Kati Patang Story कटी पतंग कहाँनी

 

Kati Patang Story

कटी पतंग – Kati patang story in Hindi भारत देश में पतंग का त्यौहार हर साल आता है और इस त्यौहार में आप पतंग के इस खेल को किस तरह से कहानी का रूप दिया गया है.



संक्राति का पर्व था। प्रातः वेला थी। भगवान भास्कर अपनी समस्त रश्मियाँ पृथ्वी – मण्डल पर बिखरे चुके थे। ऐसे समय पर बिखरे चुके थे। ऐसे समय में आकाश में काफी ऊचाई पर गुलाबी रंग का एक पतंग उड़ रहा था। अचानक एक चिड़िया उसके सामने से तीव्र गति से उड़ती हुई निकल रही थी। उसकी पैनी दृष्टि उस पतंग पर पड़ी। चिड़िया ने उससे पूछा – “पतंग भैया ! आपको उस अनन्त आकाश में इस प्रकार अकेले स्वछंद रूप से उड़ने में कैसा महसूस हो रहा है ?” पतंग ने सहज भाव से जवाब दिया – ” तुम भी क्या पूछती हो, बहिन ! अरे इस विस्तीर्ण आकाश में उड़ने का आनंद ही कुछ और है।

Kati patang story में मेरा आशय है – आपको किसी प्रकार का कृष्ट तो नहीं होता है, इस प्रकार विहार करने में ?” चिड़िया ने अपने कथन को और स्पष्ट करते हुए कहा। पतंग ने अपने अंतरमन में झाँकते हुए कहा – “क्या बताऊँ बहिन ! मुझे एक बड़ा कष्ट है। मेरे मालिक ने मुझे एक कठोर बंधन में डाल रखा है।”

चिड़िया ने उत्सुकतापूर्वकpuch “कैसा बंधन ? यह तो आपकी नियति नहीं है। ” पतंग ने अपनी बात को स्पष्ट करते हुए कहा – “बहिन ! तुम देख नहीं रही हो मेरी इस कमर को। बड़ी मजबूत डोर से मेरे मालिक ने इसे बाँध रखा है। ” चिड़िया ने कहा, “तुम्हे इसमें क्या परेशानी है, भैया !” पतंग ने अपनी मनोव्यथा सुनाई – “तुम नहीं जानती हो मेरी परेशानी, बहिन ! देखो न मेरा मालिंक मुझे कितनी बुरी तरह से अपनी अंगुली पर नचाता रहता है। कभी वह मेरी कमर खींचता है, जिसमे मेरी रीड की हड्डी खसकने का भय रहता है। कभी वह मुझे ऊपर तान देता है, तो कभी ठुनकी मारकर मुझे मर्मान्तक पीड़ा पहुँचाता रहता है। मुझसे यह सारा कष्ट नहीं सहा जाता। कभी-कभी तो मेरे मन में आत्मघात कर लेने का विचार प्रबल हो उठता है। ” पतंग की पीड़ा चिड़िया के अंतर्मन में प्रवेश कर गई। उसने पुनः एक प्रशन किया – “क्या तुम इस बंधन से सदेव के लिए मुक्ति चाहते हो ?”

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पतंग ने लम्बी सॉस लेते हुए कहा – “हाँ, अवश्य। मैं सदेव के लिए निर्बन्ध होना चाहता हूँ। दुनिया के समस्त बंधन सुख-शांति एवं आनंद के मार्ग मैं बाधक सिध्द होते हैं। आत्मा के विकास में ये घातक ही रहे हैं।” चिड़िया ने उसे एक विनम्र सुझाव दिया – “भैया ! यदि तुम मेरा कहना मानते हो, तो एक काम करो। वह देखो, सामने एक अन्य पतंग उड़ रहा है। तुम उस पतंग की डोर से टकरा जाओ ! बस, फिर क्या हैं ? तुम्हें जीवनभर के लिए समस्त कष्टों से मुक्ति मिल जाएगी। ”

 

चिड़िया की यह युक्ति पतंग के अन्तर्मानस में बैठ गई। उसने वैसा ही किया। क्षणभर में वह जा टकराया उस दूसरे स्वछंद विहारी पतंग से। एक ही झटके एवं तेज घर्षण के कारण उसकी डोर का मजबूत बंधन भी टूट गया। जीवन में प्रथम बंधन भी टूट गया। जीवन में प्रथम बार उस पतंग को आनंद की अपूर्ण अनुभूति हुई। मानो वह स्वर्गलोकme पहुंच गया हो। उस चंचल चिड़िया के साथ-साथ उड़ता हुआ वह पतंग सुदूर उच्च आकाश में चला गया। थोड़ी दूर और आगे बढ़ने पर कजरारे बादलों ने उसे चारो और से घेर लिया। उस पर जल की बूँदो के तेज प्रहार कर उसकी दुर्दशा कर दी। उसकी सारी मौज और मस्ती गायब हो गई। उसका हौसला पस्त हो गया। उसकी सुरक्षा खतरे में पड़ गयी। तेज हवा के झोके के साथ वह धीरे-धीरे धरती के आकर्षण में आने लगा। अनन्त आकाश में उसकी पुकार को सुनने वाला कोई भी नहीं रहा। चिड़िया भी उसका साथ छोड़ चुकी थी। थोड़ी ही देर में वह धरती के काफी निकट आ गया। वह अपने मन में बार-बार एक ही चिंतन कर रहा था – “सम्पूर्ण सृष्टि अनुशासन के अंतर्गत संचालित है। अनुशासन के बंधन से मुक्त रहने वाले की मुझ जैसी ही परिणति होती है। ” देखते ही देखते वह पतंग धरती पर ओंधे मुह आ गिरा। उसके अस्ति – पंजर का कही कोई ठिकाना नहीं था। उसे लूटने के लिए दौड़ने वाले बच्चे घोर निराशा मन में लिए दूसरी दिशा में मुड गए.

 

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