींद में ऊँघते हुए से है, इन उदास जंगलों में वायु भी प्रवेश नहीं कर पाती.

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