Swami Vivekananda स्वामी विवेकानंद

स्वामी विवेकानंद (Swami Vivekananda) जी के बारे में

स्वामी वेवेकानंद (Swami Vivekananda)का जन्म १२ जनवरी १८६३ को कलकत्ता में हुआ था. स्वामीजी के बचपन का नाम नरेंद्र था. यही नरेंद्र आगे चलकर विवेकानंद के नाम से विख्यात हुआ. जिसने अपने ज्ञान से विश्व के आलोकित किया.

Swami Vivekananda स्वामी विवेकानंद

Swami Vivekananda स्वामी विवेकानंद

अपने विचारों के द्वारा उन्होंने युवाओं में शक्ति का संचार किया. वे अंधविश्वास के कट्टर विरोधी थे. उन्होंने कहा – किसी बात पर केवल इसलिए श्रध्दा मत करो की वह किसी ग्रन्थ में लिखी है, अथवा लाखो लोग सेंकडो वर्षो से उसे प्रमाण मानते आए है.




 

कोई परम्परा केवल सेकड़ो वर्षो तक प्रचलित होने के कारण सत्य नहीं बन जाती. प्रत्येक बात को अपने तर्क से परखो. उसके बाद ही उस पर श्रध्दा करो. स्वामी विवेकानंद अधिकांश युवाओ के आदर्श रहे है. वे संगीत प्रेमी भी थे. उन्होंने संगीत एवं गायन कला दोनों की शिक्षा ग्रहण की.

 

हिंदी अंग्रेजी उर्दू और फ़ारसी वह सहजता से बोल लेते थे. विवेकानंद के मन में उठे प्रश्नों के उत्तर पाने के लिए वे ब्राह्मण समाज में जाने लगे और वहाँ  के महर्षि देवेन्द्र नाथ ठाकुर के पास गए और पूछा क्या आपने ईश्वर को देखा है. वे इसका संतोष जनक उत्तर नहीं दे सके.

 

स्वामी विवेकानंद की भेंट रामकृष्ण परमहंस से हुई, तब उन्होंने यही प्रश्न उनसे पूछा तो उन्होंने कहाँ हाँ, मैंने ईश्वर को देखा है. जैसे मैं तुम्हे देख रहा हूँ. इसके कुछ समय बाद वे उनके शिष्य बन गए. स्वामी जी के विचार हर उस युवा के लिए प्रेरणा पुंज है, जो संघर्ष के रास्ते पर चलकर अपना लक्ष्य प्राप्त करना चाहते है.

 

उन्होंने कहा कि असफलताओ की चिंता मत करो. वे बिल्कुल स्वाभविक है. जीवन का सोन्दर्य है. उनके बिना जीवन क्या होगा. जीवन में यदि संघर्ष न हो तो जीवन रहना व्यर्थ है. संघर्ष और त्रुटियों की परवाह नहीं करना चाहिए.

 

विवेकानंद न केवल विचारक थे, बल्कि एक कर्मयोगी भी थे. स्वामी विवेकानंद छुआछुत के प्रबल विरोधी थे. स्वामी विवेकानंद प्रखर राष्ट्रवादी थे. उन्होंने शिकागो धर्म सम्मलेन में भारतीयता का जो परचम लहराया, वह अतिस्मरणीय है. उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन राष्ट्र उत्थान तथा सेवा में अर्पित किया.

 

इसे महानता के सबसे ऊँचे मापदंडो में भी रखा जाए तो कम है. स्वामी विवेकानंद वाराणसी धाम के दुर्गा मंदिर से लौट रहे थे कि बंदरों के एक झूंड ने उनका पीछा किया. स्वामी जी भागने लगे, बन्दर भी पीछे दौंडे.

 

तभी एक वृध्द सन्यासी ने स्वामीजी को पुकारकर कहा – रुको, उन जानवरों का सामना करो. स्वामीजी साहस जुटाकर पलट कर खड़े हुए, बंदर पहले सहसा रुक गए. फिर दूम दबाकर भागे. इस घटना से स्वामीजी को जीवन की एक महत्वपूर्ण शिक्षा मिली.

 

विघ्न बाधाओ को देखकर कभी भागना नहीं चाहिए. निर्भीक ह्रदय से उससे आखँ मिलानी चाहिए. परवर्ती जीवन में न्युयोर्क में एक भाषण से समय स्वामीजी ने इस घटना का उल्लेख करते हुए कहा था. यहाँ पूरे जीवन के लिए एक शिक्षा है.

 

भयंकर दुश्मन से भी आँख मिलाओ, साहस के साथ उसके सन्मुख खड़े हो जाओ. जीवन के दुखो को देखकर जब हम भागते नहीं, तो वे भी बंदरो की तरह हमारे पास फटकने का साहस नहीं कर पाते. कायर कभी विजयी नहीं होते. यदि आप सच्चे है तो भले पूरा देश को या फिर पूरी दुनिया आपकी दुश्मन हो. आपका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता.

 

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