Satpuda Ke Ghane Jangal Neend Me Dube Hue Se Unghte Anmane Jangal


Satpuda Ke Ghane Jangal Neend Me Dube Hue Se Unghte Anmane Jangal

सतपुड़ा के घने जंगल नींद में डूबे हुए से ऊँघते अनमने जंगल

 

सन्दर्भ व प्रसंग – प्रस्तुत काव्य पंक्तियाँ श्री भवानीप्रसाद मिश्र द्वारा रचित कविता सतपुड़ा के घने जंगल से अवतरित है. यहाँ पर कवि सतपुड़ा के जंगलों का वर्णन कर रहा है.





व्याख्या – सतपुड़ा के जंगल बहुत घने है. इस समनता के कारण ये जंगल नींद में डूबे हुए से प्रतीत होते है. उनको देखकर ऐसा मालूम होता है कि ये जंगल नींद के कारण ऊँघते हुए, उदास से है.

Satpuda ke ghane jangal neend me dube hue se, all Information in Hindi

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विशेष – सतपुड़ा के घने जंगल शांत और मौन है. उनमे कोई हलचल नहीं है. इसलिए कवि ने नींद में डूबे हुए से ऊँघते और अनमने कहा है. नींद में डूबे हुए से उपमा अलंकार है.

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