Munshi premchand story

विश्वकवि रविंद्रनाथ टैगोर के अनुसार “हिन्दुस्तान महापुरुषों का सागर है l ” ऐसे ही महापुरुषों में महान साहित्यकार के रूप में एक नाम आता है – मुंशी प्रेमचन्द्र का। आप हिंदी जगत् में एक महान कहानीकार और उपन्यास सम्राट के रूप में विख्यात हैं।




प्रेमचंद्रजी के हिंदी-जगत में पदार्पण के पूर्व हिंदी के प्रारंभिक उपन्यासकार या तो तिलस्मी या ऐयारी या जासूसी उपन्यास लिख रहे थे। इसमें तिलस्मी उपन्यासों में कौतूहलपूर्ण और आश्चर्जनक घटनाये वर्णित हैं। जबकि ऐयारी रचनाओ में मक्कार और मायावी पुरुषों का वर्णन मिलता है और जासूसी उपन्यासों में कौतूहलपूर्णतः और बौद्धिकता का प्राधान्य है। इस उपन्यासों में नवीन की समस्याएँ हैं, न उनके समिधान है। तद्युगीन इतिहास के पृष्ठों का अवलोकन करने से ज्ञात होता है कि उन दिनों भारतेंदु हरिचंद्र भारत की दुर्दशा के गीत गाते रहे और मैथलीशरण गुप्त ‘भारत – भारती’ के माध्यम से प्राचीन भारतीय संस्कृति का गुणगान करते रहे। प्रेमचंदजी के पूर्व हिंदी उपन्यास का प्रधान उद्देश मनोरंजन था। ऐसी स्थिति में प्रेमचंदजी एक नयी चेतना के साथ हिंदी – जगत में प्रविष्ट हुए। पहले आप उर्दू, फ़ारसी और अरबी भाषा में लिखते थे। बाद में आपने राष्ट्रकवि श्री मैथलीशरण गुप्त की सम्प्रेरणा से हिंदी भाषा में लिखना प्रारम्भ किया। फिर तो आप हिंदी में अबाधगति से लिखते चले गए। आपके उपन्यास मनोरंजन के साधन ही नहीं सत्य के वाहक भी बने। हिंदी उपन्यासों का वास्तविक प्रारंभ प्रेमचंदजी से ही माना गया। प्रेमचंदजी में हिंदी उपन्यासों की क्षीण और लक्ष्यहीन धाराएँ सम्मिलित होकर महान नदी बन गयीं।

प्रेमचंदजी का सम्पूर्ण साहित्य मानवतावादी आदर्श से अनुप्राणित है। आपके साहित्य में सत्य, अहिंसा, प्रेम, त्याग, दया, परोपकार, सहानुभूति, सदाचार आदि बातों पर विशेष बल दिया गया। वस्तुतः प्रेमचंदजी का सम्पूर्ण लेखन जीवन से सम्बन्ध रखता है। आपने अपनी रचनाओं में समाज के प्रत्येक वर्ग से पात्रों का चयन किया। ये पात्र यथार्थ जीवन से ग्रहण किये गये हैं। अतः हमें जाने पहचाने व सजीव लगते हैं ल आपने पात्र के बाहरी क्रिया कलापों के साथ उनके अंतर्मन की दशा का भी सुन्दर एवं मार्मिक चित्रण किया है। आपने मानव मन का जितना सूक्ष्म चित्रण किया, उतना उस युग का कोई भी साहित्यकार नहीं कर सका

प्रेमचंदजी की कला की सबसे बड़ी विशेषता है – सजीव चरित्र – चित्रण। आपके पात्र एकदम जिन्दा है, सजीव हैं। इसलिए वे हमारी दृष्टि में आते ही हमारे ह्रदय की गहराई में उतरने चले जाते है। ग्रामीण पात्रों के चरित्र – चित्रण में प्रेमचंदजी को सर्वाधिक सफलता मिली। निम्न वर्ग के पात्रो को जिस सहानुभूति और कौशल से प्रेमचंद्रजी ने प्रस्तुत किया, वैसा उदाहरण हिंदी साहित्य में कही नहीं मिलता है। कदाचित इसलिए डॉ. नागेन्द्र को आपके सम्बन्ध में लिखना पड़ा की “शोषितों का इतना बड़ा हिमायती हिंदी में दूसरा नहीं है।” वैसे मध्यम और उच्चवर्ग को भी आपने अपनी रचनाओ में यथास्थान उचित महत्त्व दिया है।

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प्रेमचंदजी ने हिंदी कथा साहित्य में संवादों के स्तर को बहुत ऊँचा उठाया। उनके संवाद सजीव, स्वाभाविक, रोचक, सार्थक प्रभावोत्पादक हैं। आपकी भाषा सरल, स्वाभविक, पात्रानुकूल, प्रवाहपूर्ण और मुहावरो तथा कहावतों से समन्वित है। चित्रात्मकता, शब्दों का कुशल संयोजन और चुस्ती आपकी भाषा की मुख्य विशेषताए है। शैलीकार की दृष्टि से प्रेमचंदजी का स्थान हिंदी साहित्य में असाधारण है।

सम्पूर्ण प्रेमचंद साहित्य का अध्ययन करने पर हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते है कि प्रेमचंदजी एक क्रन्तिकारी चिंतक थे। अंन्यास और कुरीतियों पर उन्होंने चारो और से आकर्मण किया। एक उपन्यासकार की दृष्टि से प्रेेमचन्दजी विश्व साहित्य जगत के चेखाव, टालम्टाय, गोर्की, अनातोले, ह्यूगो, तुर्गनेव, रोम्यारोला, चेकरे, चार्ल्सडिकेन्स, जौलाँ कैसे महान उपन्यासकारों की श्रेणी में आते है ल आपकी रचनाओ का अनेक विदेशी भाषाओ में अनुवाद हो चुका है, जो आपके साहित्य की लोकप्रियता का स्पष्ट रूप में प्रमाण है।

प्रेमचंद्रजी एक निष्काम साधक थे। अलवर के तत्काल नरेश ने आपको अपने यहाँ मनोरंजन के रूप में कहानियाँ सुनाने के लिए नियुक्त कर मासिक वेतन, मोटरगाड़ी, बंगला आदि सब कुछ सुविधाये देना उचित समझा, किन्तु आपने इस कार्य से अपनी अस्वीकृति लिख भेजी। ऐसा जी एक प्रसंग और है, जिसमे उत्तरप्रदेश के गवर्नर ने आपको ‘रायसाहब’ की उपाधि देना चाहा। इसे भी आपने अस्वीकार कर दिया।

प्रेमचंदजी के व्यक्तित्व का एक पक्ष उनकी सह्रदयता है। एक बार शिवरानी देवी ने बड़ी मुस्किल से कुछ रुपए एकत्र कर कोट सिलवाने के लिए दिए। उन्होंने उन रुपए को अपनी प्रेस के मजदूरों को आवश्यकता पड़ने पर बाँट दिया। एक बार फिर पत्नी शिवरानी देवी ने कुछ रुपए एकत्र कर नया कोट बनवाने के लिए दिए। इस बार वे एक गरीब मित्र को वे रुपए दे आए। उसे अपनी बेटी की शादी में खर्च के लिए चाहिए थे।

समग्र रूप में प्रेमचन्दजी का व्यक्तित्व सरल था। उनका मन सर्वदा उदार रहता था। वे विनोदी प्रकति के थे। आत्म सम्मान उनमे प्रबल था। वे मानव ही नहीं, महामानव थे। नौकरी से भी शिष्टतापूर्वक व्यवहार करते थे। वे प्रायः कहा करते थे – जो अच्छा इंसान नहीं, वह अच्छा लेखन भी नहीं हो सकता है।

प्रेेमचन्दजी एक अत्यंत लोकप्रिय कहानीकार थे। उनकी कहानियाँ आदमी के लिए दिलचस्प और मनोयोग का विषय हैं। उनके द्वारा हिंदी में तीन सौ और हिंदी में तीन सौ कहानियाँ ‘मानसरोवर’ नमक संकलन के आठ भागों में प्रकाशित हो चुकी हैं। आपकी कुछ कहानियाँ ऐसी हैं, जिनका जादू सिर पर चढ़कर बोलता है। ये कहानियाँ जीवन में दिशा – बोध का काम करती हैं। आपके द्वारा लिखित उपन्यास हिंदी की अमूल्य निधि हैं। आपके समय पचास से अधिक उपन्यासकार एवं कहानीकार लेखनरत थे, परन्तु आपके साहित्य में जीवंतता थी। इसलिए आपकी रचनाएँ आज भी प्रासंगिक हैं। डॉ रामविलास शर्मा ने प्रेमचंदजी का मूल्यांकन करते हुए ठीक ही लिखा है – ”प्रेमचंद उन लेखकों में से हैं, जिनकी रचनाओ से विदेश के साहित्य प्रेमी हिदुस्तान को पहचानते हैं। उन्होंने भारत के राष्ट्रीय सम्मान को बढ़ाया है।”

आज हिंदी उपन्यास साहित्य विविध धाराओ में विभक्त हैं। यह विश्व की किसी भी भाषा के साहित्य से न्यून स्तरीय नहीं कहा जा सकता। इस स्टार तक इसे पहुँचाने में मुंशी प्रेमचंद ने नींद के पत्थर बनने का काम किया। प्रगतिशील लेखन – संघ की स्थापना का आपने निसंदेह एक महान रचनात्मक कार्य किया।

अंत में, मै तो मुंशी प्रेमचन्दजी के सम्बन्ध में इतना ही कहना चाहूँगा कि –

“यूँ तो दुनिया के समंदर में,

कभी कभी आती नहीं

लाखों मोती हैं, मगर

उस आब का मोती नहीं। “

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