Selfless meaning, Good and bad deeds

What is Selfless deeds ?  (निष्काम कर्म क्या है ?)

Good and bad deeds  (अच्छे और बुरे कर्म )

जिस प्रकार विनम्रता न हो, तो विध्या व्यर्थ है , उसी प्रकार कर्म न हो, तो जीवन व्यर्थ है. कर्म जीवन की आधारशिला है यह सफलता या असफलता का मूल है. यदि हम काम नहीं करते और केवल भाग्य के भरोसे बैठे रहते , तो क्या हम कुछ कर पाते ? भारत स्वतंत्रता तो पाता ? मनुष्य चाँद पर पहुँच पता ? कदापि नहीं। कर्म ही मनुष्य का सबसे बड़ा धर्म है. यदि व्यक्ति के भाग्य में उन्नति होगी, यह लिखा हो और वह व्यक्ति सोचे की भाग्य में लिखा है, उन्नति होगी और बिना कर्म किये ही वह सब कुछ पाना चाहता है, तो यह नहीं हो सकता।




यही भाग्य के सहारे ही सफलता मिलती, तो हम क्यों रोगी को डॉक्टर के पास में जाते ? क्यों नहीं उसे भाग्य के सहारे छोड़ देते ? परन्तु हम या नहीं करते, क्योकि हमें पता है कि बिना डॉक्टर के वह पुर्णत: स्वस्थ नहीं हो सकता। आज हमारे भारत में निर्धारता क्यों है ? क्यों की अधिकांश भारतवासी भाग्यवादी है, और भाग्य के सहारे जीवन यापन करते है. यदि कोई विद्यार्थी अपना कर्म (विद्या प्राप्त करना) न करे तो क्या वह बिना पढ़ाई किये परीक्षा में उत्तीर्ण हो सकेगा ? इतिहास साक्षी है कि जितने भी परिवर्तन हमारे देश में हुए, उनका सारा श्रेय कर्मवीर महापुरुषों को जाता है.

Good and bad deeds

Good and bad deeds

 

यदि महिलाये हर क्षेत्र में पुरुषो के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर कार्य कर रही है तो उसका श्रेय कर्म को ही है. यह युग भौतिकवादी युग है. अर्थात इस युग में मनुष्य अपनी भौतिक सुख सुविधाओ , जैसे अच्छा मकान, कार, पैसा आदि की महत्वाकांक्षाए रखता है. प्रत्येक इंसान की कुछ आकांछाए होती है. और उन्हें पूरा करने के लिए परिश्रम करना पड़ता है.

“परीश्रम” यह कर्म का ही प्रतिरूप है. प्रत्येक किसान को अपनी फसल के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ती है. उसकी मेहनत से ही फसल उत्पन्न होती है. भाग्य इसका अपवाद नहीं है कि भाग्य में फसल होना लिखा है तो फसल अच्छी होगी।

कठिनाई तो यही है कि अधिकांश लोग परिश्रम करना नहीं चाहते और बैठे-बैठे ही सब चीजो को प्राप्त करना चाहते है. हमें प्रत्येक कार्य करते समय अपने स्वयं के ऊपर विश्वाश रखना चाहिए।  यह नहीं  सोचना चाहिए की यदि हम अपनी योग्यता पर विश्वाश रखते है तो हमें निश्चित सफलता मिल सकती है.

सफलता का रहस्य तो अच्छे कर्म एवं परिश्रम पर निर्भर है. ईश्वर ने हमें दो हाथ और दो पैर किस लिए दिए हैं ? जो व्यक्ति एक क्षण भी गँवाता है, वह ईश्वर के द्वारा दिए गए उपहार का अपमान करता है. हमें तो प्रेरणा उस छोटी से चीटी से लेना चाहिए, जो उस दिन भर कार्य करती है. अगर व्यक्ति कर्म न करे और फालतू बैठा रहे तो उसका मन बुराइयों को जन्म देता है, क्योकि खाली दिमाग शैतान का घर होता है।

इस प्रकार हम कह सकते है कि मनुष्य को कर्म करते रहना चाहिए और भाग्य पर निर्भर रहना चाहिए। 

भगवान श्री कृष्णा ने गीता में कहाँ है।

“कर्मण्येवाधिकारस्ते 

मा फलेतु कदाचन् 

मा कर्मफल हेतु र्भूमा

ते सङ्‌गोडस्त्वकर्मणि “

यह तो ठीक है कि  मनुष्य की सफलता कर्म पर निर्भर है, परन्तु हम पूर्णतः यह नहीं कह सकते है, कि केवल कर्म ही प्रधान है. यदि कोई मनुष्य कर्म करता है, परन्तु उसे सफलता नहीं मिलती है, तो जरुरी नहीं की उसने प्रयत्न न किया हो। उसमे भाग्य का होना जरुरी है।

हमें सतत् कर्म करते रहना चाहिए। फल का मिलना ना मिलना भाग्य पर निर्भर है। जो व्यक्ति अच्छे कर्म करता है, भाग्य उसी का साथ देता है। ऐसा कहाँ गया है कि सब्र का फल मीठा होता है और कर्म का फल अच्छा होता है। इसलिए हमें कर्म करते जाना चाहिए और फल की इच्छा नहीं रखनी चाहिए।

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