Source of Inspiration देवी अहिल्या बाई

Source of Inspiration जन जन कि प्रेरणा स्त्रोत देवी अहिल्या बाई

लगभग २२० वर्षो तक शासन करने वाले होलकर राजवंश के १४ शासको में देवी अहिल्याबाई एकमात्र महिला शासिका थी. सन १७६५ ई. से १७७५ ई. तक शासन कि बागडोर उनके पवित्र हाथो में रही. १८वि सदी के भारत में राजनितिक द्रष्टि से जितना बिखराव और अस्थिरता रही है, उतनी शायद किसी और युग में नहीं रही.




मराठो ने इसी सदी में अपना चरमोत्कर्ष देखा और इन सबके साथ ही कितने ही क्षेत्रीय राज्यों और राज्यवंशो कि स्थापना इसी सदी में हुई. इन्ही में से एक था इंदौर का होलकर राज्य. इस राज्य के संस्थापक थे मल्ल्हारराव होलकर मराठा शक्ति के विस्तार के वे एक अग्रणी सेनानायक थे.

मल्हार राव के पुत्र खंडेराव के साथ अहिल्याबाई के रूप में एक गुणवती, पतिव्रता, सुन्दर, धर्मपरायण, त्याग कि प्रतिमूर्ति, कर्तव्यनिष्ठ एवं आदर्श पत्नी को प्राप्त कर खंडेराव कि जीवनधारा ही बदल गई.

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दाम्पत्य सूत्र में बंधने पर अहिल्याबाई ने सादा जीवन और उच्च विचार का आदर्श सदेव अपने सामने रखा. लेकिन भरतपुर राज्य के डीग नामक स्थान पर जाट लोगो के विरुद्ध युद्ध में १७५४ ई. में वे वीर गति को प्राप्त हों गए.

अहिल्याबाई का अखंड सोभाग्य विकराल काल के एक ही प्रहार से खंड खंड हों गया. अपने शिलधर्म कि रक्षा के लिए उन्होंने अपने श्वसुर के सम्मुख स्वयम के सती होने का अनुनय विनय किया, लेकिन पुत्र के वियोग से दुखी पिता ने अपने वधु को सती नहीं होने दिया एवं धर्म ध्यान कि आराधना करने तथा धेर्य रखने का परामर्श दिया.

 

अहिल्याबाई ने अपने श्वसुर कि आज्ञा को शिरोधार्य किया और सटी होने का विचार त्याग दिया. जीवन का संध्याकाल निकट आते देखकर श्वसुर मल्हारराव होलकर ने शासन का समस्त कार्यभार सन १७६५ में अहिल्याबाई को सोप दिया.

शासन कि बागडोर सँभालने के बाद अहिल्याबाई ने प्रजा कि भलाई के लिए नए इतिहास का निर्माण किया. वे कहा करती थी, ईश्वर ने मुझ पर जो उत्तर दायित्व रखा है उसे मुझे निभाना है मेरा काम प्रजा को सुखी रखना है.

मैं अपने प्रत्येक काम के लिए जिम्मेदार हूँ ईश्वर के यहाँ मुझे उसका जवाब देना है. उन्होंने किसानो कि दशा सुधारी एवं उनके कष्ट दूर किये. व्यापर कि वृद्धि के लिए उन्होंने अपने राज्य में कपड़ो के व्यवसाय को बहुत प्रोत्साहन दिया.

महेश्वर में उन्होंने अनेक जुलाहों को बसाया. इन जुलाहों ने महेश्वर कि साड़ियों को भारतभर में प्रसिध्ध कर दिया. राज्य सिंहासन पर आरूढ़ होने पर अहिल्याबाई को मालूम हुआ कि शासन तंत्र में भ्रष्टाचार तत्वों का प्रभाव बढता जा रहा है.

उनको यह अन्याय एवं अत्याचार पसंद नहीं आया. अहिल्याबाई ने भ्रष्ट अधिकारियो एवं कर्मचारियों को पदों से निष्काषित कर दिया. अहिल्याबाई ने अपने पद एवं जनता के जीवन को सुरक्षित रखने के लिए उसकी चुनोतियो को स्वीकार करते हुए स्वयं वीरवेश धारण कर सेना का सुसंचालन किया.

अहिल्याबाई का सिधांत था कि जिस राजा घोर नरक का पात्र बनता है. शासन व्यवस्था उत्तम होने से उनके राज्य में चोर, लुटेरो तथा डाकुओ आदि का भय नहीं था. उनके राज्य में सबको उचित न्याय मिलता था.

गावो के झगडे पंचायते निपटाती थी. न्याय सर्वसुलभ होने कि द्रष्टि से न्यायालय खुले थे. अत्याचारी एवं अपराधी दंड से कभी बच नहीं सकता था.

अहिल्याबाई यद्यपि एक छोटे से राज्य कि शासिका थी, तथापि उनकी द्रष्टि व्यापक और राष्ट्रिय थी. अपने जीवन के किसी भी पक्ष, वर्ग, जाती या धर्म के प्रति किसी भी प्रकार कि असहिष्णुता या अनुदारता उनमे कतई नहीं थी.

मुस्लिम, बोद्ध, जैन अथवा विभिन्न हिन्दू सम्प्रदायों को अपने धर्म या इष्ट कि सार्वजानिक एवं समारोहपूर्वक पूजा अर्चना या प्रार्थना कि स्थितियां बहुत खुली और सम्मानपूर्ण थी. मुस्लिम मस्जिदों, मजारो का बड़ी संख्या में सुरक्षित होना राज्य के गृह उद्योगो में उनकी बड़ी संख्या में सहभागिता, नर्मदा किनारे मुसलमानों कि बड़ी सभाओ के होने का फ्रेंच यात्री द्वारा प्रत्यक्ष्य दर्शी विवरण तथा राज्य में शांति और सद्भाव का वातावरण इस बात का प्रमाण है कि अहिल्याबाई एक पंथ निरपेक्ष शासिका थी.

उनके व्यक्तित्व जीवन और शासन कि सादगी, सह्जगता और पारदर्शिता ने उन्हें नारी से देवी तथा लोकमाता बनने में अहम् भूमिका अदा कि. अहिल्याबाई कि द्रष्टि में राजनितिक सीमओं का अधिक महत्त्व नहीं था. इन सीमओं से कही परे भारत के जन-जन से जुडी देश कि सांस्क्रतिक राजधानियों में वे कुछ ऐसी स्थाई स्म्रतिया छोड़ जाना चाहती थी.

जिनके माध्यम से आने वाली पीढ़िया उन्हें माँ और देवी के रूप में स्मरण कर नत मस्तक होती रहे. ऐसा कैसे और क्यों कर संभव हों सका? इसका उत्तर निहित है भगवान् शिव और माँ नर्मदा के प्रति उनकी अटूट निष्ठा में.

अशोक के धर्म कि उनकी अटूट शिव भक्ति उनकी जनकल्याणकारी नीतियों तथा सांस्क्रतिक राष्ट्रवाद का प्रेरणा स्त्रोत बनी. खासगी का धन, जो कि एक तरह से उनकी व्यक्तिगत सम्पत्ति था, का उपयोग उन्होंने सर्जनात्मक दानशीलता के लिए किया.

यह दानशीलता पुरे भारत के लोगो के सार्वजानिक उपयोगिता के सिधान्त पर आधारित थी, अर्थात उनकी धार्मिकता ऐसी थी कि जिससे एक और तो मंदिरों, घाटो, धर्मशालाओ, बावडियो, छत्रियो और प्रवेशद्वारो का निर्माण या पुनरुद्वार हुवा और दूसरी और सार्वजानिक उपयोगिता सिधांत पर आधारित ये निर्माण कार्य सांस्क्रतिक राष्ट्रवाद के पुनरुत्थान के प्रतीक बन गए.

सास्क्रतिक राष्ट्रवाद के प्रतीक इन निर्माण कार्यो पर हजारो पृष्ठ लिखे जा सकते है. अहिल्याबाई ने पुरे

भारत में ६५ से अधिक मंदिरों का जीर्णोद्वार किये गए मंदिरों में काशी का विश्वेश्वर तथा सोमनाथ जैसे

एतिहासिक मंदिर भी शालिम है.

रामेश्वर, बद्रीनाथ, जगन्नाथपूरी , कुरुक्षेत्र, पंढरपुर, नासिक,, ओम्कारेश्वर, गंगोत्री, केदारनाथ, हंडिया,

गया, महेश्वर आदि स्थानों पर बने मंदिर श्रध्दा के साथ ही राष्ट्रीय स्थापत्य कला के अद्भुत नमूने है.

सात नगरो, चार धामों और अन्य स्थानों पर भव्य और सुविधायुक्त धर्मशालाओ कि दीवारों, स्तंभों आदि पर गाती बजाती तथा जनजीवन से जुडी स्त्री पुरुषो कि मूर्तियों उत्क्रिष्ण है. बनारस का मनिकरनी का घाट, हरिद्वार का कुशावर्त घाट और महेश्वर का अहिल्या घाट सहित अयोध्या, मथुरा, बिठुर, कुरुक्षेत्र आदि न केवल स्वर्ग कि पैड़िया है.

बल्कि घाट स्थापत्य शेली के सुन्दरतम उदाहरण भी है. केदारनाथ में ३०० फूट ऊचा जलकुंड, वृन्दावन में ५७ सीढियों वाली बावड़ी, जामघात का विशाल प्रवेशद्वार भी अहिल्याबाई के सांस्क्रतिक योगदान के सुन्दर प्रतीक है.

भावात्मक दृष्टी से सांस्क्रतिक राष्ट्रवाद के प्रतीक ये स्मारक सत्ता या शान शोकत का पर्दशन न होकर लोकहित और जन संस्क्रति के सिधान्तो पर निर्मित है. इन सांस्क्रतिक प्रतीकों के स्थाई रखरखाव कि व्यवस्था भी लोकमाता द्वारा कि गई.

इस प्रकार १८ वी सदी की अराजकता, आवागंमन के साधनों कि कठिनाइयो के बावजूद भारत कि सांस्क्रतिक राजधानीयो का राष्ट्रीयकरन करने का श्रेय देवी श्री अहिल्याबाई होलकर को लाता है. इस सबसे ऊपर अहिल्याबाई के सांस्क्रतिक राष्ट्रवाद का उदहारण है.

महेश्वर राज्य में शिवरात्रि पर भारत के सभी शिव मंदिरों पर गंगाजल के कावड भेजने की नियमित व्यवस्था. गंगाजल के ये घड़े सारे देश में जाने वाले सांस्क्रतिक दूतो कि तरह थे. सांस्क्रतिक राष्ट्रवाद के इन प्रयासों में अहिल्याबाई का राष्ट्रीय व्यक्तित्व भी प्रतिबंधित होता है.

अहिल्याबाई यध्यपि एक छोटे से राज्य कि शासिका थी, तथापि उनकी दृष्टी व्यापक राष्ट्रीय थी. अपनी प्रजा और राज्य के राजनितिक, प्रशासनिक तथा आर्थिक हितो के प्रति वे सदा सगन एवं क्रियाशील रही परन्तु जीवन के किसी भी पक्ष, वर्ग, जाति या धर्म के प्रति उनमे किसी भी प्रकार कि असहिष्णुता या अनुदारता नहीं थी. उनके सांस्क्रतिक राष्ट्रवाद कि प्रेरणा एवं निर्माण कार्यो पर हजारो पृष्ठ लिखे जा सकते है.

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